अग्नि आलोक

क्यों दिवालिया हो रहे60 फीसदी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मुल्क

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चंद्रभूषण

एक बहुत बड़ा संकट दुनिया का दरवाजा खटखटा रहा है, लेकिन जो लोग भी इससे निपटने के लिए कुछ कर सकते हैं, वे इसकी तरफ आंखें मूंदे बैठे हैं। यह संकट कई विकासशील देशों के एक कतार से दिवालिया हो जाने का है, जिसकी अनदेखी करते हुए फिलहाल अमेरिका की कर्ज सीमा ही सबकी दिलचस्पी का सबब बनी हुई है।

पिछले साल हमने पड़ोसी मुल्क श्रीलंका को आर्थिक संकट और अराजकता से गुजरते देखा था। लेकिन अफ्रीका में तो ऐसी ही या शायद इससे भी बुरी हालत में पहुंच रहे देशों की लाइन लगी हुई है।

बहरहाल, मामला दो-चार विकासशील देशों का न होकर 60 फीसदी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के संकटग्रस्त होने का है तो दुनिया को फ्रेम से बाहर निकलकर सोचना होगा, क्योंकि आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक में सबको उबारने का बूता नहीं है। इतने बड़े पैमाने पर आ रहे संकट की वजह सीधी है।

आर्थिक संकट के दौरान श्रीलंका के राष्‍ट्रपति भवन में घुसे प्रदर्शनकारी

यूक्रेन वॉर का असर

दो साल की इस ऐतिहासिक अड़चन के बाद थोड़ी सांस आनी शुरू हुई तो यूक्रेन में एक छोटे स्तर का ‘प्रॉक्सी वर्ल्ड वॉर’ ही शुरू हो गया। कच्चा तेल, खाद्यान्न और कर्ज, तीनों की एक साथ महंगाई ने छोटी अर्थव्यवस्थाओं की कमर तोड़ दी।

कुछ बड़े अमेरिकी वित्तीय संस्थानों के डूबने के साथ शुरू हुई पिछली महामंदी को जी-20 के मंच से बनी समझदारी के जरिए दो साल के अंदर ही संभाल लिया गया था। फिर भी 2014-15 तक कई अर्थव्यवस्थाओं पर कर्ज का संकट मंडराता रहा। ग्रीस तो लगभग दिवालिया ही हो गया था। उससे मिलता-जुलता संकट दक्षिणी यूरोप के चार और देशों पुर्तगाल, स्पेन, इटली और आयरलैंड पर भी था, लेकिन धीरे-धीरे उन पर बात होनी बंद हो गई। इस लिहाज से दुनिया भर की उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर अभी मंडरा रहे संकट को बढ़ता हुआ माना जाए या घटता हुआ?

इस बारे में अभी एक ही बात साफ ढंग से कही जा सकती है कि संकट का एक सिरा यूक्रेन युद्ध से जुड़ा है। जैसे ही यह खबर आएगी कि लड़ाई खत्म हो सकती है, वैसे ही हालात काबू में आने शुरू हो जाएंगे। दुनिया का दुर्भाग्य यह कि अभी ऐसा कोई संकेत ही कहीं से नहीं मिल रहा है। सवाल यह है कि जब शांतिवार्ता के लिए एक न्यूनतम माहौल बनाने में ही दोनों पक्षों की दिलचस्पी नहीं है, तो लड़ाई खत्म कैसे होगी? इस लड़ाई के ज्यादातर बिल अमेरिका की ओर से ही फाड़े जाते रहे हैं, लिहाजा सबकी उम्मीदें अमेरिकी चुनाव पर टिकी हैं। यूक्रेन युद्ध पर आने वाला खर्चा अगर वहां चुनावी मुद्दा बनता हुआ लगा तो शायद 2024 की पहली तिमाही में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन के रुख में नरमी देखने को मिले।

कब सुधरेंगे हालात

तब तक छोटे-छोटे पॉजिटिव संकेतों से, मसलन जी-7 शिखर सम्मेलन खत्म होने के बाद दिए गए बाइडन के इस बयान से कि चीन-अमेरिका संबंध जल्द ही सुधरने लगेंगे, या फिर आने वाले दिनों में अमेरिकी सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच सरकारी कर्ज की ऊपरी सीमा बढ़ाने को लेकर सहमति हो जाने से शेयर कारोबारियों को फायदा होता रहेगा, लेकिन दुनिया की वास्तविक अर्थव्यवस्था को इससे कोई संजीवनी नहीं मिलेगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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