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कौन होता है सद्गुरु? किसे कहा गया है गुरूर्ब्रह्मा-गुरूर्विष्णु-गुरूर्देवो महेश्वरः …

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~ डॉ. विकास मानव

(ध्यानप्रशिक्षक, निदेशक : चेतना विकास मिशन)

_पूर्णत्व के लिए अहम है आपके सिर पर सद्गगुरू का वरद-हस्त. जिसे  “अभीप्सा” होती है सद्गुरु की ; उसे अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती, क्योंकि ऐसे पात्र की खोज सदगुरु को भी रहती है. भगवान भी चाहता है वास्तविक भक्त. वस्तुतः तो इंसान का अंतस ही वास्तविक गुरू होता है, लेकिन इसकी आवाज सुनने और तदनुसार प्रगतिपूर्ण गति करने में समर्थ नहीं होते जडताजनित, घामड़ता ग्रसित कूपमंडूक लोग. उनके लिए गुरु ही जीवन बनता है._

मनुष्य जीवन में सबसे सार्थक घड़ी तब आती है जब जीवन में सदगुरू का पदार्पण होता है. उससे पहले जीवन मृत्यु-यात्रा से अधिक कुछ नहीं होता.

    _सदगुरू मिलते ही हमारी आत्मा मे पंख लग आते हैं. पहली बार ‘मनुष्य जन्म लेना” कितने की गरिमा की बात है : ये अहसास होता है._

  सदगुरू प्रकृति प्रदत्त सबसे अमूल्य तोहफा है. उससे हम पर अनेक तोहफे वरदान के रूप में बरसते रहते हैं. वह जीवन को आंतरिक आनंद से सराबोर कर देता है.

 सद्गुरु वह नहीं होता जो आपसे पहले श्रद्धा- विश्वास की बात करे. सद्गुरु वह नहीं होता जो अनुचरों की दौलत से अपना साम्राज्य खड़े करे. सद्गुरु वह नहीं होता जो आपसे तन-मन-धन के समर्पण की बात करे. सद्गुरु वह नही होता जो आपसे कोई भी भौतिक चीज चाहे.

    _◆सद्गुरु वह होता है जो आपको आपसे मिलाने, परमानंद का अनुभव कराने का स्टेज दे : बिना आपसे कुछ- भी स्वीकारे. वह दाता होता है, याचक या लुटेरा नहीं._

      _जहाँ तक मेरी बात है, मेरा अस्तित्व परम्परा की परंपरा का अतिक्रमण कर अभिनव/जीवंत परम्परा के सूत्रपात का साहस रखता है. यानी समूचे गर्हित अतीत को अस्वीकारने का साहस. मैं गुरुडम को अस्वीकार करता हूँ : कोई लघु-दीर्घ नहीं, समत्व. जो मूलतः तुम हो, वही मैं हूँ. तुम न जानो-मानो, खुद को ज़िस्म का लोथड़ा ही स्वीकारो तो ये तुम्हारी असाध्य बीमारी है, मेरी नहीं. मैं प्रेम और मैत्री को मार्ग बनाया हूँ. ऐसा नहीं है कि इसका कोई उदाहरण अतीत में है ही नहीं. पृथ्वी के इतिहास में समग्रता/ संपूर्णता को साकार करने वाले एकमात्र किरदार कृष्ण शिष्य नहीं सखा/सखी बनाये और विशुद्ध प्रेम का ही मंत्र दिए._

  *चेतना विकास मंच :* 99

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