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*हम कहाँ जा रहें हैं?*

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शशिकांत गुप्ते

आज सीतारामजी ने कहा
इनदिनों ना तो समाचार देखने,सुनने का मन करता है,ना ही अखबार में खबरें पढ़ने का मन करता है।
टी वी पर जब कोई मानवीय त्रासदी के समाचार प्रसारित होते हैं,तब उद्घोषक कहता है,कुछ दृश्य इतने दिल दहलाने वालें हैं कि,उन्हे टी वी पर दिखाना संभव नहीं हैं।
ऐसे समाचारों के बीच त्वचा को सुंदर बनाने क्रीम और शक्ति वर्धक पेय के विज्ञापन के साथ देश की आर्थिक स्थिति को कागजों पर बढ़ा चढ़ा कर दिखाने वाले विज्ञापन,और मुफ्त में रेवड़ियां बांटने की प्रतिस्पर्धा के विज्ञापन ना सिर्फ हास्यास्पद लगते हैं,बल्कि अलग से व्यंग्य लिखने की जहमत उठानी ही नहीं पड़ती है। रेवड़ियां बांटने की होड़ की पराकाष्ठा तो तब दिखाई देती है,जब करोड़ों रुपयों के गबन की जाँच को दफ़न करने की नई परिपाटी का निर्वाह बहुत ही गर्व के साथ किया जाता है?
इनदिनों कुछ समाचार तो नियमित पढ़ने,देखने और सुनने के मिल रहें हैं।Teen age के युवक युवतियां स्वयं की इहलिला स्वयं के हाथों समाप्त कर रहीं हैं।भावीपीढ़ी के कुछ होनहार मादक पदार्थों का सेवन कर अपराध बोध से ग्रस्त होने के बजाए अमानवीय अपराधिक गतिविधियों में लिप्त होते जा रहें हैं। देश की भावी वीरांगनाएं मादक पदार्थों का सेवन और मादक पदार्थ युक्त धूर्मपान कर सड़कों पर तांडव करने में स्वयं के प्रतिष्ठा का प्रतीक सरल भाषा में Status symbol समझती है। ये युवतियां नशे के सुरूर में अभद्र भाषा का प्रयोग खुलेआम करती है,मतलब बोलचाल की भाषा में खुलकर गाली गलौच करती है।
भावीपीढ़ी के संस्कारों के पतन का वतन पर क्या असर होगा यह गंभीर विचारणीय प्रश्न है?
उपर्युक्त मुद्दों पर प्रख्यात कवि स्व. प्रदीप जी रचित और गाए गीत की पंक्तियों का स्मरण होता है।
आज के इंसान को ये क्या हो गया
इसका पुराना प्यार कहाँ पर खो गया
इंसानों ने जान गवाई
पर बहनों की लाज बचाई
लेकिन अब वो बात कहाँ है
अब तो केवल घात यहाँ है

अंत में एक अहम प्रश्न मादक पदार्थों की उपलब्धता कैसे,कहाँ और किस माध्यम से होती है?
क्या विश्व गुरु बनने का यही रास्ता है?

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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