अग्नि आलोक

कहां से कहां आ गये हम

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श्याम सिंह रावत

हिंदी फिल्म ‘चलती का नाम गाड़ी’ (1958) में किशोर कुमार का गाया एक गाना था―जाते थे जापान पहुंच गये चीन, बिल्कुल ऐसी ही दशा भारत की बना दी गई है. कहां तो भारत 2014 आते-आते तक दुनिया के विकासशील देशों में अग्रणी था, विदेशी कंपनियां भारत में व्यापार करने को भारी निवेश कर रही थीं, जिससे रोजगार के नये-नये अवसर पैदा हो रहे थे, हर क्षेत्र तरक्की कर रहा था और कहां आज इसकी ऐसी दुर्दशा बना दी गई है कि यह आज कंगाली की ऐसी कगार पर पहुंचा दिया गया है, जहां वह सब एक सपने जैसा लगता है.

पिछले 97 सालों से आरएसएस देश में हिंदू-मुसलमान का वर्गभेद बढ़ाकर इसकी वैदिक संस्कृति और धर्म के विरुद्ध अपना हिंदुत्व थोपने का जो दुष्चक्र चलाता रहा है, उसके दुष्परिणाम हमारे सामने विविध रूपों में उपस्थित हैं. इसके एक प्रचारक ने दुनिया भर में सच को झूठ और झूठ को सच में बदलने के लिए कुख्यात अमेरिकी पीआर. कंपनी ऐप्को वर्ल्डवाइड की मदद से देश की सत्ता पर कब्जा करने में कामयाबी हासिल करने के बाद इसे हर क्षेत्र में किस तरह बर्बाद कर दिया है, यह कोई छिपी बात नहीं है.

पाखंड, अंधविश्वास और दिखावे की आस्था के मारक औजार पर सान चढ़ाकर ऐसी विनाशलीला का बीज बोया जा चुका है कि आज हम यह भी नहीं देखना चाहते कि दुनिया के दूसरे देशों में क्या हो रहा है. अब देश के समाचार माध्यमों में दिन-रात हिंदू-मुसलमान का विभेदकारी वातावरण बनाकर समाज को विभाजित करने का ही ऐजेंडा चलाया जा रहा है. जनसरोकारों पर चरचा बंद कर दी गई है. लोगों की नजरों से यह छिपाया जा रहा है कि दुनिया किस तरह आगे बढ़ रही है.

दुनिया जिस तरह निरंतर उन्नति करती जा रही है, हम उसके मुकाबले कहीं नहीं ठहरते. यदि केवल मुस्लिम देशों को ही ले लें, जिनका भय दिखाकर संघ भारतीयों को ठगता रहा है, तो बात साफ हो जाती है. आज क्या है मुस्लिम देशों की आर्थिक स्थिति और वे आगे क्या करने जा रहे हैं, यह देश में संघ-समर्थक हिंदुओं को सोचने की जरूरत है.

सऊदी अरब की आबादी 1.5 करोड है और तकरीबन इतने ही विदेशी नागरिक वहां काम करते और रहते हैं जिनमें लगभग 28 लाख भारतीय भी शामिल हैं. सऊदी अगले दस सालों में 7 ट्रिलियन डॉलर का निवेश कर दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था का देश बनने की ओर अग्रसर है. वहां के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान सऊदी की राजधानी रियाद को 2030 तक एक आर्थिक और व्यापारिक गढ़ बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं.

तेल निर्यात करने वाला दुनिया का सबसे बड़ा देश सऊदी अरब अपनी अर्थव्यवस्था की तेल पर निर्भरता को कम करने के लिए कई क़दम उठा रहा है क्योंकि सरकार जानती है कि तेल हमेशा के लिए नहीं रहेगा इसलिए वैकल्पिक साधनों के जरिये देश की अर्थ-व्यवस्था को मजबूती देने की ओर कदम बढ़ाये जा चुके हैं.

क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने 7 ट्रिलियन डॉलर इंफ़्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य सेवा, ट्रांसपोर्ट एवं बंदरगाह, मैन्यूफ़ैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी ट्रांसफ़र, रिन्युएबल एनर्जी, डिजिटल एकनॉमी तथा पर्यटन पर खर्च कर 2030 तक देश की GDP 22% बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, ताकि सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था अगले दस सालों में वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता सूचकांक (Global Competitiveness Index) में दसवें स्थान पर हो.

1 ट्रिलियन डॉलर केवल इन्फ़्रास्ट्रक्चर योजना पर खर्च होगा, जिसमें 300 बिलियन डॉलर नई सड़कें, हाइस्पीड ट्रेन पर खर्च किया जायेगा. वहां एक नई एयरलाइन खोलने के अलावा 147 बिलियन डॉलर की लागत से राजधानी रियाद में एक विश्वस्तरीय नया एअरपोर्ट बनाया जा रहा है. रियाद का कुल क्षेत्रफल दोगुना कर उसे सऊदी अरब का मुख्य व्यापारिक केंद्र बनाने का काम प्रगति पर है.

लाल सागर के किनारे मिस्र और जॉर्डन की सीमा पर तबूक में सऊदी अरब दुनिया का अत्याधुनिक शहर नियोम (Neom) बसाने जा रहा है, जिसे भविष्य का नगर कहा जा रहा है. इसे शून्य उत्सर्जन और शून्य वाहन की थीम पर 500 बिलियन डॉलर की लागत से विकसित किया जा रहा है. दुबई और अबूधाबी जैसे दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक शहरों को पीछे छोड़ते हुए नियोम पूरी तरह आर्टिफिशियल इटैलिजेंस आधारित शहर होगा. इसका क्षेत्रफल 26,500 वर्ग किमी होगा.

आज 2022 में चीन की अर्थव्यवस्था 8.1 प्रतिशत बढ़कर लगभग 18 ट्रिलियन डॉलर, भारत की 2.5 ट्रिलियन डॉलर और सऊदी अरब की 2030 तक 7 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगी. 1993 से पहले केवल मुम्बई और हॉग कॉग एशिया में दो बड़े वित्तीय केंद्र थे. सऊदी अरब या दुबई के शेख बम्बई आकर बिजनेस करते थे और आज मुकेश अंबानी और हिरानंदानी दुबई में कंपनी खोल कर स्टॉक एक्सचेंज में इनलिस्ट कर रहे हैं.

दुबई में अब तक का सबसे भव्य एक्सपो 2022 हो गया, कतर में इस साल नवंबर 21 से 18 दिसंबर के बीच फीफा (FIFA) वर्ल्ड कप 2022 होने जा रहा है, मिस्र में नई राजधानी का उद्धाटन होगा, इसतांबूल में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र खुलेगा लेकिन हम अपने देश में दंगा कर के GDP जलाने को आतुर हैं.

हम समय समय पर दंगे प्रायोजित करते हुए देश की GDP को जलाते गये जिस पर किसी प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या अर्थशास्त्री ने इस तरह प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की जिस तरह दक्षिण अफ्रीका में दंगा होने पर वहां के राष्ट्रपति सिरिल रामापोज़ा ने कहा कि उनके देश की GDP 3-4% जल कर ख़त्म हो गई. हमारे देश के स्वघोषित राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री मोदी के पास देश चलाने का कोई विज़न ही नहीं है. सिर्फ जुमले उछालने, विपक्षियों की खिल्ली उड़ाने और साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देकर जीडीपी जलाने का विज़न है.

जरा सोचिए दक्षिण अफ्रीका में सिर्फ चार दिन के दंगे से 3-4% जीडीपी खत्म हो गई तो हमारे यहां 70 साल से दंगे होते रहे हैं, उनमें कितना नुकसान हुआ होगा ? हम लोग भारत में साम्प्रदायिक घृणा फैला कर अनेक तरह की हानि उठाते रहे और गर्व करते रहे, उधर चीन 1965 से 5-6% की ग्रोथ करता रहा और 1989 से 10-12% ग्रोथ कर के 2019 तक 130 करोड़ आबादी को ग़रीबी से निकाल कर आज सुपर पॉवर हो गया है.

भारत 1989-1992 के बीच बाबरी दंगा से पहले चीन से बड़ी 500 बिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था था लेकिन आज चीन विश्व का मन्युफैक्चरिंग हब है, हम नहीं. वह आज हमारे लद्दाख व अरुणाचल प्रदेश में घुस कर तांडव कर रहा है और हमारा प्रधानमंत्री हमसे झूठ बोल रहा है कि न कोई घुसा था और न ही किसी ने कब्जा किया हुआ है.

अब जब चीन मुस्लिम देशों को मिला कर ‘वन बेल्ट वन रोड’ बना कर दुनिया में समुंदर से सुरक्षा या ट्रेड का महत्व ख़त्म कर रहा है, तब भी हमारे स्वघोषित देशभक्तों की आंखें नहीं खुल रही हैं. हम मंदिर-मस्जिद, हिजाब, तबलीगी जमात, मॉब लिंचिंग, गाय, गोमूत्र जैसी एकदम वाहियात बातों में फंसे हुए हैं.

अब जिस गति से अमेरिका का वर्चस्व लगातार कम होता जा रहा है उससे भी अधिक तेजी से चीन आगे बढ़ रहा है. दुनिया बदल गई है, अब यूरोप और अमेरिका का जमाना नहीं रहा. यह एशिया की सदी है जिसमें बड़े आबादी वाले देश भारत और चीन 80-90% तेल और गैस के लिए दूसरे देशों पर निर्भर हैं. अब कोई देश मुस्लिम देशों की उपेक्षा कर सुपर पॉवर नहीं बन सकता है, चाहे वह अमेरिका हो या रूस हो या फिर चीन ही क्यों न हो. भारत की तो कोई हैसियत ही नहीं रही क्योंकि दुनिया में जहां―

और हम कहां हैं –

शिक्षा, चिकित्सा, स्वास्थ्य, रोजगार, सुगम यातायात, न्याय जैसी मूलभूत आवश्यकताओं पर ध्यान देने की कोई जरूरत नहीं रह गई है. इनकी मांग करने वाले अर्बल नक्सल, देशद्रोही, धर्मद्रोही, आंदोलनजीवी और न जाने क्या-क्या हो जाते हैं. बस कोरी और दिखावे की आस्था को दुदृढ़ कीजिये, उसी से सब दुःखों का निवारण हो जायेगा.

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