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भगवान शिव क्यों और कैसे अर्धनारीश्वर बनेंं? 

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हर साल फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन महाशिवरात्रि का पावन पर्व मानाया जाता है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन ही भगवान शिव और माता पार्वती विवाह के बंधन में बंधे थे. महाशिवरात्रि पर शिव-शक्ति का विधि-विधान से पूजन और व्रत किया जाता है. इस दिन व्रत और पूजन करने से सुखी वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद मिलता है.

इस साल महाशिवरात्रि का महापर्व 15 फरवरी के दिन मनाया जाएगा. वैसे तो महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी कई कथाएं सुनाई जाती हैं, लेकिन आज हम आपको भगवान के शिव अर्धनारीश्वर बनने की कथा बताने जा रहे हैं, तो आइए जानते हैं कि भगवान शिव क्यों और कैसे अर्धनारीश्वर बनेंं?

कथा के अनुसार
कथा के अनुसार, सप्तऋषियों में शामिल भृगु ऋषि शिव जी के उत्साही भक्त थे. एक बार वो रोजाना की तरह सुबह जल्दी आकर शिव जी की परिक्रमा के लिए आगे बढ़े. उस समय शिव जी के पास माता पार्वती बैठी थीं. तब ऋषि भृगु ने दोनों के बीच से होते हुए शिव जी की परिक्रमा की. ऋषि ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वो सिर्फ शिव जी की ही परिक्रमा करना चाहते थे. माता पार्वती की नहीं.

इसके बाद शिव जी ने पार्वती जी से थोड़ा और पास आने को कहा. भृगु ऋषि ने देखा कि उनके निकलने के लिए पर्याप्त स्थान नहीं है, तो वो एक चूहे का रूप धारण करके माता पार्वती को बाहर रख सिर्फ शिव जी की ही परिक्रमा करने लगे. इससे माता पार्वती को क्रोध आ गया. इस पर भगवान शिव ने माता को अपनी जांघ पर बैठा लिया. ताकि ऋषि को पार्वती जी की परिक्रमा करनी ही पड़े.

भगवान शिव बन गए अर्धनारीश्वर
हालांकि, फिर भृगु ऋषि ने छोटे से पंक्षी का रूप धारण करके भगवान शिव की परिक्रमा की. अब तक माता पार्वती का क्रोध बहुत बढ़ चुका था. तब भगवान शिव ने माता पार्वती को खींचकर खुद में मिला लिया और उनको स्वयं का हिस्सा बना लिया. जिससे उनका आधा शरीर भगवान शिव जी का बन गया और आधा माता पार्वती का. इस तरह भगवान शिव अर्धनारीश्वर बन गए.

भृगु ऋषि ये देख मधुमक्खी बन गए और शिव जी की दाहीनी टांग की परिक्रमा कर ली. ये देख शिव जी प्रसन्न हुए, लेकिन फिर वो सिद्धासन पर बैठ गए. इसके बाद भृगु ऋषि को भगवान के अर्धनारीश्वर रूप की परिक्रमा करनी पड़ी.

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