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प्रेमिका को देखकर दिल की  धड़कन क्यों बढ़ती है?

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डॉ. विकास मानव

यह सवाल मुझ से एक ध्यानशिविर के प्रश्नोत्तर सत्र में पूछा गया. ‌

       जब हमारा प्रेमी या हमारी प्रेमिका सामने नहीं होती है तब हम बहुत सी बातें सोचते हैं कि आज यह बात कहूंगा, वह बात कहूंगा, लेकिन जैसे ही प्रेमी सामने आता है, प्रेमिका सामने आती है तो सारी बातें हवा हो जाती है। मुंह से एक शब्द भी नहीं फूटता है, शरीर में कंपकंपी- सी छूट जाती है, श्वास गहरी हो जाती है, नाभि तक जाने लगती है और दिल की धड़कनें साफ सुनाई पड़ने लगती है। दिल इतने जोरों से धडकता है कि भय लगता है, कहीं प्रेमी दिल की धड़कनें न सुन ले! 

       दिल तो चौबिसों घंटे धड़कता रहता है, लेकिन हम विचारों में इतने डूबे हुए रहते हैं कि दिल की धड़कनें हमें सुनाई ही नहीं पड़ती है। 

         हमारे मन में विचारों की अनवरत श्रंखला जारी रहती है। या तो हमारे भीतर भविष्य की किसी योजना का विचार चलता रहता है या फिर हम अतीत की किसी स्मृति में खोये रहते हैं। हम वर्तमान समय में नहीं ठहरते हैं।

वर्तमान में यदि हम ठहर जाएं तो विचारों की श्रंखला टूट जाती है। जैसे ही प्रेमिका या प्रेमी हमारे सामने आता है वैसे ही अचानक हमारे विचारों की श्रंखला टूट जाती है और हम निर्विचार हो वर्तमान में आ खड़े होते हैं। हमारे मन में कोई विचार नहीं होते हैं, होता है सिर्फ एक सन्नाटा जो कि विचारों की अनुपस्थिति में आ खड़ा होता है।

      यह चौथे अनाहत चक्र का सन्नाटा है जिसे अनहद नाद कहा गया है। यही है वर्तमान और ‘वर्तमान’ में जब हमारे मन में विचार नहीं होते हैं, तब दिल की धड़कनें सुनाई पड़ने लगती है और हम प्रेम से भर जाते हैं क्योंकि हम अनजाने ही साक्षी में प्रवेश कर जाते हैं। 

       हमारा शरीर विचारों को सतत क्रिया में परिवर्तित करता रहता है। मन में कोई हंसने वाली घटना का विचार आता है तो हम अकेले ही हंसने लगते हैं और यदि क्रोध का, दुश्मन का विचार आता है तो हमारी श्वासें तेज और गहरी होने लगती है, मुठ्ठियां बंधने लगती है, दांत-भींचने लगते हैं और हमारा शरीर क्रोध से भर जाता है।

     जबकि दुश्मन यहां है ही नहीं! ! इसी कारण हमारा शरीर सतत तनाव में रहता है, और तनाव के कारण हमारी श्वास छाती तक ही जाती है, नाभि तक नहीं जा पाती है। 

प्रेमी के सामने आते ही ज्यों ही हम वर्तमान में आते हैं तो विचारों के रूकते ही शरीर से तनाव हट जाता है और तनाव के हटते ही श्वास तेज और गहरी हो नाभि तक जाने लगती है। और ज्यों ही श्वास नाभि तक जाती है शरीर में आक्सीजन की मात्रा बढ़ने लगती है तथा फेफड़ों में पूरी श्वास भरने के कारण ह्रदय को ज्यादा काम करना पड़ता है.

      अतः उसकी धड़कनें तेज हो जाती है और हमें दिल की धड़कनें साफ सुनाई देने लगती है। 

      प्रेमी के सामने आने पर ज्यों ही विचार रुकते हैं और हम वर्तमान में आते हैं, हमारा साक्षी जो विचारों में उलझा हुआ था, वह विचारों से मुक्त हो जाता है और विचारों से मुक्त होते ही जो उर्जा विचारों में खर्च हो रही थी वह उर्जा साक्षी को मिलने लगती है और हमें दिल की धड़कनों के साथ ही सिर में हो रहा नाद सुनाई पड़ता है और नाद की ध्वनि और गहरी श्वास से मिली आक्सीजन की ताजगी से हम आनंद और प्रेम से भर जाते हैं। और इस आनंद का कारण हम प्रेमी को समझने लगते हैं। 

        इसका मतलब हमारी प्रेमिका या प्रेमी से मिलने वाला जो आनंद है, वह विचारों के रुकने से ‘वर्तमान’ में ठहरने पर अनहद नाद के प्रकट होने तथा गहरी श्वास से मिली आक्सीजन की ताजगी के कारण आता है?

     यानी वह आनंद हमारे भीतर ही था। और हमारा प्रेमी या प्रेमिका सिर्फ ‘माध्यम’ बना उस आनंद को बाहर लाने के लिए? 

        अर्थात यदि हम ‘वर्तमान’ में उपस्थित होकर दिल की धड़कन सुनने और ‘विचारों’ को रोकते हुए सन्नाटा यानी अनहद नाद सुनने में समर्थ हो जाएं,  तो जो आनंद हमारे प्रेमी या प्रेमिका के मिलने पर ‘थोड़ी देर’ के लिए मिला था, वह आनंद बिना प्रेमी से मिले ही ‘हमेशा’ के लिए मिलने लगता है! 

ध्यान में भी यही घटना दूसरे सिरे से घटती है। ध्यान में जब हम बैठते हैं तो हम अपनी श्वास को गहरी जाने देते हैं। श्वास नाभि को छूती है। और श्वास के नाभि को छूते ही शरीर से तनाव हटने लगते हैं और शरीर शिथिल होने लगता है।

      ज्यों ही शरीर शिथिल होता है विचार भी शिथिल होने लगते हैं और विचारों के शिथिल होते ही हम अतीत और भविष्य से मुक्त हो वर्तमान समय में आ जाते हैं और वर्तमान में आते ही हम साक्षी हो जाते हैं सिर में विचारों की जगह एक सन्नाटा सुनाई पड़ता है, अनहद नाद सुनाई पड़ता है और सन्नाटा सुनाई पड़ने के साथ ही हमें अपनी श्वास की आवाज और दिल की धड़कनें साफ सुनाई पड़ने लगती है तथा आक्सीजन की ताजगी और नाद सुनाई पड़ने से हम आनंदित होने लगते हैं।

       ध्यान में पहले हम श्वास को गहरा करके नाभि तक ले जाते हैं ताकि शरीर शिथिल हो और शरीर के शिथिल होते ही मन यानी विचार शिथिल हो और विचारों के शिथिल होते ही हमारा “वर्तमान” में प्रवेश हो जाए। 

       इसका उल्टा प्रेम में प्रेमिका को देखते ही पहले हमारा “वर्तमान” में प्रवेश होता है। और वर्तमान में प्रवेश होते ही हमारे मन से विचार विलीन हो जाते हैं और विचारों के विलीन होते ही, शरीर शिथिल हो जाता है और हमारी श्वास गहरी हो जाती है। 

यात्रा दोनों छोरों से शुरू कि जा सकती है। दोनों छोर विपरीत हैं लेकिन पहुंचते एक ही जगह पर हैं, वर्तमान में यानी ध्यान में अर्थात साक्षी में। 

       ध्यान में हम अचानक अपने को स्वयं का साक्षी हुआ पाते हैं? शरीर की शिथिलता से जब हम अतित और भविष्य के विचारों से मुक्त हो वर्तमान में आते हैं तब हम अपने आप पर लौट आते हैं यानी हम अपने शरीर के साक्षी हो जाते हैं अर्थात हमारी साक्षी चेतना जाग जाती है।

      साक्षी चेतना जाग जाती है मतलब जो साक्षी चेतना विचारों में उलझी हुई थी, विचारों के शिथिल होते ही विचारों से मुक्त हो स्वयं पर लौट आती है और स्वयं पर लौटते ही जो ऊर्जा विचारों में बह रही थी, वही उर्जा साक्षी की ओर बहने लगती है और साक्षी खुद को जागा हुआ और अपने शरीर को देखता हुआ पाता है। 

      प्रेम में अचानक हमें नाद सुनाई पड़ता है और हम साक्षी हो जाते हैं और ध्यान में हम साक्षी हो जाते हैं तो नाद सुनाई पड़ता है। यानी हम साक्षी हो जाते हैं तो नाद सुनाई पड़ता है और यदि हम नाद सुनने लगते हैं तो हम साक्षी हो जाते हैं। घटना दोनों ओर से एक सी घटती है। 

प्रेम में और ध्यान में दोनों ही स्थितियों में जो आनंद आता है वह आनंद साक्षी के जागने पर अनहद नाद के सुनाई पड़ने का है। 

      फर्क सिर्फ इतना है कि प्रेमी इस घटना के प्रति बेहोश होता है। इस घटना में उसका स्वतः प्रवेश ‘होता’ है। इस घटना के प्रति वह ‘अनजान’ होता है जबकि ध्यानी होश पूर्वक इस घटना को घटाते हुए इस घटना में प्रवेश ‘करता’ है। और यह पूरी घटना उसकी ‘जानकारी’ में ही घटती है। 

       प्रेमी यदि अपने प्रेमी से मिलने के समय अपने शरीर में हो रहे इस परिवर्तन को यानी श्वास गहरी होना, दिल की धड़कनें सुनाई देना, शरीर में घट रही इन घटनाओं को अपनी निगरानी में ले लेता है, प्रेमिका को भूलकर शरीर की इन क्रियाओं के प्रति जाग जाता और देख लेता है कि श्वास गहरी होने से यह प्रेम का आनंद आया है तो वह दूसरे से मुक्त होता जाएगा।

        क्योंकि अब उसको पता चल गया है कि श्वास को गहरी करके नाभि तक ले जाने में वही आनंद आता है जो प्रेमी के साथ होने पर आता है। तो अब वह श्वास गहरी करके रात और दिन प्रेमी के साथ रहने वाले आनंद में रहेगा अब प्रेमी की, दूसरे की गुलामी से छुटकारा हुआ और स्वयं के मालिक बन गए। जो ध्यान प्रेमी पर था वह ध्यान स्वयं पर आ गया और साक्षी कर गया। 

विचारों के सतत प्रवाह के कारण शरीर तनाव में आ जाता है जिससे श्वास नाभी तक नहीं जा पाती है, जिससे शरीर में आक्सीजन की कमी बनी रहती अतः हम तनाव और सुस्ती से भरे रहते हैं।

      यदि हम श्वास को नाभि तक ले जाते हैं तो शरीर से तनाव हट जाते हैं और तनाव के हटते ही शरीर शिथिल हो जाता है। और शरीर के शिथिल होते ही विचारों को उर्जा नहीं मिलती है और वे विलीन होने लगते हैं क्योंकि विचारों को उर्जा देने वाला साक्षी अब श्वास को देख रहा होता है।

      यदि हम श्वास की इस लयबद्धता को पा लेते हैं। यदि हम अपनी श्वास को गहरा कर छाती से नीचे नाभि तक जाने देते हैं तो हम वर्तमान में आ खड़े होते हैं और यदि हम वर्तमान में आ जाते हैं तो हम हमेशा अपने प्रेमी से मिलने पर जो आनंद आता है, बिना प्रेमी के मिले भी उसी आनंद में रहेंगे। ध्यान में रहेंगे क्योंकि साक्षी जो मौजूद हो जाता है।

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