डॉ. विकास मानव
रामायण में इंद्र के गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या के साथ व्यभिचार करने और परिणाम स्वरूप ऋषि द्वारा दोनों को श्राप देने की कथा का विस्तार से वर्णन किया गया है (रा० बाल०५०/११ तथा उत्तर० -३०/२१-४६)।
इसका संकेत श० ब्रा०३/३/२/१८ में भी उद्धृत है।
संपूर्ण वैदिक साहित्य में अहल्या का स्वरूप अत्यंत अस्पष्ट है।
अहल्या का जार बताने के अतिरिक्त इंद्र के विषय में भी और कुछ नहीं कहा गया प्रतीत होता है। यह कथा लोक विश्वास में सुरक्षित चली आई और रामायण काल में आकर सुंदर रूप से विकसित हुई।
वास्तविक एवं प्रमुख विकास के बाद में होने से कथा में परवर्ती तत्व आ जाने स्वाभाविक ही थे।
अतः मुख्य कथा का राम से घनिष्ठ संबंध हो गया रामायण में ऋषि गौतम को अहिल्या का पति बताया गया है।
बालकांड की कथा के अनुसार इंद्र एक बार गौतम ऋषि का रूप धारण करके आते हैं और अहिल्या से संगम की याचना करते हैं। जब अहिल्या को पता चला कि साक्षात देवराज इंद्र ही मेरे पास आए हुए हैं, तो उसका चित्त चंचल हो जाता है।
गौतम ऋषि को जब दोनों के कुकृत्य का पता चलता है तो वे इंद्र को शाप देकर नपुंसक बना देते हैं और अहिल्या को भी अपना स्थूल शरीर छोड़कर अदृश्य सूक्ष्म रूप से वायु भक्षण करते हुए आश्रम में रहने का श्राप देते हैं।
किंतु साथ ही यह विधान कर देते हैं कि राम के इस आश्रम में प्रवेश से उसे अपना प्राचीन रूप से प्राप्त हो जाएगा।
रामायण के उत्तरकांड में बालकांड की कथा से इतना अंतर है कि यहां अहिल्या अपनी इच्छा से आत्मसमर्पण नहीं करती। इंद्र को वह उसके छद्म वेश के कारण गौतम ही समझती है (उत्तर ०३०/४२)।
अहिल्या के विषय में कहा जाता है कि वह त्रिलोक में अनुपम सुंदरी थी प्रजापति ने प्रजा के सौंदर्य का चार भाग लेकर उसका निर्माण किया था। हल्य ( कुरूपता) के अभाव के कारण वह अहल्या थी।
रामायण उत्तर कांड की ये कथा ब्रह्मपुराण के सतासीवे अध्याय में सुंदर रूप से विकसित की गई है। समस्त पौराणिक साहित्य में संभवत इसका सबसे उत्तम रूप यही प्राप्त होता है।
जहां तक इस कथा के भौतिक अथवा देव शास्त्रीय आधार का प्रश्न है उसकी व्याख्या मीमांसकों ने बहुत पहले ही संतोषजनक रूप से कर दी थी।
जैमिनी सूत्र ९/१।४२-४४ की बात करते हुए तंत्र वार्तिक मे कुमारिल भट्ट ने कहा है की अहल्या शब्द रात्रि का वाची है अहन् या दिन में लीन हो जाने के कारण रात्रि अहल्या कहलाती है और सूर्य ही इंद्र है।
जार का अर्थ है क्षीण करने वाला या नष्ट करने वाला क्योंकि यह शब्द ज-वयोहानौ धातु से बना है। रात्रि को क्षीण करने के कारण सूर्य रूपी इंद्र को अहल्या का जार कहते हैं।
वा० सं०३/१० रात्रि को इंद्रावती मानने की परिकल्पना ही अहिल्या के कथा की (और उषस् को इन्द्रवती मानने की धारणा प्रजापति और उनकी पुत्री की) आधार भूमि है।
श० ब्रा०२/३/१/३७ में कहा गया है कि सूर्य ही इंद्र है वह रात्रि से संगत होता है।

