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*मप्र में काग्रेस के वर्तमान हाल के लिये कौन जिम्मेदार है ?* 

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रमाशंकर सिंह

पूर्व मंत्री मध्यप्रदेश 

विशेष रूप से ग्वालियर चंबल क्षेत्र में भाजपा को मजबूत करने में राजमाता विजया राजे सिंधिया की भूमिका महत्वपूर्ण रही है , सभी इसे स्वीकार करते हैं। राजमाता को कांग्रेस में लाने की पहल पंडित नेहरू ने की थी, यह भी एक खुला तथ्य है। पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्र की कांग्रेस सरकार गिराने में भी राजमाता की प्रमुख भूमिका थी! 

अब माधवराव सिंधिया (स्मृतिशेष) को कांग्रेस में लेकर चुनाव लड़ाने और मंत्री बनाना राजीव गांधी काल में हुआ। इसी के बाद इस अंचल में धीरे-धीरे कांग्रेस संगठन के सारे फैसले उन्हीं पर छोड़े जाने लगे। हर जिले में एकाध विधायक टिकट को छोड़कर अधिकांश उम्मीदवार सिंधिया की मर्जी से तय होने लगे। पुरानी मूल कांग्रेस के कार्यकर्ता या तो सरेंडर होने लगे या फिर कांग्रेस से दरकिनार होने लगे। फिर ज्योतिरादित्य सिंधिया को सोनिया गांधी ने कांग्रेस में सदस्य बनाकर संसद सदस्य और मंत्री बनाया और संगठन पहले की तरह इसी परिवार के कुलदीपक के हवाले रहा। ८ जिलों का सारा और  पांच छ य: जिलों में एक एक सीट का  दारोमदार पहले की तरह ही सिंधिया के हवाले रहा। कांग्रेस नाम की चीज 1984 से ही पूर्णतया जयविलास महल में गिरवी रख दी गई! एक नई कांग्रेस  खडी की गई – सिंधिया कांग्रेस ! 

राहुल गांधी बल्कि पूरे गांधी परिवार की निकटता ज्योतिरादित्य सिंधिया से बढ़ती गयी यहॉं तक कि औपचारिकता के तमाम बैरियर टूटते गये। सुबह शाम की वर्जिश , खेल कूद , रात्रिभोज सब साथ साथ ! राजीव गांधी तक ग्वालियर में आकर कभी भी जयविलास में नहीं रुके लेकिन राहुल गांधी ने यह भी तोड़ दिया और सबने देखा कि वे निक्कर पहन कर ज्योतिरादित्य के साथ सायंकालीन दौड़ कर रहे थे।  दिल्ली मेंएक दूसरे के निवास पर बगैर समय निर्धारित किये दोनों का आना जाना लगभग रोज ही हो गया। 

कमलनाथ की अल्पकालीन सरकार को निर्देश था कि सिंधिया के सभी निजी काम किये जायें और हुये भी । सभी यानी सब ! जब सारे काम सम्पन्न हो गये तो बहाना और मौका पाकर कमलनाथ की सरकार को उनके अहंकार और एक दूसरे पूर्व मुख्यमंत्री के गहरे षड्यंत्र के मिलेजुले कारणों से गिरी । सिंधिया को सत्ता  की सीधे जरूरत थी और भाजपा इस मौके को क्यों न भुनाती ? 

इसमें देखने की बात यह है कि मप्र में कांग्रेस को खत्म कर इतने सारे जिलों में सिंधिया कांग्रेस बनाने में शीर्ष नेतृत्व के अलावा और किसी की भूमिका न थी। बाकी जिलों का भी यही हाल बन चुका था जहॉं दो कांग्रेस और पनप चुकी थीं कमलनाथ कांग्रेस और दिग्विजय कांग्रेस ! कमलनाथ ने2024 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा में जाने की पूरी कोशिश की जहॉं के दरवाज़े पर सिंधिया डटकर खड़े थे इसलिये कमलनाथ कमलगच्छामि न हो सके , लौटकर पुन: कांग्रेस में है और जब चाहते हैं सोनिया गांधी से मिल लेते हैं , जब कि मामूली हजारों लाखों सदस्यों कार्यकर्ताओं  के लिये यह ताजिंदगी  सपना ही रहता है  । दिग्विजय की मप्र में आज भी उनका सत्ता जाने के 22 साल बाद भी इतनी जबरदस्त अलोकप्रियता है कि जहॉं चले जायें वहॉं सूपड़ा साफ होता चला जाये । बडे पैमाने पर सरकारी भ्रष्टाचार इन्हीं राजा साहब के राज में शुरु हुआ जै आज शिखर पर है ! राहुल गांधी की सबसे निकट की मित्रमंडली उप्र पंजाब दिल्ली मप्र राजस्थान महाराष्ट्र आदि राज्यों में या तो भाजपा में जा चुकी है या कभी भी उचित सौदेबाजी की चाह में छोड़ सकती है।  

गलती किसकी है ? संतुलन किसनें खत्म किया ? चापलूस या निकटस्थ  नेताओ को किसने सर्वाधिकार  दिये ? जमीनी कार्यकर्ताओं की राजनीतिक  हत्या  किसने होने दी ? संगठन  की प्राथमिकता और स्वरूप को किसने बर्बाद किया ? 

निष्पक्ष रूप से देखिये जानिये तो सिर्फ और सिर्फ गांधी परिवार – सोनिया गांधी और राहुल । दीदी भी एकाध  राज्य अपने जिद्दी प्रयोग में साफ कर जाती हैं मसलन पंजाब । 

भ्रष्टाचार का पोषण  करना और लाभान्वित होना इस तरीके से आसान रहता है कि किसी पद पर मत रहो लेकिन सब नियंत्रण में रखो ! अहमद पटेल जैसे तेज सैक्रेटरी और मोती लाल वोरा टायप गबदू कोषाध्यक्ष क्यों बनाये जाते रहे हैं ? किसी को यह ग़लतफ़हमी तो नहीं कि चुना हुआ अध्यक्ष  वास्तव में चुना है और वो अपनी मर्जी से काम कर सकता है? लेकिन यह हाल तो लगभग सभी गैर कम्युनिस्ट दलों का है , वंशवादी दलों का तो सबसे ज्यादा ही । 

छग में यह जानते  हुये भी कि मुख्यमंत्री  भारी भ्रष्टाचार  में लिप्त है जैसे कि आजकल  कर्नाटक में उपमुख्यमंत्री  और तेलंगना मे मुख्यमंत्री का हाल है , शीर्ष नेतृत्व उनके खिलाफ कुछ नहीं सुनेगा! जब तक दिल्ली में चंदा जा रहा है तब तक बिल्कुल नहीं । मजे की बात है यह भी है कि भ्रष्ट  बुरा है लेकिन भ्रष्ट को बनाना और बनाये रखना उन्हें बिलकुल भी बुरा नहीं लगता जो बुद्धि और लेखन के अजीर्ण  से पीड़ित हैं  जबकि पहली लात शायद उन्हीं को लगती रहेगी  ! 20 साल तक एक ऐसे पूर्व मुख्यमंत्री को पार्टी का पदाधिकारी  बना कर रखा जिसने महाराष्ट्र कर्नाटक बिहार यूपी जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में प्रभारी के नाते प्रत्याशियों से बड़ी रकम खाई यह जानते हुये भी कि यह जीतेगा नहीं  । यहॉं के स्थानीय नेताओं ने पार्टी नेतृत्व  को प्रमाण सहित शिकायतें कीं पर सब सुना पढा और जो हो रहा था सो आगे भी दशकों तक होने दिया । 

विगत चालीस बरसों में तीन चार स्थानीय और कई बाहरी पत्रकारों ने यह समूचा घटनाक्रम देखा है चाहे उन्हें अंदरूनी जानकारी पूरी न हो और एकाध चाहे हर चुनाव में टिकिट आकांक्षी  भी रहता है । मैंने भीतर और बाहर से सब कुछ होते देखा  और जाना है। गांधी परिवार संगठन में नहीं क्षत्रपों पर यकीन करता है   राजनीतिक जमींदारों में विश्वास है।  पार्टी के न्यास ट्रस्ट को अवैधानिक  रूप से कैसे निजी पारिवारिक न्यासों में बदलकर सम्पत्ति को अपने कब्जे में किया  है इस पर फिर कभी ! 

चापलूस चमचे और विद्वान लेखक यहॉं आकर यह सवाल उठायेंगें कि भाजपा पर प्रश्नचिन्ह क्यों नहीं ? भाजपा तो इन से बहुत आगे निकल चुकी है तमाम धतकर्मों में और यही एकदिन उनके अवसान का कारण भी बनेगा।  लेकिन जो आलोचक हैं विरोधी है उनको खुद स्वयं पाकसाफ रहना होगा जिसके लिये यह लिखा  जाता है अन्यथा  अंतर क्या रहेगा ? समस्या एक बडी यह है कि जो लिख बोल सकते हैं वे न जाने किस लालच में सच नहीं कह रहे! कई तो कांग्रेस की निकट संस्थाओं  में नौकरी करने या नियमित वित्तपोषण  की चाहत में चुप्प  रहने लगे हैं ?

रमाशंकर सिंह पूर्व मंत्री मध्यप्रदेश 

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