अग्नि आलोक

कहां हो रायपुर काॅफी हाउस?-4

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कनक तिवारी

(32) 1957 से 1969 के बीच के बारह वर्ष के रायपुर निवास के आखिरी तीन वर्ष पत्नी के नियंत्रण में आए। तब तक अपनी धुन में रहते सेहत का सफलतापूर्वक कबाड़ा काॅफी हाउस प्रेम में मैंने कर ही लिया था। पत्नी ने मुझ पर शिकंजा कसा बिगड़ी हुई गैरविवाहित आदत बहुत अनुशासन में बंध भी नहीं पाती थी। मैं फकत देह के साथ काॅफी हाउस नहीं जाता था। जिस्म से ज्यादा मेरा जेहन वहीं रहता था। तब आजकल की तरह विदेशी नस्ल के भोजन का चलन नहीं  था। पास्ता, पिज़ा, बर्गर, हैम्बर्गर वगैरह काफी हाउस में भी पनाह नहीं पा सके थे। लिहाज़ा पेट दोसा, इडली, सांभर वड़ा, सैंडविच, फेंच टोस्ट और अमूमन फिल्टर काॅफी का गोदाम बनता गया था। 

(33) हालत यह हुई कि हाइपरएसिडिटी और गेस्ट्रिक ट्रबल के कारण रायपुर के उस वक्त के सबसे बड़े डाॅक्टर प्रो. आर. एस. मेहता के पास जाना पड़ा। उन्होंने अच्छी देखभाल करने के बाद कहा कि आपके पेट का तो आॅपरेशन ही होगा। अपनी सेहत की आपने अगर इतनी फिक्र कर भी ली है। तो कुछ हम भी करेंगे। और कोई उपाय नहीं है। काॅफी हाउस में बैठकर लोगों का दिमाग चाटना और डींग मारना तो सरल रहा है। डाॅक्टर के सामने टेबिल पर लेटकर उसकी हिदायतों से बचना बेहद मुश्किल रहा। प्रो. मेहता को मेरा ट्रम्प कार्ड नहीं मालूम था। उनकी सुलक्षणा पत्नी हमारे ही काॅलेज में प्रो. आर. एन. त्रिवेदी के विभागाध्यक्ष के तहत इतिहास में एम,ए, कक्षा में भर्ती हुई थीं। हम लोगों का भी श्रीमती मेहता से परिचय था। मैंने उन्हें अपने बचाव में खड़ा किया। पति को समझाएं कि अंगरेजी साहित्य के छात्र को कांटे छुरी से क्या लेना देना। मैं तो सर्जरी को सजा-ए-मौत की तरह समझता हूं। मैडम ने सर को डांटा होगा। अगले दिन डाॅक्टर साहब पसीज गए। कोई दस बारह दवाइयां तथा हिदायतें लिखकर दे दीं। सर्जरी से बचे लेकिन बहुत दिनों तक सामने से समोसे, आलू बोंडे, दोसा, पकौड़ों वगैरह की सजी सजाई प्लेट पत्नी हाथ से छीन लेती। ऐसा लगता हम अकाल पीड़ित हैं। फिर भी किसी को एक मुश्त अनाज देने की दया क्यों नहीं आ रही है। बात चलती रही। तबियत थोड़ी सुधरी भी। मेरी पत्नी के कारण तो निश्चित तौर पर लेकिन कुछ कुछ डाॅक्टर मेहता की पत्नी के भी कारण। वे जहां कहीं रही हों तबादले के बाद। मैंने उनके बारे में अच्छा ही अच्छा सोचा। काॅफी हाउस आइडलर सदैव अहसानमंद होता है। 

(34) बात दिल्ली के टी हाउस की हो रही थी तो मुझे कलकत्ता (कोलकाता। नहीं) याद आया। वहां काॅलेज स्ट्रीट है। युवा मन में भुरभुरी पैदा करने का यह शब्द ‘काॅलेज‘ पूरी दुनिया में मशहूर है। रायपुर में चौबे कालोनी में काॅलेज स्ट्रीट पर ही मेरा निवास था। काॅलेज स्ट्रीट प्रसिद्ध रही है। वहां तमाम विषयों की चुनिंदा बहुत पुरानी अनोखी किताबें पटरी पर लगी दूकानों में आधे चौथाई दामों पर आसानी से मिल जाती थीं। सैकड़ों दूकानें, हजारों किताबें। मैंने भी कई किताबें खरीदीं। काॅलेज स्ट्रीट जाना पूरे दिन का शगल होता। तब भी सब कुछ देखा पहुंचा नहीं जा सकता था। किताबों के जरिए दुनिया हासिल करने की ललक अगर नहीं होती तो जवानी किस काम की होती। वड्र्सवर्थ ने फ्रांसीसी क्रांति के वक्त को लेकर कहा था ‘Bliss was in that dawn to be alive but to be young was very heaven. I बंगाल में भुआल सन्यासी मुकदमा बहुत मशहूर हुआ था दो सदी पहले। मामला अदालत में चला। हाई कोर्ट और प्रिवी कौंसिल तक भी शायद। पूरे मुकदमे की कहानी, रपट, जानकारी पृष्ठभूमि एक किताब में छपी पड़ी थी। उसमें किसी कीड़े ने बहुत ही बारीक छेद किए थे जो प्रत्येक पृष्ठ पर थे। मुझे किताब लेनी थी। दुकानदार ने कहा 50 रुपए में ले जाओ। मैं मोल भाव के मूड में था। मैंने कहा इस किताब के आपको 5 रुपए से ज़्यादा नहीं दूंगा। भले ही आप इसे न बेचें। दूकानदार ने कड़ाई से इंकार किया। फिर मैं दूसरी किताबें देखने लगा। उसे लगा होगा कि यह किरदार मनोरंजन की किताबें नहीं चाहता। शायद इसे गंभीर पढ़ना है। थोड़ी बहुत हील हुज्जत के बाद मुझे वह किताब उसने 5 रुपए में ही दे दी। वहीं मैंने ’आइने अकबरी’ भी खरीदी और न जाने और कितनी किताबें। 

(35) दिन भर बकझक के बाद सामने टी हाउस में जाना जाना होता। वह टी हाउस नामधारे था लेकिन काॅफी हाउस जैसा लगता था। एक साथ बड़े हाल में सैकड़ो ग्राहक बैठ सकते थे। टेबलें भरी हुई हों लेकिन जिसे जहां जगह मिले बैठ सकता है। भद्र समाज चाय काफी की प्यालियां, नाश्ते की प्लेटें सिगरेट का गहराता धुंआ बड़ी संख्या में लड़कियां और स्त्रियां भी। बंगाली बहुत खूब बोलते हैं याने बहुत बोलते हैं और बहुत अच्छा भी बोलते हैं। बंग भाषा की मधुरता चीख को भी तरन्नुम में बदल देती है। वेटर आकर पूछता ’क्या चाहिए’ तो बताना मुश्किल होता। अगल बगल में चीख पुकार मची हुई है। कई बार उसके कान में कहना होता। तो कभी लिखकर देना होता। जितनी देर चाहे टी हाउस में बैठो। फिर निकलकर अपनी किफायतसारी वाली खरीद में लगो। किताबों का बंडल उठाए अपने होटल में आओ। फिर अगले दिन वह नेमत लेकर रेलगाड़ी में बैठकर लौटो। इस महानगर में लगभग चीखती भीड़ में बैठकर एकाकीपन में सार्वजनिकता का जो अहसास होता है। उससे जिंदगी को एक नया आयाम मिलता है। मैं वहां बहुत देर तक बैठा रहता । मुझे फिर जोसेफ एडीसन और एलक्जेंडर पोप की याद आने लगती। दोनों एम ए के पाठ्यक्रम में थे। मैं इनकी सोहबत में रहा हूं। उनसे आत्मा के अंतरण का अजीब अनुभव होता था। 

(36)  अंगरेजी साहित्य के मध्यकालीन इतिहास में कई तीसमारखां लेखक हुए हैं। उनमें जाॅन ड्रायडन, अलेक्जेंडर पोप, जोसेफ स्टीफेन और स्टील काॅफी हाउस को इन्सानी भलाई का श्रंृगार कक्ष या कभी युद्ध स्थल या कभी कल्पना महल बनाने की महारत हासिल कर गए हैं उन दो तीन शताब्दियों के नायाब अंगरेजी गद्य के ऊपर ‘काॅफी हाउस साहित्य‘ का ठप्पा लग गया। अचानक उन सबकी याद आ रही है। अलेक्जेंडर पोप तो हरिशंकर परसाई से कहीं ज़्यादा व्यंग्य की सीधी मार करते थे। लिख गए that ….whose frartic wife elope curses wit and poetry and pope. उनकी कविता में वाग्मिता निर्झर की तरह बहती थी। उसमें डूब उतराकर कई बडे़ लेखक समीक्षक बनते रहे। कहते हैं उसकी तमाम प्रेरणा काॅफी हाउस मैं बैठकर उत्पन्न, उन्नत और सुलभ स्वयमेव होती रहती थी। 

(37) जोसेफ एडीसन मेरा प्रिय गद्य लेखक रहा है। मैंने उसे पहले पढ़ा, फिर पढ़ाया भी। काॅफी हाउस के कोने की टेबिल पर बैठकर वह हर आने जाने वाले को देखता रहा होगा। मैं यह कल्पना करता कि वह फिर शायद कल्पना करने लगता होगा कि यह कौन है जो अभी अभी घुसा है। इसका क्या नाम क्या होगा? यह किस शहर, गांव या मोहल्ले में रहता होगा? इसके घर में कौन कौन होंगे? शादी हुई कि अभी तक कंवारा है। कितने बच्चे हैं? क्या कर रहे हैं? बीवी से पटती है कि नहीं? या उसे छोड़ने वाला है? हां, शायद यह फलां अखबार में काम करता होगा। वहां इसकी उदास लेकिन तीखी आंखें नागर सभ्यता की इबारत को पढ़ रही होंगी। यह ज़रूर सत्ता के खिलाफ तीखा लिखता होगा। इसके सहकर्मी भी इससे सहमते होंगे। अरे लेकिन अब तो यह दूसरा मोटा आदमी कहां से आ गया। यह तो सेना का रिटायर्ड कर्नल दिखाई देता  है। अब करता धरता तो कुछ नहीं होगा। पेंशन और सुविधाएं डकार रहा होगा। एडीसन दिन भर न जाने कितने चरित्रों को असल जिंदगी में काॅफी हाउस की गोद में बैठकर अपनी अंतर्मुखी प्रतिभा में ढूंढता रहता था। फिर उसने ‘स्पेक्टेटर‘ में, ‘कवर्ली पेपर्स‘ में कर्नर रोजर का आविष्कार किया। फिर उनका जिंदगीनामा लिखा। 

ऐसा ही तो नवभारत के रम्मू श्रीवास्तव,हितवाद के बोधनकर भास्कर के रमेश नैयर को कर ही लेना चाहिए था। काफी हाउस ही तो उनका गुरूकुल था।

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