अग्नि आलोक

कहां हैं गणेश शंकर विद्यार्थी

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राकेश श्रीवास्तव 

मानवीय मूल्यों की गायब होती संवेदनाओं के बीच पत्रकारिता मे संवेदना के बचे रहने की उम्मीद करना भी शायद बेमानी ही होगा।पर इसी देश मे कुछ इतने उंचे मापदंड और उस पर चलने वालों की इतनी समृद्ध परंपरा है कि आशा की किरण मन से विलुप्त नहीं होने पाती है।मेनस्ट्रीम कहलाने वाली पत्रकारिता को तो अनुशासन मे ही रहना है।भारी भरकम नाम और दाम वाले संस्थानों मे तो शायद सरवाइवल आफ द फिटेस्ट ही पढाया जाता होगा। तभी आज पूछना पड़ रहा है कि “कहां हैं गणेश शंकर विद्यार्थी”। पत्रकारिता करने वालों के लिए किसी संस्थान या विश्वविद्यालय से ज्यादा जरूरी है कि वह विद्यार्थी जी के जीवन से शिक्षा ग्रहण करे।समय मनुष्य की असली पहचान बनाता है और इतिहास मे उसका स्थान तय करता है। पत्रकारिता की शीर्षस्थ प्रतिमूर्ति गणेश शंकर विद्यार्थी अपने बलिदान के नब्बे वर्ष बाद भी उसी प्रखरता से चमक रहे हैं जैसे अपने जीवन काल मे।

विद्यार्थी जी का स्वपन समतामूलक आजाद भारत था।वह लोकमान्य तिलक को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।पर बाद मे वह गांधी जी प्रभावित थे।उन्होंने कांग्रेस के विभिन्न आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी की।अंग्रेजी शासन के अत्याचारों के विरुद्ध निडरता से लिखते थे। ब्रिटिश हुकूमत द्वारा 5 बार जेल भेजना भी इनको अपने मार्ग से डिगा नहीं सका। पर इसके साथ ही वह क्रांतिकारियों की भी खुलकर हर कदम पर सहायता करते थे।गणेश शंकर विद्यार्थी आम भारतीय नागरिक की तरह राष्ट्रवादी आंदोलन की क्रांतिकारी और अहिंसात्मक दोनो विचारों की पोषक थी।आम भारतीय गांधी को भी नायक मानता है और सुभाष चंद्र बोस को भी। वह गांधी को भी मानता है और भगत सिंह का भी दीवाना है। उसकी दृष्टि मे दांडी मार्च और काकोरी कांड दोनो राष्ट्रीय आंदोलन के गौरव के प्रतीक हैं।जब अंग्रेजपरस्त आबजर्वर,स्टेटसमैन जैसे अखबार चम्पारण आंदोलन के विरोध मे लिख रहे थे तब गणेश शंकर विद्यार्थी का “प्रताप” सीना ताने खड़े खड़ा था और  विद्यार्थी यातनाए भोग कर भी आंदोलन की खबरें छाप रहे थे।दूसरी तरफ उसी प्रताप का दफ्तर चंद्र शेखर आजाद और भगत सिंह जैसे लोगों के लिए हमेशा खुला था। वे विचारधारा के दो ध्रुव पर खड़े नायकों को अपना साथी मानते थे क्योंकि वह जानते थे कि सभी का एक ही उद्देश्य है कि अंग्रेजी हुकूमत का विरोध करके बाहर फेंकना। तभी तो देश पूछता है “कहां हैं गणेश शंकर विद्यार्थी” को आदर्श मानने वाले पत्रकार। 
26 अक्टूबर, 1890 इलाहाबाद में एक शिक्षक जयनारायण श्रीवास्तव के घर जन्मे गणेशशंकर विद्यार्थी आजीवन धार्मिक कट्टरता और उन्माद के खिलाफ लड़ते। उन्होंने लिखा था “मैं हिन्दू-मुसलमान झगड़े की मूल वजह चुनाव को समझता हूं. चुने जाने के बाद आदमी देश और जनता के काम का नहीं रहता।” यही धार्मिक उन्माद उनकी जिंदगी लील गयाताउम्र अपनी लेखनी के जरिए लोगों को धार्मिक उन्माद के प्रति सावधान करते रहे। 9 नवंबर 1913 को अपने तीन साथियों शिव नारायण मिश्र, नारायण प्रसाद अरोड़ा और यशोदानंदन के साथ मिलकर जिस कानपुर  में ‘प्रताप’ की नींव डाली थी उसी कानपुर मे 25 मार्च 1931 को शहर में हिंदू-मुस्लिम दंगे मे एक-दूसरे की जान लेने पर उतारू लोगों को रोकने निकले गणेशशंकर विद्यार्थी कई लोगों की जान बचाते बचाते उन्मादियों के शिकार बन गये।उन्होंने जो कलम से लिखा वही वास्तविक जीवन मे बलिदान कर के दिखाया। आज जब मुख्यधारा की पत्रकारिता करोड़ों, अरबों के कारोबार मे बदल गई है तब कहां है गणेशशंकर विद्यार्थी पूछना एक प्रलाप ही लगेगा। 
विधार्थी जी को सच्ची श्रध्दांजलि होगी देश से छुआछूत, जातिवाद, धार्मिक उन्माद जैसी स्थितियों से छुटकारा दिलाना, पूंजीवादी व्यवस्था ने जिस प्रकार जकड लिया है उससे मुक्ति।
(राकेश श्रीवास्तव स्वतंत्र लेखक एवं टिप्पणीकार हैं.

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