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एशिया को कहां ले जाएगी हथियारों की होड़

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अरुणेश पठानिया
दुनिया के दस सबसे बड़े हथियार खरीदार देशों में भारत-चीन समेत आठ एशियाई देश हैं। तीस साल से भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार खरीदार देश बना हुआ है। भारत, पाकिस्तान और चीन के बीच चल रहे तनाव का ही नतीजा है कि दुनिया भर में पिछले पांच सालों में बिके 19 फीसदी हथियार इन्हीं तीन देशों ने खरीदे हैं। इसमें भारत की हिस्सेदारी 11 फीसदी है। एशिया के इस इलाके में हथियारों की जैसी होड़ लगी है, स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट (Sipri) की ताजा रिपोर्ट इसकी चिंताजनक तस्वीर पेश करती है।

डंपिंग ग्राउंड
अगर हथियार खरीदने-बेचने के Sipri के आंकड़ों पर गौर करें तो साफ दिखता है कि किस तरह से पश्चिमी देश एशियाई देशों के डर को कैश करते हुए इस क्षेत्र को खतरनाक हथियारों का डंपिंग ग्राउंड बना रहे हैं।

हाल निर्यात का
चीन पांचवां सबसे बड़ा खरीदार और चौथा बड़ा निर्यातक भी है। भारत के लिए यह चिंताजनक है। हालांकि स्वदेशी हथियारों में ब्रह्मोस मिसाइल, तेजस लड़ाकू विमान, आकाश मिसाइल, प्रचंड और रुद्र हेलिकॉप्टर जैसे हथियार विकसित कर भारत निर्यात की दिशा में बढ़ रहा है, फिर भी भारतीय हथियार निर्यात दर 0.2 फीसदी से अधिक नहीं है। रक्षा मंत्रालय ने साल 2024-25 तक डिफेंस एक्सपोर्ट को 35 हजार करोड़ करने का लक्ष्य रखा है। हथियारों की खरीद की होड़ से बाहर निकलने में भारत लंबा वक्त लगेगा, लेकिन केंद्र सरकार की नीतियों से साफ है कि आने वाले दशकों में भारत काफी हद तक इससे बाहर आ सकता है। वहीं हथियार बेचने के मामले में अकेले अमेरिका की हिस्सेदारी 40 फीसदी है, जबकि चीन समेत इक्का-दुक्का हथियार उत्पादक एशियाई देश इस वैश्विक हथियार बाजार का 10 फीसदी हिस्सा ही हैं।

भारत ने घटाई खरीद
बीते पांच सालों में भले दुनिया में भारत सबसे बड़ा खरीदार रहा है, लेकिन 2013-17 के मुकाबले उसने 11 फीसदी खरीदारी कम की है। सीमा पर तनाव के बावजूद केवल जरूरी रक्षा सौदे ही किए जा रहे हैं। सिपरी का कहना है कि भारत की हथियार खरीदने की प्रक्रिया जटिल और धीमी हुई है और उसने स्वदेशी तकनीक और मेक इन इंडिया पर जोर दिया है। इसके अलावा आयात को कम करने के लिए भारत में निर्मित हथियारों के लिए अलग बजट का प्रावधान, रक्षा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा को 49 प्रतिशत से बढ़ाकर 74 प्रतिशत करना और कई हथियारों की खरीद पर प्रतिबंध लगाने जैसे कदम शामिल हैं। लेकिन हथियार स्वदेशी हों या विदेशी, उनकी होड़ किसी के लिए भी अच्छी नहीं कही जा सकती। यह अच्छा है कि भारत कम से कम स्वदेशी के जरिए ही हथियारों की वैश्विक राजनीति से बाहर आने की कोशिश तो कर रहा है।

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