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इन गुनाहों का देवता कौन है

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सुरेंद्र बंसल 

मेरा  शहर बहुत निर्मम हो गया है..

हर दिन हरे भरे बड़े फैले पेड़ों को काटा जा रहा है… सबके अपने स्वार्थ हैँ… लोग पैसा उगाना  चाहते हैँ… इसलिए उगे हुए पेड़ों को काटा जा रहा है.. जमे हुए को जमीन से उखाड़ा जा रहा है…. उस होटल वाले का बड़ा रसूख  है उसने सामने की ग्रीन हरियाली को बगीचे में बदल दिया है…. जहाँ उसके कर्मचारी खाने की छुट्टी  में दोपहर का भोजन लेते हैँ.. अब पेड़ों को भोजन नहीं मिलता वे सूख  रहे हैँ  उन्हें सूखा देना कुछ लोगो का अपना सुख  है… पेड़ काट देने से उसके होटल का व्यू सडक से दिखता  है… वही बिज़नेस  की मल्टी बनाने वाला भी मुख्य सडक से अपना कंक्रीट दिखाना चाहता है जो इन पेड़ों से  कई गुना ऊंची ईमारत खड़ी कर रहा है…. सूत्र कहते हैँ सडक से बिल्डिंग दिखती नहीं इसलिए पेड़ काट रहे हैँ… काट नहीं रहे ये तो हत्या कर रहे हैँ…. चौराहे पर ऊँचे ऊँचे स्क्रीन पोल लगा रहे हैँ उन्हें भी पैसा कमाना है  पेड़ आड़े आ रहे दूर से दर्शन में…. काट दिए पेड़ अब ठीक है उनके लिये…. पेड़ों के कोई माई बाप नहीं है… कोई भी नहीं सभी अनाथेश्वर  हैँ, उन्हें खुरच दो, तोड़ दो, काट दो या मार दो  उनके लिये कोई है ही नहीं… पेड़ बस अपने आँसू  रोते हैँ, आवाज़ नहीं करते.. मनुष्य  को हवा, मानसून, ईधन, लकड़ी देते  शहीद  हो जाते हैँ… वे बस लोगों के जीवन के लिये जीते हैँ और लोगों की मार से मर जाते हैँ… उनका अपना कोई है नहीं.. सरकार बजट बनाकर पेड़ उगाती है फिर विकास के नाम पर काट देती हैँ..  आँख  खोलकर पेड़ लगाते हैँ ताकि पेड़ों के संरक्षण  का सन्देश प्रसारित हो… जब कटते  हैँ माननीय आँख मूंद कर so जाते हैँ… अफसर भी रसूख  देख कर हरकतें करते हैँ और पैसा देखकर  लपलपाते  हैँ.. आखिर पेड़ कटते हैँ हर रोज़ कटते हैँ लेकिन उगता हैँ पैसा हर दिन किसी न किसी मद में… कोई नहीं सोचता पेड़ों में भी हमारी तरह ही जान है… हम उन्हें हर दिन मार रहे हैँ एक हत्यारे की तरह….आखिर  इन गुनाहों का देवता कौन है…

*सुरेंद्र बंसल*

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