| क्यों याद करूँ प्रेमचंद को ? किस काम के हैं वे ? क्या वे किसी को रोज़गार दिलाने में मदद कर सकते हैं ? क्या वे हिन्दू की पहचान वापस दिला सकते हैं ? फिर भी हम उन्हें याद करें और उनके लिए लड़ें ? जी हाँ, लड़ना तो पड़ेगा ही। जिसे अपने लेखन के आरम्भ में अँग्रेज़ी शासन का कोप सहना पड़ा, प्रतिष्ठित होने लगे तो अपने ‘ब्राह्मण विरोधी ‘ होने के कारण ऊँची जातियों के मुक़दमे झेलने पड़े,सवा सौ साल होने पर ‘दलित विरोधी ‘ होने के नाते उनकी पुस्तकें जलायी गईंऔर अब उनके “हिन्दू ” मन की खोज शुरू हो गयी है, तब ऐसे विवादास्पद लेखक को याद करके हम लड़ने से कैसे बच सकते हैं? आप यह न सोचें कि मैं किसी दुराग्रह से ‘हिन्दू मन ‘ की बात उठा रहा हूँ। आरएसएस के घोर हिमायती और तथाकथित बुद्धिजीवी अंनत विजय ने उनके ‘हिन्दू मन ‘ पर पूरा लेख लिखा है। चालीस-पैंतालीस साल पहले से कमल किशोर गोयनका जो आधारभूमि तैयार कर रहे थे, उस पर भवन निर्माण शुरू हो गया है। अब आप बने -बनाये विचारों से, बार-बार दोहराये गये उद्धरणों से यह लड़ाई नहीं लड़ सकते ! जिस तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एक-एक कर आदिवासियों को,फिर दलितों को,फिर पिछड़ों और अति पिछड़ों को,पढ़े-लिखे मध्यवर्ग को और किसानों के बड़े हिस्से को अपने प्रभाव में लिया है,उसका अनुभव हमारे सामने है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ पूँजी की ताक़त भी है और आपके पास पूंजी की तो बात ही छोड़ दीजिए आपस की एकता भी नहीं है ! प्रेमचंद साम्राज्यवाद का खुलकर विरोध करनेवाले और स्वदेशी के पक्ष में खुलकर तर्क देनेवाले सुप्रसिद्ध लेखक हैं। लेकिन आज साम्राज्यवाद की कुटिलता,उसके अंतहीन शोषण और बर्बरता की बात कोई नहीं करता ! राष्ट्रीय हित के लिए अमरीका की रणनीति में हम घुल-मिल गये हैं। यह भुला दिया गया है कि यही अमरीका संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर के मुद्दे पर पचासों बार भारत के ख़िलाफ़ खड़ा हो चुका है,इसी अमरीका ने ‘भारत के विखण्डन ‘ की योजना बनायी थी, इसी अमरीका में खालिस्तानी आतंकवादियों को प्रशिक्षण दिया जाता रहा है, इसी अमरीका ने कश्मीरी आतंकवाद को धन और ट्रेनिंग दी है ! युवाओं में आज न अमरीका विरोधी चेतना है, न स्वदेशी का चाव ! इसलिए इन मुद्दों से प्रेमचंद के द्वारा आप अपने युवाओं को साथ जोड़ सकते हैं, यह संदिग्ध है। राजनीतिक चिंतन की तरह साहित्यिक विश्लेषण में भी आपको नये औजारों की, नई भाषा की ओर नये सिरे से तथ्यों को खोजकर अलग पद्धति से संवाद करने की ज़रुरत है। समस्या यह है कि हम इतने जड़ और दुराग्रही हो चुके हैं जो नई चेतना के विकास में बाधक है। हम अस्मिता के नाम से जातिगत आधार पर शत्रुता करते हैं, लेकिन “हमारी ” जातियों का बहुमत संघ के साथ चला जाता है ! आज यह कोई नहीं कह सकता कि केवल ब्राह्मण या सवर्ण संघ के साथ हैं। उनकी आबादी अल्पजन की है, बहुजन में कौन उनसे दूर है ? इस सफलता के कारणों पर अनुसंधान करने वालों को ये कूढ़मगज फौरन ‘संघी ‘ करार दे देते हैं ! आज सुबह इतिहासकार हितेंद्र पटेल और श्रेष्ठ कवि कृष्ण कल्पित ने प्रेमचंद को लेकर महत्वपूर्ण पोस्ट लगायी हैं। हितेंद्र ने प्रेमचंद पर स्वयं स्फूर्त आयोजनों को लेकर उठने वाली सम्भावना पर बात की है। कल्पित ने प्रेमचन्द और निराला को अमर बताकर उनके माध्यम से हिंदीभाषी अस्मिता की पहचान का सवाल उठाया है। मैं हितेंद्र और कल्पित की चिंताओं से ही नहीं, उनके सुझावों से भी सहमत हूँ। इन दोनों के ज़रिए हमारी जो पहचान बनेगी, वह न दलित होगी, न ब्राह्मण, वह न हिन्दू होगी,न मुसलमान,न रूढ़िवादी होगी न पश्चिम -परस्त, न अशिक्षित होगी न ज्ञान-दम्भी । इनके साहित्य को नये सिरे से पढ़ने पर हमें भी नई भाषा मिलेगी, चिंतन के नये औज़ार मिलेंगे, विश्लेषण के नये रास्ते मिलेंगे। इसलिए प्रेमचंद को,इसके साथ ही निराला को याद करना हमारे लिए अत्यंत ज़रूरी है। उनसे हमारी नई सामाजिक पहचान भी बनेगी और राष्ट्रीय आत्मसम्मान भी मिलेगा !
– सुप्रसिद्ध इंसानियत और जनवादी विचारधारा के लेखक अजय कुमार तिवारी के फेसबुक वॉल से प्रस्तुतकर्ता – श्री बी एम प्रसाद, लखनऊ, संपर्क – 94151 50487 संकलन – निर्मल कुमार शर्मा, गाजियाबाद ,उप्र ,संपर्क – 9910629632
| |