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*ट्रैक पर खून:हर साल लगभग सौ ट्रैक मेंटेनर रेल पटरियों की जाँच करते क्यों मर जाते हैं?*

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रेलगाड़ियाँ तेज़ी से गुज़र रही थीं, उनकी गर्जना बार-बार हमारी बातचीत में बाधा डाल रही थी। धरती काँप रही थी और हम खामोश बैठे थे। बाहर की चिलचिलाती चालीस डिग्री की गर्मी के कारण कमरा अँधेरा था। हम एक छोटी सी झोपड़ी में बैठे थे, जो लोहे के बिस्तर के फ्रेम के लिए पर्याप्त बड़ी थी। दो रेलवे ट्रैक मेंटेनर, रामनरेश पासवान और हेमराज मीणा, मुझसे बात कर रहे थे, जबकि पाँच अन्य, अपनी शिफ्ट से थके हुए, बगल वाले कमरे में सो रहे थे। मुंबई में मई का महीना था, और हम उन पटरियों के पास थे जो लंबी दूरी और महानगरीय दोनों तरह की ट्रेनों के लिए हैं।

गैंगमैन को बचाने के लिए हेलमेट जूते टार्च और बैकपैक टूल आदि विशिष्ट रक्षात्मक उपकरण मुहैया कराए जाने की आवश्यकता है। उल्लेखनीय है कि पूर्व रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने 2016-17 के रेल बजट भाषण में गैंगमैन को रक्षक नामक माडर्न डिवाइस देने की घोषणा की थी।

रामनरेश सेंट्रल रेलवे ट्रैक मेंटेनर्स यूनियन के एक प्रमुख आयोजक और ऑल इंडिया रेलवे ट्रैक मेंटेनर्स यूनियन के महासचिव हैं। उन्होंने मुझे अपने फोन पर एक के बाद एक तस्वीरें दिखाईं, जो कमरे के अंधेरे में बेहद चमक रही थीं। रेलवे पटरियों पर बिखरे क्षत-विक्षत शव, कुछ तो बस धड़ रह गए थे। खून से सने सिर और हाथ। शोकाकुल परिवार के सदस्य। सभी मृत ट्रैक मेंटेनर, ट्रेनों से कुचले गए। “हम कीड़ों की तरह मरते हैं,” रामनरेश ने कहा। “अगर कोई ट्रेन ड्राइवर, गार्ड या स्टेशन मास्टर मारा जाता है, तो ट्रेनें रुक जाती हैं। लेकिन जब कोई ट्रैक मेंटेनर मर जाता है, तो उसका शरीर दो घंटे तक लाइन पर पड़ा रहता है।” रामनरेश के अनुसार, इस तरह की घटना अक्सर उनके वरिष्ठ सेक्शन इंजीनियर के दौरे के लायक भी नहीं होती, डिवीजनल रेलवे मैनेजर की तो बात ही छोड़ दीजिए

दो महीने बाद, मैंने हरियाणा में भी ऐसे ही बयान सुने। जींद में, मैं एआईआरटीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेंद्र पांचाल और उत्तर रेलवे यूनियन के महासचिव मनीष कौशिक से मिला। नरेंद्र ने उनकी ज़िंदगी की तुलना आवारा कुत्तों से की। उन्होंने कहा, “जब कोई मरता है, तो कोई शोक नहीं करता। इसी तरह, ट्रैकमैन के मरने पर भी किसी को कोई आपत्ति नहीं है। अगर वह मर रहा है, तो कोई बात नहीं। अगर वह चला गया, तो कल कोई और आएगा। अगर वह मर गया, तो तीसरा आएगा।”

रेल मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2016-17 से 2021 तक रेल पटरियों की मरम्मत-निगरानी कार्य के दौरान 451 गैंगमैन ट्रेन से कटकर मारे गए हैं। यानी ट्रेनों के सुरक्षित परिचालन में हर साल औसतन सौ गैंगमैन पटरियों पर दम तोड़ रहे हैं। हालांकि रेल यूनियन का दावा है कि हर साल औसतन 250 से 300 गैंगमैन दुर्घटना का शिकार होते हैं। अब सवाल कि गैंगमैन आखिर हादसों का शिकार क्यों हो जाते हैं? रेलवे की सभी ट्रैक लाइनों (प्रमुख रेल मार्ग) पर क्षमता से 120 से 200 फीसद अधिक यात्री ट्रेनें चलाई जाती हैं। लिहाजा गैंगमैन को पटरी के मरम्मत और रख-रखाव के लिए ब्लाक नहीं मिलता है। अधिकांश हादसे डबल लाइन अथवा ट्रिपल लाइन सेक्शन पर होते हैं। ट्रेन नजदीक आने पर जब वे दूसरी पटरी पर जाते हैं, तभी उस पर भी ट्रेन के आने से गैंगमैन कटकर मर जाते हैं।

इसके अलावा काम के दबाव में ट्रेन की आवाज सुनाई नहीं देती है। देश में कुछ वर्ष पहले घटित एक बहुचर्चित हादसे में उत्तर प्रदेश के हरदोई में रेलवे की लापरवाही से चार गैंगमैन की मौत हो गई थी। ये गैंगमैन संडीला और उमरताली के बीच रेलवे ट्रैक पर काम कर रहे थे। उन्हें न तो ट्रेन आने की कोई सूचना दी गई, न ही संकेत। तेज रफ्तार से आ रही ट्रेन गैंगमैन के ऊपर से गुजर गई। रेलवे ट्रैक पर बेधड़क होकर गैंगमैन काम कर रहे थे। उनके काम करने की जगह से कुछ दूरी पर उन्होंने लाल रंग का कपड़ा भी बांध रखा था। तभी वहां अचानक कोलकाता से अमृतसर जा रही अकालतख्त एक्सप्रेस आ गई और यह ट्रेन सभी गैंगमैन को रौंदते हुए तेज रफ्तार से निकल गई। ऐसे हादसे देश में आए दिन घटित होते हैं। सवाल है कि आखिर गैंगमैन की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित हो?

गैंगमैन को बचाने के लिए हेलमेट, जूते, टार्च और बैकपैक टूल आदि विशिष्ट रक्षात्मक उपकरण मुहैया कराए जाने की आवश्यकता है। उल्लेखनीय है कि पूर्व रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने 2016-17 के रेल बजट भाषण में गैंगमैन को रक्षक नामक माडर्न डिवाइस देने की घोषणा की थी। कमर में पहनने वाली यह डिवाइस गैंगमैन को 400 से 500 मीटर की दूरी पर ट्रेन के आने पर बीप के साथ अलर्ट कर देगी। बारिश और सर्दी के खराब मौसम में ट्रेन नहीं दिखाई पड़ने पर यह डिवाइस गैंगमैन का जीवन बचाएगी। हालांकि यह डिवाइस अभी तक गैंगमैन को मुहैया नहीं करवाई जा सकी है। जानकारों का कहना है कि एक डिवाइस की कीमत लगभग 80 हजार रुपये है। सभी गैंगमैन को डिवाइस देने में रेलवे के 240 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इस समय भारतीय रेल में तीन लाख गैंगमैन कार्यरत हैं। रेलवे को इन कार्मिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में तत्काल कदम उठाने चाहिए।

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