~ डॉ. नेहा
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तमाम ऑनलाइन-ऑफलाइन न्यूज़ मिडिया में पब्लिश हो चुका यह शोधात्मक लेख हमारे आराध्य डॉ. विकास मानवश्री का है. जिनको योनिपूजा के शास्त्रीय प्रमाण चाहिए वे बताएगें, उनको दिया जायेगा.
इसमें नारीयोनि भोगने की नहीं, पूजने की सब्जेक्ट होती है. पूजा – साधना का मतलब भोग नहीं होता. स्त्री वास्तविक आदर, सम्मान,अपनत्व, प्यार और अलौकिक शक्ति तो पाती ही है; ऐसा आर्गेज्मिक प्लेजर भी पाती है, जो दुनिया के किसी भी संभोग से नहीं मिल सकता. स्वर्गसुख को भी ईर्ष्या होती है उससे. स्वयं को क्या, वह ईश्वर को भी भूल जाती है. इससे मिले आनंद को वह जिंदगी भर नहीं भूलती.
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विद्या कोई भी हो- न बुरी होती है, न निष्प्रभावी होती है और न ही मरती है। दुरुपयोग करने वालों को बे-मौत मारती जरूर है।
तर्क-वितर्क-कुतर्क का समय मेरे पास नहीं होता। अपनी बात को अनुभव देकर सावित करने का ही समय हमारे पास होता है। वह भी निःशुल्क। इसलिए हमें परखा जा सकता है। ~ डॉ. विकास मानव.
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पति शिव के अपमान से दुःखिता सती ने पिता दक्ष के यज्ञ में खुद को भष्म कर दिया। उनका शव लेकर शिव रोते-बिलखते भटकने लगे। जहां-जहाँ सती के अंग गिरे थे वहां पर शक्तिपीठ बने। आसाम का कामरूप कामाख्या मंदिर जहां है, वहाँ सती की योनि शरीर से अलग होकर गिरी थी। इस तीर्थस्थल पर देवी सती की पूजा ‘योनिपूजा’ के रुप में की जाती है।
यहां पर कोई देवीमूर्ति नहीं है। यहां पर मात्र एक योनि के आकार का शिलाखंड है. इसमें हर माह मासिकधर्म भी आता है, यानी रजस्वला होने की स्थिति बनती है.
यहां देश विदेश के हजारों साधक आते हैं। योनि की साधना करने वाले तमाम नर-नारी यहाँ देखे जा सकते हैं। यहां श्रद्धालुओं की सात्विक मनोकामना ये पूरी करते हैं। जिसपे खुश हो जाएं उसे तमाम चमत्कार भी दिखाते हैं। यहां के जंगल में साधनारत लोगों तक अव्वल तो पहुंचना मुश्किल है. पहुंचने पर अगर आप नग्न साधक- साध्वियों के प्रति मन तनिक भी कुविचार लाए तो पंचभूतों में विलीन हुए.
भारतीय प्राच्य विद्या “ध्यान और तंत्र” का अविष्कार शिव ने किया। वे सबसे पहले पार्वती को ध्यान-तंत्र सिखाए और इससे ही वे महा चमत्कारी शक्ति बनी।
*योनि पूजा किस नारी की, किस नर से?*
योनि पूजा वह नर ही कर सकता है, जो अप्रतिम स्प्रिचुअलिटी और सुप्रीम सेक्सुअलिटी की डिवाइनिटी से समृद्ध हो. वह सिर्फ उस नारी की योनिपूजा कर सकता है, जो उसे स्वयं को अपनी इच्छा से अर्पित करे।
अगर नर इस नारी को अपना सबकुछ, भगवान तक नहीं स्वीकार करता तो योनि पूजा सफल नहीं होती। उल्टे दोनों की क्षति होती है। शास्त्रों में कुंवारी लड़की ही पात्र बताई गई है. यह आज के दौर में दुर्लभ है.
लड़की/स्त्री सेक्स प्रैक्टिस की है तो भी योनिपूजा की पात्र है। वर्जिन को सफलता/सिद्धि 100%, एक से सेक्स करवाने वाली को 90%, दो से सेक्स करवाने वाली को 60% और शेष को 40% मिलती है. तीन से अधिक से सेक्स कराने वाली स्त्री इस पूजा के योग्य नहीं होती.
योनि पूजा के बाद उसे केवल एक इंसान तक सीमित रहना होता है, वह चाहे उसका पति हो या प्रेमी. अपने योनिपूजक से वह कभी भी संयुक्त हो सकती है।
योनि पूजा करवाने से नारी को आनंद/तृप्ति की चरम अनुभूतियाँ और कतिपय अलौकिक शक्तियां मिल चुकी होती हैं। ऐसे में वह अनेक से इंटीमेट कर दुराचारिणी नहीं बन सकती है. बनती है तो अपना जन्म-जन्मांतर सब खराब करती है.
*योनि पूजा विधि :*
यह साधना रात्रि को ही होती है, निपट शांति में. पूजक जब पूजिता के कमरे में जाता है या वह जब इसके कमरे में आती है, तब~
* सबसे पहले पूजक उसके पैर पर अपना मस्तक रखता है। वह उसके सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देती है।
* फिर पूजक इस देवी को कुछ देर तक अपने सीने से लगाकर रखता है।
* अब वह अपने भक्त के लिए कुछ खाने पीने के लिए लाती है।
* वह पूजिता को अपनी गोद में बिठाता है। खुद भी खाता-पीता है, उसे भी खिलाता है।
* फिर दोनों आराम करते हैं : निर्वस्त्र एक-दूसरे से लिपटकर लेटे हुए।
* दोनो के शरीर की ऊष्मा-उर्ज़ा एक-दूसरे में दौड़ती है। दोनों एक-दूसरे की स्वांस से भी एक-दूसरे में प्रवेश करते हैं।
* अब वह उस को निर्वस्त्र कर अपनी गोद में लेकर प्यार, श्रद्धा- आस्था से सहलाता है। बेड पर लिटाता है। उसके सारे बदन पर फूल की तरह हाथ फेरता है। होठों से सहलाता है, चुमता है। उसके बाद थोड़ी देर योनि को जिह्वा से सहलाता है।
* अब पूजिता को बिठाकर उसका श्रृंगार किया जाता है। पूजक पूज्या को तिलक अपने खून से लग़ाता है। वह खुद चाहे तो खून के बजाए सिंदूर का उपयोग करवा सकती है।
* श्रृंगार के बाद पूजन सामग्री को थाल में सजाकर पूज्या की आरती की जाती है। फिर योनि की आरती.
* योनि को हथेली से सहलाकर, उस पर हल्का-सा दबाव देकर पूजा के लिए तैयार किया जाता है।
* अब निर्धारित मंत्रों का उच्चारण मन में किया जाता है। जैसे-जैसे मंत्र कारगर होते हैं, पूजक को सिद्धि और पूज्या को दैवीय शक्ति मिलती जाती है।
* पूजा के बाद पूजक पूज्या को फिर विस्तर पर लिटाता है। उसके पैर दबाता है, हाथ दबाता है, सिर दबाता है।
* इसके बाद उसके पैर, हाथ, जाँघे, हिप, पेड़ू, पीठ, गर्दन सभी की मसाज करता है।
* फिर दोनों वस्त्रहीन होकर, परस्पर लिपटकर लेटते हैं। संभोग पुजारी तभी कर सकता है, जब उसकी पूज्या आदेश दे।
* संभोग तब तक करना होता है जब तक पूज्या रुक जाने को कहती हुई अलौकिक आनंद से बेसुध नहीं होने लगे।
* पूजिता 45 मिनट में यह अवस्था पाती है या 01 घण्टे में, पूजक को सक्रिय रहना होता है। इसीलिए भी योनिपूजा असिद्ध व्यक्ति के बस की बात नहीं।
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