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कौन बड़ा और कौन छोटा?*

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शशिकांत गुप्ते

बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर
पंथी को भी छाया नहीं फल लागे अति दूर

उक्त दोहे में संत कबीरसाहब मानव के बड़े होने का वास्तविक प्रमाण क्या और कैसे होना चाहिए यह स्पष्ट किया है।
सिर्फ उम्रदराज होना,या बहुत पढालिखा होना,या बहुत सारी उपलब्धियों प्राप्त होना,या विपुल धन दौलत होना,सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त होना किसी खेल में राष्ट्रीयस्तर का ख़िलाडी होने का गौरव प्राप्त होना और अन्य किसी क्षेत्र में उपलब्धि प्राप्त करना बडे होने का प्रमाण नहीं है।
बड़ा होने का वास्तविक अर्थ समझदार होना। समझदार होना तो ईमानदार होने से भी श्रेष्ठ है।
कबीरसाहब ने उक्त दोहे में बड़े होने की व्यंग्यात्मक तुलना खजूर के पेड़ से की है। खजूर का पेड़ ना तो राहगीर को छाया ही दे सकता है,और खजूर के पेड़ से फल तोड़ना भी आसान नहीं है।
इस मुद्दे पर आगे क्या लिखा जाए,यह सोच ही रहा था, उसी समय सीतारामजी का आगमन हुआ।
सीतारामजी ने कहा कि,सबसे बड़ा वह व्यक्ति होता है,जो आमजन की समस्याओं को समझे,और आमजन की समस्याओं को सच में हल करने के लिए इमानदारी से प्रयत्न करें। जो सिर्फ संयोग से बड़ा होता है,वह आमजन की समस्याओं को छिपाने की कोशिश करता है। जैसे बहुत से लोग एक ओर इस श्लोक को रटते रहतें हैं,अतिथि देव भव
मतलब अतिथि को देवता तुल्य मानतें हैं। दूसरी ओर अतिथि देवता के आगमन के पूर्व घर की वास्तविकता दयनीयता को पर्दे से ढाक लेतें हैं। सियासत में पर्दे की जगह दीवार का उपयोग किया जाता है।
तात्पर्य यथार्थ को स्वीकारने के साहस नहीं होता है और नाम बड़े और दर्शन खोटे वाली कहावत को चरितार्थ करतें हैं।
जो व्यक्ति यथार्थ को स्वीकार ने से डरता है,वह व्यक्ति स्वयं को बनावटी बाह्य श्रृंगार से सुशोभित करने की छद्म कोशिश करता है।
व्यक्ति के बड़े होने का प्रत्यक्ष प्रमाण है, वह व्यक्ति जिसे क्रांतिकारी नेताजी सुभाषचंद्र बोसजी ने सर्व प्रथम राष्ट्रपिता कहा है। विश्वविख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन Albert Einstein ने जिस व्यक्ति के लिए कहा है कि,इतिहास साक्षी होगा कि शारीरक रूप से कमजोर लेकिन आत्मबल से सशक्त व्यक्ति ने इतनी महान क्रांति कर दी।
यह व्यक्ति और कोई नहीं है हमारे परम पूज्य महात्मा गांधीजी हैं।
सीतारामजी ने इसतरह लेख पूर्ण करने में मेरी मदद की।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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