सरहदी गांधी बादशाह खान की पुण्यतिथि पर*

*प्रोफेसर राजकुमार जैन*
*37 साल पहले 20 जनवरी 1988 को आज के ही दिन खान अब्दुल गफ्फार खान जिन्हें सरहदी गांधी, बादशाह खान, बाचा खान के नाम से भी पुकारा जाता था का इंतकाल हुआ था। जंगे आजादी मे महात्मा गांधी के सबसे बड़े सिपहसालार जिन्होंने आजादी और जम्हूरियत को कायम रखने के लिए हिंदुस्तान और पाकिस्तान की जेलो मैं लगभग 30 साल बिताए थे। जो कौम अपने पुरखों की कुर्बानियों को नजरअंदाज और भुला देती है उसका इतिहास भी वक्त रहते मिट जाता है। बादशाह खान हिंदुस्तान की आजादी की तवारीख की अमिट शख्सियत है। उनको याद करने का मतलब है अपनी जड़ों में झांकना तथा प्रेरणा लेना।* इससे पूर्व एक श्रंखला इस विषय पर प्रकाशित की गई थी उसी का एक अंश सिराज ए अकीदत पेश करने की मंशा से प्रकाशित किया जा रहा है।हमें फ़ख्र है कि हमने उस महामानव से बात की है महात्मा गांधी की जन्म शताब्दी के अवसर पर 1969 में भारत सरकार ने उन्हें पेशावर (पाकिस्तान) से हिंदुस्तान बुलवाया हुआ था। उनकी अगवानी करने के लिए हवाई अड्डे पर जयप्रकाश नारायण तथा इन्दिरा गांधी गये थे। दिल्ली के शहरियों की और से दिल्ली नगर निगम ने उनका सार्वजनिक अभिनंदन आयोजित किया था। जलसे में ज़बरदस्त हाजि़री थी मैं भी उसमें शामिल था। दिल्ली के मेयर लाला हंसराज गुप्ता ने उनका स्वागत करते हुए 80 लाख रुपये की थैली उनको भेंट की थी, मगर उन्होंने यह कहकर वापिस लौटा दी कि इसे किसी नेक काम में इस्तेमाल कर लिया जाए। अगले दिन दिल्ली विश्वविद्यालय के उपकुलपति डॉ॰ सरूपसिंह जो एक वक्त दिल्ली की सोशलिस्ट पार्टी के सेक्रेटरी रह चुके थे तथा जयप्रकाश नारायण, डॉ॰ राममनोहर लोहिया के बहुत नज़दीकी थे, ने मुझे बुलाकर इत्तला दी कि बादशाह खान कुछ घंटों के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी में आए हुए है तथा वाइस चांसलर के स्थायी बंगले में टिके हुए है, तुम लोग जाओ और उनके दर्शन करके आओ। मैं, रमाशंकर सिंह (भूतपूर्व मंत्री, मध्यप्रदेश सरकार) तथा एक दो अन्य साथी हम कुलपति के बंगले पर पहुँच गए। *हमने देखा कि भीमकाय कृशकाया मलेशिया के सादे कपड़े की पठानी पौशाक, लंबी कमीज और सलवार पहने सफे़द दाढ़ी का इंसान फर्श पर सिर के नीचे पोटली रखकर लेटा हुआ है। पहले तो कुछ सूझा नहीं समझ में नहीं आ रहा था कि क्या सचमुच में ये वही इंसान है जो आज़ादी की लड़ाई में गांधी के साथ हर फ़ोटो में फौलाद की तरह खड़ा देखने को मिलता है। पहुँचते ही बिना पल गवाए अपने दोनों हाथ उनके चरणों में स्पर्श करने के लिए बढ़ा दिए। लेटे हुए बादशाह खान उठ बैठे और हाथ से इशारा करके हमें मना किया। मेरी जबान पर लगभग ताला सा लग गया था। क्योंकि मॉडर्न इण्डियन हिस्ट्री का विद्यार्थी होने के नाते मैंने उस महानायक का इतिहास पढ़ा था। 15 साल अँग्रेज़ी सल्तनत तथा 15 साल पाकिस्तान की फौजी हुकूमत ने उन्हें जेल के सीकंचों में जकड़ कर रखा था, वो इंसान फर्श पर लेटा हुआ सफर के अपने सारे साजो-सामान की एक पोटली बना कर सिर के नीचे तकिये की तरह इस्तेमाल कर रहा था, तो मैं कैसे बात करने की हिम्मत जुटा पाता।* डबडबाई आँखों से उस महामानव को केवल देखने भर का साहस ही जुटा पाया। किसी तरह हिम्मत जुटाकर मैंने कहा, बाबा, हम यहीं दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ते हैं, हम सोशलिस्ट हैं, डॉ॰ राममनोहर लोहिया को मानने वाले। आशीर्वाद की मुद्रा में उन्होंने हमारी तरफ़ देखा। बात को आगे बढ़ाते हुए मैंने कहा कि डॉ॰ लोहिया आपको गांधी जी के बाद हिंदुस्तान की जंगे आज़ादी का सबसे बहादुर नेता मानते थे। *तो सरहदी गांधी ने धीमी आवाज़ में कहा कि कुछ साल पहले लोहिया मुझसे काबुल में मिलने आया था, तीन-चार रोज़ वो मेरे पास रहा।* इस पर मैंने उनसे कहा कि इस बारे में डॉ॰ लोहिया ने सोशलिस्टों को एक बेहद दिलचस्प बात बताई थी कि पहले दिन जब आपके ख़ानसामा ने आलू और गौश्त की बनी सब्जी उनको खाने को दी तो वो झिझके, क्योंकि वो वैजेटेरियन थे आप पास में ही बैठे थे आप समझ गए, आपने खानसामा को कहा कि खालिस आलू की सब्जी बना दो। डॉ॰ लोहिया ने कहा कि नहीं इसमें से आलू निकालकर खा लूँगा। मैंने बात को आगे बढ़ाते हुए पूछा कि बाबा गांधी जी और आपके होते हुए हिंदुस्तान-पाकिस्तान का बंटवारा कैसे हो गया?, तब उन्होंने कहा कि ‘हिंदुस्तान के लीडरान से पूछो।
उन्होंने हमसे पूछा कि क्या तुम्हारी यूनिवर्सिटी में गांधी जी की तालीम की पढ़ाई होती है, रमाशंकर ने कहा जी हाँ होती है। परंतु बड़ी क्लास में, इतनी देर में यूनिवर्सिटी के कई और प्रोफ़ेसर कर्मचारी उनसे मिलने के लिए वहाँ आ गए थे।
*गांधी जी के इस फक़ीर सिपाही का जीवन त्रासदियों से भरा हुआ* था। राजमोहन गांधी ने “गफ्फार खान नोन वाइलेंट बादशाह ऑफ पख्तूनस” में लिखा है कि 1969 में जब बादशाह खान हिंदुस्तान आए थे तो मुल्क के कई हिस्सों में सांप्रदायिक दंगे हो रहे थे, गांधी जी के अहमदाबाद में भी। बादशाह खान अहमदाबाद गए और अमन का पैगाम देने के लिए तीन दिन तक उपवास किया।
उनके स्वागत के लिए संसद के दोनों सदनों का संयुक्त आयोजन हुआ। बादशाह खान ने अपने भाषण में बड़ी वेदना के साथ कहा कि आप गांधी जी को भूल गए हैं, जिस तरह बुद्ध को भूल गए थे।
*खान अब्दुल गफ्फार खान का जन्म 1890 में पेशावर (अब पाकिस्तान) में उत्तमजई गाँव में मालदार जमींदार पठान खानदान में हुआ था। पठानों में ‘खून के बदले खून’ के उसूल पर खानदानों में पुश्त-दर-पुश्त खून का बदला खून से लिया जाता था। इतनी खूंखार कौम के अपने समाजी कायदे कानून की खूबियां भी कम न थीं।*
*शरणागत को अपनी जान पर खेलकर भी उसकी हिफाजत करना, चाहे कितना भी कट्टर दुश्मन हो उसकी मेहमान नवाजी से न चूकना इनकी खासियत थी।*
बादशाह खाँ की सियासी जिंदगी उनके गाँव में रॉलेट एक्ट की मुखालफत से शुरू हुई उसमें भाषण देने के कारण इन्हें छह महीने की सजा हो गई। 98 प्रतिशत पठान पढे़-लिखे नहीं थे। बादशाह खान ने सबसे पहले पख्तून भाषा में एक पत्रिका की शुरुआत की। गाँव-गाँव पैदल घूमकर अनपढ़ पठानों में जागृति पैदा करने तथा समाज सेवा और सियासी सरगर्मियों के कारण पठान उनको अपना रहबर मानने लगे तथा उन्होंने उनको बादशाह खान कहना शुरू कर दिया।
गांधी जी के अहिंसा और सच्चाई के उसूलों में उनका यकीन बढ़ता गया। 1929 में उन्होंने ‘खुदाई खिदमतगार’ नामक संगठन की स्थापना कर दी। ‘खुदाई खिदमतगार बनने से पहले हर इंसान को अनिवार्य रूप से यह कसम लेनी होती थी कि “खुदा को किसी प्रकार की खिदमत की ज़रूरत नहीं है। इसलिए मैं हर इंसान की खिदमत बगैर किसी भेदभाव के करूँगा। मैं किसी प्रकार की हिंसा नहीं करूँगा और न ही बदला लेने के इरादे से कोई कार्य करूँगा। मैं हर उस इंसान को माफ करूँगा, जो मेरे खिलाफ़ द्वेष-भावना से कोई काम करेगा। मैं किसी भी ऐसे काम में शिरकत नहीं करूँगा जिसका मकसद, आपसी या खानदानी दुश्मनी होगा। मैं हर फखतून को अपना भाई व साथी समझूँगा। मैं हर प्रकार की समाजी बुराइयों से परहेज करूँगा। सादगी भरी जिंदगी जीने की कोशिश करूँगा और हर प्रकार की कुर्बानी करने के लिए हमेशा तैयार रहूँगा।”
हमें फ़ख्र है कि हमने उस महामानव से बात की
प्रोफ़ेसर राजकुमार जैन —
सन 1939 में जब गांधीजी सीमा प्रांत के दौरे पर गए तो बादशाह ख़ान ने गांधीजी से कहा था : “महात्मा जी, हमारे सूबे में पठानों में हिंसा की जहनियत किसी भी और चीज़ से ज़्यादा ख़राब है, हिंसा ने हमारी मजबूती, एकता को तहस-नहस कर डाला है। दूसरे सूबों में चाहे जो हो परंतु हमारे सीमा प्रांत के बारे में मेरा पक्का यकीन हो गया है कि अहिंसक आंदोलन खुदा द्वारा हमें दिया गया सबसे बड़ा तोहफा है, हमारी कौम को आगे बढ़ने के लिए अहिंसा के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। हमने अब तक जो बहुत मामूली तौर पर अहिंसा के उसूल पर चलने की कोशिश की उसके कारण जो करिश्माई बदलाव आया है उसके तजुर्बे की बिना पर मैं यह कह रहा हूँ।”
गांधीजी ने उस मौके पर कहा कि मुझे अहिंसा का पैरोकार कहा जाता है, परंतु बादशाह खान ने जो कर दिखाया है, वह अजूबा है। मेरा अहिंसक होना बड़ी बात नहीं, मेरे पास तो लाठी, डंडा भी नहीं परंतु बादशाह के पठानों के हाथ में हमेशा बन्दूक का ट्रिगर रहता है इसके बावजूद वे अहिंसक बने हुए हैं, बादशाह मुझसे बड़ा अहिंसक है।
बादशाह ख़ान के वालिद बेहराम ख़ान अपने सूबे के न केवल बड़े मालदार जमींदार थे, मॉडर्न तालीम की अहमियत को भी बखूबी समझते थे। सीमा प्रांत में अधिकतर लोग अनपढ़ थे, उन्होंने उस वक़्त अपने बड़े बेटे अब्दुल जबार ख़ान को लंदन भेजकर डॉक्टरी की सनद हासिल करवायी। बादशाह ख़ान की स्कूल की पढ़ाई अँग्रेज़ मिशनरी द्वारा चलाये जा रहे स्कूल में पूरी करवाने के बाद इनको भी लंदन में पढ़ाई करवाने का इंतज़ाम कर लिया था। परंतु बादशाह ख़ान की माँ ने इसकी इजाज़त नहीं दी क्योंकि उनका एक बेटा तो पहले ही विलायत चला गया था, बादशाह की स्कूल की पढ़ाई के बाद उच्च शिक्षा के लिए अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भेज दिया गया।
अपने वालिद की तरह सीमांत गांधी भी मॉडर्न एजुकेशन के पक्षधर थे। वे जान गये थे कि पठानों की तरक्की तब तक संभव नहीं जब तक वे तालीम हासिल न करें।
उन्होंने 1910 में एक स्कूल की स्थापना कर दी। परंतु मुल्ला लोग मॉडर्न तालीम के खिलाफ़ थे, उन्हें लगता था कि यह अंग्रेजों की साजिश है, उसमें इस्लाम के खिलाफ़ तालीम मिलेगी, उन्होंने फतवा दे दिया कि जो बच्चा उस स्कूल में पढ़ने जाएगा उसकी सात पुश्तें दोजख में जाएंगी। 1915 में उस स्कूल को बंद कर दिया गया। परंतु बादशाह ख़ान कहाँ मानने वाले थे, उन्होंने 500 गाँवों का दौरा कर लोगों से अपील की कि वे अपने बच्चों की रौशन जिंदगी के लिए स्कूल ज़रूर भेजें। इस्लामिया आज़ाद स्कूल के नाम से उन्होंने 130 स्कूल खोल दिये।
कथनी और करनी का कोई फ़र्क उनके कार्यों में नहीं था। जिस स्कूल को बादशाह ख़ान ने खोला था उसका पहला विद्यार्थी उनका अपना बेटा वली ख़ान था, दसवीं तक की उसकी तालीम गाँव के उसी स्कूल में हुई। बादशाह ख़ान जंगे आज़ादी में लगे हुए थे, उन्होंने अपने उसूलों को अमलीजामा देना अपने घर से ही शुरू किया।
इस कारण उनके घरवालों ने कितनी तकलीफ उठायी उसका पता उनके बेटे वली ख़ान ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके अब्बा द्वारा परिवार के साथ की गई नाइंसाफी पर शिकवा करने तथा साथ ही साथ सियासी शख्सियत के रूप में जबरदस्त फ़ख्र महसूस करने की मार्मिक दास्तान सुनायी है।
वली ख़ान बताते हैं कि उन्हें कौम के गरीब बच्चों की फ्रिक तो थी अपने बच्चों की नहीं। मैं पाँच वर्ष का था गाँव के स्कूल में पढ़ता था, वहीं रहता था क्योंकि वालिद जेल में थे, वालिदा थीं ही नहीं। न तो तालीम, न ही घर, न कोई ज़मीन-जायदाद मेरे बाप ने हमें दी, जो घर मेरे दादा ने बनवाया हुआ था उसको भी लड़कियों को तालीम देने के लिए उन्होंने स्कूल को दे दिया। वली ख़ान बचपन की उन तकलीफों को याद करते हुए यहाँ तक कह गए कि उन्हें (बादशाह ख़ान को) शादी ही नहीं करनी चाहिए थी।
वली ख़ान की बातों में एक तरफ़ जहाँ अब्बा के द्वारा कौम के गरीब बच्चों, लोगों के लिए सब कुछ देने की दास्तान का जिक्र है, वहीं उन्हें ‘दरवेश, फ़कीर’ कहते हुए उनकी आँखें नम हो जाती हैं। वली ख़ान अपने वालिद के नक्शेकदम पर चलते हुए जंगे-आज़ादी में तकलीफें उठाते, लंबी जेल यातनाओं को भोगते हैं।
1929 में ऑल इण्डिया कांग्रेस के लाहौर में हुए इजलास में बादशाह ख़ान की रहनुमाई में 500 से अधिक पठानों के जत्थे ने शिरकत की। 1930 में ‘नमक कानून भंग सत्याग्रह’ में बादशाह ख़ान की आवाज़ पर सीमा प्रांत के पठानों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। सत्याग्रह के दौरान निहत्थे पठानों पर ब्रिटिश सैनिकों की क्रूरतापूर्ण नरसंहार की कार्रवाई के कारण 250 पठान गोलियों के शिकार हुए तथा घोड़ों से कुचले गये।
1930 में गांधीजी ने शराब की दुकानों पर धरने देने का प्रोग्राम घोषित किया। 23 अप्रैल 1930 को पेशावर में बादशाह ख़ान की रहनुमाई में खुदाई खिदमतगारों ने जो बहादुराना कारनामा किया, वह पूरी दुनिया के अहिंसक आंदोलन के इतिहास में एक नायाब नज़ीर थी।
अँग्रेज़ी हुकूमत ने सुबह-सुबह ही बड़ी तादाद में खुदाई खिदमतगारों को गिरफ्तार कर लिया। उसके बावजूद शराब की दुकानों के सामने धरने का प्रोग्राम शुरू हुआ। डिप्टी कमिश्नर ने इस प्रोग्राम को खत्म करने के लिए फौज बुला ली, इस फौजी दस्ते में गढ़वाली सिपाही थे जिसका नेतृत्व हवलदार मेजर चंद्रसिंह गढ़वाली कर रहे थे। डिप्टी कमिश्नर ने गोली चलाने का हुक्म दिया, हवलदार मेजर चंद्रसिंह गढ़वाली ने गोली चलाने से इनकार कर दिया तथा कहा कि हम निहत्थे लोगों पर गोली नहीं चलाएंगे। इसके बाद अँग्रेज़ फौज बुलायी गयी, उनकी गोलियों से सैकड़ों लोग मारे गये, सैकड़ों घायल हो गये, पेशावर शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया।
गढ़वाली सैनिकों पर फौजी अदालत में मुकदमा चलाया गया। उनको आजीवन कै़द की सजा हो गयी। मरे हुए लोगों में से कितनों की लाशों को लश्करी एबुलेंस के दो ट्रकों में ठूंस-ठूंस कर जंगल में ले जाकर उन पर पेट्रोल डालकर खाक कर दिया गया। सीमा प्रांत के सभी कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और लंबी-लंबी सजा देकर जेलों में बंद कर दिया। बादशाह ख़ान को गिरफ्तार करके जेल में ठूंस दिया गया, तीन साल बाद उनकी रिहाई हुई। रिहाई के बाद उन्हें सीमा प्रांत से भी निकाल भी दिया गया।
कहा जाता है कि जलियाँवाला बाग कांड के बाद यह दूसरा उतना ही भयंकर हत्याकांड था। पठान जैसी बहादुर लड़ाकू कौम बादशाह ख़ान के उसूलों के मुताबिक अहिंसक बने रहकर यह सब सह रही थी।
पठान कौम दोहरी लड़ाई लड़ रही थी, अँग्रेज़ी हुकूमत से भी तथा उसके साथ जुड़ी हुई मुस्लिम लीग से भी। 93 प्रतिशत मुस्लिम अक्सिीरियत वाले सीमा प्रांत में 1937 तथा 1946 के चुनावों में भी खुदाई खिदमतगारों के कारण कांग्रेस ही चुनाव जीत गयी थी। बादशाह ख़ान के भाई डॉ. ख़ानसाहब अब्दुल जब्बार ख़ान उसके प्रधानमंत्री बने थे।
7-8 अगस्त 1942 को ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की मुनादी के बाद 27 अक्टूबर को बादशाह ख़ाँ खुदाई खिदमतकारों के एक दल के साथ चार चारसद्दा मर्दान की जिला अदालत के सामने धरना देने के लिए निकले। पुलिस ने इन लोगों को बड़ी बेरहमी से लाठियों से पीटना शुरू कर दिया, जिसके कारण बादशाह ख़ाँ की पसलियों की हड्डियां टूट गयीं, उनके कपड़े खून से सन गये, वहाँ से उनको पहले मर्दान जेल तथा बाद में हरिपुर जेल भेज दिया गया।
1945 के आखि़र में सभी गिरफ्तार लोगों को छोड़ दिया गया था, लेकिन बादशाह ख़ाँ जेल में ही रहे। इस बीच अंग्रेज़ सरकार और मुस्लिम लीग ने मिलकर अनेक स्थानों पर हिंदू-मुस्लिम झगड़े कराने की कोशिश की, परंतु वो कामयाब नहीं हो सके क्योंकि जहाँ कहीं भी ऐसे झगड़े कराने की कोशिश की जाती वहाँ खुदाई खिदमतगार पहुँचकर उसे विफल कर देते थे।