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क्यों नाराज हो रहे हैं फिर से देश के किसान

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चौधरी पुष्पेन्द्र सिंह
केंद्र सरकार ने तीन कृषि कानूनों को तो वापस ले लिया, लेकिन पेच फिर फंस गया है। किसानों का आशा थी कि सरकार एमएसपी की गारंटी देगी, आंदोलन में शहीद किसानों के परिजनों को मुआवजा देगी और आंदोलन के दौरान कायम मुकदमों को वापस लेगी। लेकिन अभी तक किसानों की आशा पूरी नहीं हुई है। लखीमपुर कांड में भी त्वरित न्याय होता नहीं दिख रहा है।

एमएसपी समिति का हाल
बहुत समय बाद सोमवार को एमएसपी पर बनी सरकारी समिति की पहली बैठक हुई। मगर यह समिति एमएसपी को प्रभावशाली बनाने, जैविक कृषि को बढ़ावा देने, फसलों के विविधीकरण को प्रोत्साहित करने की बात कह रही है। जबकि, किसानों की मूल मांग एमएसपी की वैधानिक गारंटी है। समिति के अध्यक्ष एक पूर्व कृषि सचिव बनाए गए हैं जो आंदोलन में सरकारी वार्ताकार थे। इनके अलावा जो खास किसान नेता, कृषि विशेषज्ञ और अर्थशास्त्री इसमें नामित किए हैं, वे निरस्त कृषि कानूनों के समर्थक और किसान आंदोलन के विरोधी थे। ये लोग एमएसपी की वैधानिक गारंटी के पक्ष में नहीं रहे हैं।

बहिष्कार और पंचायत
29 सदस्यीय इस समिति में किसान आंदोलन के संचालक संयुक्त किसान मोर्चे से केवल तीन सदस्य नामित करने को कहा गया। इस समिति का कोई कार्यकाल भी निश्चित नहीं किया गया है। किसान मोर्चे का मानना है कि सरकार एमएसपी की वैधानिक गारंटी की मूल मांग को ठंडे बस्ते में डालना चाहती है। इसलिए किसान मोर्चे ने इस एकतरफा समिति का बहिष्कार कर दिया और अब जगह-जगह किसान पंचायत शुरू कर दी है। इसी कड़ी में सोमवार को एक दिन का धरना प्रदर्शन दिल्ली में जंतर मंतर पर किया गया।

किसान चाहते हैं कि घोषित एमएसपी से नीचे फसलों की खरीद कानूनी रूप से वर्जित हो। एमएसपी का निर्धारण भी स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के हिसाब से हो और बीजेपी का यह वादा भी था। इस मांग का गणित समझना जरूरी है।

कुछ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि एमएसपी पर निजी क्षेत्र को बाध्य नहीं कर सकते। मगर ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जिनमें सबने सरकार को मूल्य निर्धारित या नियंत्रित करते देखा है। हर साल निजी चीनी मिलें सरकारी रेट पर ही किसानों से गन्ना खरीदती हैं। चीनी मिलों को भी सरकार ने चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य की सुरक्षा दी हुई है। फिर किसान यह तो नहीं कह रहे कि सरकार उनकी सारी फसल खरीद ही ले। वह तो बस इतना कर दे कि कोई भी खरीदे तो सरकारी दर पर ही खरीदे। इससे सरकार पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ने वाला, क्योंकि उसे तो सिर्फ अपनी खरीद करनी है। किसान के पास अतिरिक्त धनराशि आएगी तो उससे यहीं की अर्थव्यवस्था बढ़ेगी। सवाल है कि जब सरकार का इस पर एक पैसा नहीं खर्च होना, तो फिर वह क्यों इस मांग से पीछे हट रही है?

एमएसपी कानून से सरकार की खरीद भी कम हो जाएगी क्योंकि तब किसान के पास सिर्फ सरकार को ही बेचने का कोई अन्य आर्थिक कारण नहीं होगा। इससे फसलों के विविधीकरण का उद्देश्य भी पूरा होगा क्योंकि जब सभी फसलें एमएसपी पर बिकेंगी तो किसान गेहूं-धान के फसल चक्र से भी निकलकर अन्य फसलों का उत्पादन बढ़ा देगा। सरकार एमएसपी की वैधानिक गारंटी समेत किसानों से किए सभी वादे पूरे करे, अन्यथा किसान फिर एक बार आंदोलन करने को मजबूर होंगे।

(लेखक किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष हैं)

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