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*स्वतंत्रता दिवस समारोह में क्यों गायब रहते हैं डॉ. भीमराव आंबेडकर?*

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-तेजपाल सिंह  ‘तेज’

          हर वर्ष 15 अगस्त को भारत तिरंगे के रंग में रंग जाता है। विद्यालयों, संस्थानों और सरकारी मंचों पर देशभक्ति के गीत गूंजते हैं, सैनिकों की वीरता का गुणगान होता है और स्वतंत्रता संग्राम के महानायकों को श्रद्धांजलि दी जाती है। गांधी, नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह जैसे नाम हर कार्यक्रम का हिस्सा बनते हैं। परंतु, बार-बार एक नाम मंचों से अनुपस्थित रहता है — वह नाम है भारत रत्न, बोधिसत्व, संविधान निर्माता, सामाजिक क्रांति के अग्रदूत, डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर।

केवल “संविधान निर्माता” तक सीमित करने की साज़िश

          डॉ. आंबेडकर का नाम अक्सर एक पंक्ति में समेट दिया जाता है — “संविधान निर्माता”। यह सच है कि उन्होंने भारत का संविधान रचा, परंतु उन्हें केवल इस भूमिका तक सीमित करना उनके बहुआयामी योगदान के साथ अन्याय है। इस एक परिभाषा के पीछे एक सूक्ष्म राजनीतिक चाल है — उन्हें स्वतंत्रता संग्राम, सामाजिक सुधार और आर्थिक न्याय की लड़ाई से काट देना।

          जैसे अंग्रेजों की “फूट डालो और राज करो” नीति थी, वैसे ही आंबेडकर की छवि को “कानूनी विद्वान” के खांचे में कैद कर, उनकी क्रांतिकारी भूमिका को जनचेतना से दूर रखा गया।

ऐतिहासिक योगदान — स्वतंत्रता का नया आयाम

          आंबेडकर का संघर्ष केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था; उन्होंने सामाजिक स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी। उनके लिए आज़ादी का अर्थ था — जाति, लिंग, और आर्थिक भेदभाव से मुक्ति। 1930 में लंदन की गोलमेज़ परिषद में, उन्होंने ब्रिटिश सरकार के सामने दो-टूक कहा कि भारत की आज़ादी तभी सार्थक होगी जब दलित, पिछड़े, महिलाएं और मजदूर भी समान अधिकार पाएंगे। उन्होंने स्पष्ट किया — “हम केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सामाजिक लोकतंत्र चाहते हैं।” यह दृष्टिकोण उन्हें स्वतंत्रता संग्राम का अद्वितीय नेता बनाता है।

सामाजिक क्रांति और जाति उन्मूलन

          डॉ. आंबेडकर ने जाति व्यवस्था को भारत के विकास और मानवता के सबसे बड़े शत्रुओं में गिना। उन्होंने ‘जाति का उन्मूलन’ शीर्षक से क्रांतिकारी लेख लिखकर यह सिद्ध किया कि जाति-आधारित भेदभाव न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि यह राष्ट्र की एकता को भी कमजोर करता है। उन्होंने अपने जीवन में अनेक आंदोलन चलाए — महाड सत्याग्रह (पानी के अधिकार के लिए), कालाराम मंदिर प्रवेश आंदोलन, और अस्पृश्यता विरोधी अभियान, जो अपने आप में स्वतंत्रता संग्राम के सामाजिक अध्याय हैं।

महिला उद्धार के लिए संघर्ष

          आंबेडकर को भारत में महिलाओं के अधिकारों का सबसे बड़ा संवैधानिक रक्षक कहा जा सकता है। उन्होंने हिंदू कोड बिल का प्रारूप तैयार किया, जिसमें महिलाओं को संपत्ति, विवाह, तलाक और उत्तराधिकार में समान अधिकार देने का प्रावधान था। परंतु संसद में इसे पारित होने से रोक दिया गया। इस अन्याय के विरोध में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया — यह दर्शाता है कि उनके लिए न्याय पद और सत्ता से ऊपर था।

आर्थिक दृष्टि और नवीन भारत का सपना

          डॉ. आंबेडकर की दृष्टि केवल सामाजिक न्याय तक सीमित नहीं थी; वे आर्थिक न्याय के भी प्रबल पक्षधर थे।

शैक्षणिक प्रतिभा — विश्व विभूति

          डॉ. आंबेडकर की शैक्षणिक यात्रा अद्वितीय है। कोलंबिया विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में पीएच.डी., लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से डी.एससी., और बार-एट-लॉ की उपाधि प्राप्त करने वाले वे विश्व के गिने-चुने विद्वानों में थे, जिन्होंने अपनी शिक्षा का उपयोग वंचित समाज के उत्थान के लिए किया। उनका बौद्धिक कद उन्हें केवल भारत का नहीं, बल्कि विश्व का नेता बनाता है। डॉ. आंबेडकर ने निम्नलिखित डिग्रियाँ अर्जित की:

उनकी पुस्तकें, जैसे The Problem of the RupeeThoughts on Linguistic States, और Buddha and His Dhamma, आज भी नीति-निर्माण और सामाजिक विज्ञान में संदर्भ ग्रंथ मानी जाती हैं।

स्वतंत्रता दिवस के मंच से अनुपस्थिति का कारण

          उनकी तस्वीर मंचों पर क्यों नहीं दिखाई जाती? क्योंकि अगर उन्हें स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नायकों में शामिल कर दिया गया, तो यह स्वीकारना पड़ेगा कि जाति-विहीन और समानता पूर्ण भारत ही सच्ची स्वतंत्रता है। और यह स्वीकार करना मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक ढांचे के लिए चुनौतीपूर्ण है। उनकी तस्वीर तिरंगे के नीचे केवल संविधान की याद नहीं दिलाती, बल्कि सामाजिक क्रांति की चेतना भी जगाती है — और यही बात सत्ता-व्यवस्था के लिए असुविधाजनक है।

हमें क्या करना चाहिए?

          जब तक हम स्वतंत्रता दिवस के मंच पर डॉ. आंबेडकर को उनके वास्तविक स्वरूप — राजनीतिक योद्धा, सामाजिक सुधारक, आर्थिक विचारक, महिला अधिकारों के रक्षक, और विश्व-स्तरीय शिक्षाविद — के रूप में स्थान नहीं देंगे, तब तक यह उत्सव अधूरा रहेगा।
हमें हर स्कूल, कॉलेज और सार्वजनिक आयोजन में उनकी तस्वीर और विचार दोनों को स्थान देना होगा। जय हिंद के साथ जय भीम भी उतने ही गर्व से गूंजना चाहिए, क्योंकि बिना सामाजिक समानता के तिरंगे की शान अधूरी है। डॉ. भीमराव आंबेडकर केवल संविधान निर्माता नहीं, बल्कि नवीन भारत के शिल्पकार थे। उन्होंने हमें न केवल कानूनी ढांचा दिया, बल्कि यह भी सिखाया कि सच्ची स्वतंत्रता समानता, बंधुत्व और न्याय में निहित है। उनकी अनुपस्थिति सिर्फ़ भूल नहीं, बल्कि एक सोच-समझकर रची गई चुप्पी है। इस चुप्पी को तोड़ना हमारी जिम्मेदारी है। क्योंकि जब तक भारत का तिरंगा उनके विचारों के साथ नहीं लहराएगा, तब तक यह राष्ट्र आधा स्वतंत्र और आधा बंधन में रहेगा।

          भारत हर वर्ष 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस मनाता है। इस दिन राष्ट्र गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, लाला लाजपत राय जैसे वीरों को श्रद्धांजलि देता है। किंतु इन राष्ट्रीय आयोजनों में एक नाम अक्सर छूट जाता है — भारत रत्नबोधिसत्वडॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर। अंबेडकर की छवि को सार्वजनिक विमर्श में जानबूझकर केवल संविधान निर्माता” तक सीमित कर दिया गया है, जबकि उनका योगदान स्वतंत्रता संग्राम, सामाजिक क्रांति, आर्थिक नीति, महिला अधिकार और शिक्षा-क्षेत्र में अद्वितीय है।

1. स्वतंत्रता की परिभाषा में अम्बेडकर का दृष्टिकोण:                           

        महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वतंत्रता संग्राम मुख्यतः राजनीतिक स्वतंत्रता पर केंद्रित था। आंबेडकर का मानना था कि राजनीतिक स्वतंत्रता बिना सामाजिक समानता के अधूरी है।  1930 में लंदन की प्रथम गोलमेज परिषद में उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड के सामने स्पष्ट शब्दों में कहा– “Political power cannot be a panacea for the ills of the depressed classes. Their emancipation requires social reformation.” इस दृष्टिकोण से स्पष्ट है कि आंबेडकर स्वतंत्रता को सामाजिकआर्थिक और राजनीतिक — तीनों स्तरों पर देखते थे, जबकि समकालीन आंदोलन अक्सर केवल औपनिवेशिक सत्ता से मुक्ति तक सीमित थे।

2. स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका:

          यद्यपि आंबेडकर का नाम मुख्यधारा के स्वतंत्रता संग्राम के नायकों में कम लिया जाता है, तथापि उन्होंने विभिन्न मंचों पर औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ़ दलित, श्रमिक और किसानों के अधिकारों की आवाज़ बुलंद की।

उनकी रणनीति अहिंसा और संवैधानिक साधनों पर आधारित थी, लेकिन वे केवल प्रतीकात्मक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि संरचनात्मक परिवर्तन चाहते थे।

3. जाति उन्मूलन — सामाजिक क्रांति का घोषणापत्र:

          डॉ. आंबेडकर का ऐतिहासिक व्याख्यान “Annihilation of Caste” (1936) भारतीय समाज पर सबसे तीखा बौद्धिक प्रहार माना जाता है। उन्होंने लिखा–“Caste is not merely a division of labour. It is a division of labourers.” उन्होंने हिंदू समाज की जातिगत संरचना को स्वतंत्र भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया और कहा कि अगर जाति व्यवस्था खत्म नहीं हुई, तो राजनीतिक स्वतंत्रता अर्थहीन हो जाएगी।

4. महिला अधिकार — अधूरा सपना

संविधान में अनुच्छेद 14, 15, 16 और 39 के माध्यम से महिलाओं को समान अधिकार दिलाने का श्रेय आंबेडकर को जाता है।

हिंदू कोड बिल (1948) में उन्होंने प्रस्ताव रखा कि:

संसद में इस विधेयक का विरोध हुआ, तो उन्होंने 27 सितंबर 1951 को इस्तीफा देते हुए कहा:

“To leave inequality between man and woman untouched is to violate the very principle of liberty, equality and fraternity.”

5. आर्थिक दृष्टि — राज्य समाजवाद और विकास मॉडल

          आंबेडकर के आर्थिक विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने 1947 में “States and Minorities” दस्तावेज़ में प्रस्ताव दिया:

उन्होंने देश के जल संसाधनों के पुनर्गठन की योजना तैयार की, जिसके तहत दामोदर घाटी परियोजना और हीराकुंड बांध जैसी योजनाएं बनीं।

6. स्वतंत्रता दिवस पर उनकी अनुपस्थिति — एक राजनीतिक कारण:

डॉ. आंबेडकर का नाम स्वतंत्रता दिवस के मंचों से इसलिए अनुपस्थित रखा जाता है क्योंकि वे केवल औपनिवेशिक सत्ता के विरोधी नहीं थे, बल्कि सामाजिक सत्ता के भी कट्टर आलोचक थे।
अगर उन्हें स्वतंत्रता संग्राम के मुख्य नायक के रूप में स्वीकार लिया जाए, तो यह मानना पड़ेगा कि भारत तब तक वास्तव में स्वतंत्र नहीं हुआ जब तक जातिगत और लैंगिक भेदभाव समाप्त न हो। यह विचार मौजूदा सत्ता संरचना के लिए चुनौतीपूर्ण है।

7. सांख्यिकीय प्रमाण — आंबेडकर की चेतावनी का सच:

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के 2022 के आंकड़े बताते हैं कि दलितों पर अत्याचार के मामले अब भी प्रतिदिन औसतन 147 दर्ज होते हैं। लिंग-आधारित वेतन-अंतराल (Gender Pay Gap) रिपोर्ट 2023 के अनुसार, भारत में महिलाएं औसतन पुरुषों से 28% कम कमाती हैं। ये आँकड़े सिद्ध करते हैं कि आंबेडकर का सपना — “Social Democracy” — अभी अधूरा है।

निष्कर्षत: डॉ. भीमराव आंबेडकर केवल संविधान निर्माता नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक सेनापति थे। उनकी अनुपस्थिति स्वतंत्रता दिवस के मंचों से केवल भूल नहीं, बल्कि एक संगठित चुप्पी है। इस चुप्पी को तोड़ना और उन्हें उनके सही ऐतिहासिक स्थान पर स्थापित करना — यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी। “We are Indians, firstly and lastly.” — डॉ. भीमराव आंबेडकर

          भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल अंग्रेज़ी सत्ता से मुक्ति का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह एक बहुस्तरीय सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन था, जिसमें जाति, लिंग, और वर्ग के प्रश्न भी अंतर्निहित थे। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हम प्रायः उन नेताओं का स्मरण करते हैं, जिन्होंने औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष किया, किंतु एक ऐसे महापुरुष का नाम अकसर इन आयोजनों से अनुपस्थित रहता है — डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर। आंबेडकर ने न केवल स्वतंत्रता को व्यापक रूप में परिभाषित किया, बल्कि सामाजिक क्रांति, आर्थिक समानता, और शिक्षा के माध्यम से एक ऐसे भारत का सपना देखा, जहाँ स्वतंत्रता केवल राजनीतिक न होकर जीवन के हर क्षेत्र में वास्तविक हो। उनकी दृष्टि में स्वतंत्रता का अर्थ था —

1.     सामाजिक स्वतंत्रता — जाति और लिंग के भेदभाव से मुक्ति।

2.     आर्थिक स्वतंत्रता — उत्पादन के साधनों और संसाधनों में समान भागीदारी।

3.     राजनीतिक स्वतंत्रता — सभी नागरिकों के लिए समान अधिकार और अवसर।

          लेकिन  स्वतंत्रता दिवस के मंचों पर उनका नाम प्रमुखता से नहीं लिया जाता, जिसका कारण केवल ऐतिहासिक भूल नहीं, बल्कि उनकी विचारधारा की वह तीक्ष्णता है जो सत्ता-व्यवस्था को चुनौती देती है। यह शोध-पत्र इस बात का विश्लेषण करेगा कि आंबेडकर को मुख्यधारा के स्वतंत्रता विमर्श से क्यों हाशिए पर रखा गया और उनके योगदान का वास्तविक मूल्यांकन कैसे किया जाना चाहिए।

          डॉ. भीमराव आंबेडकर केवल संविधान निर्माता नहीं थे; वे स्वतंत्रता के सच्चे अर्थ के प्रणेता थे। उन्होंने चेताया था कि यदि भारत ने सामाजिक लोकतंत्र” को राजनीतिक लोकतंत्र के साथ स्थापित नहीं किया, तो स्वतंत्रता केवल कुछ वर्गों के लिए विशेषाधिकार बनकर रह जाएगी। आज, जब जाति-आधारित भेदभाव, लिंग-आधारित असमानता और आर्थिक विषमता के आंकड़े हमें चौंकाते हैं, तब आंबेडकर की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। स्वतंत्रता दिवस पर उनके नाम का अभाव हमें यह सोचने के लिए विवश करता है कि क्या हमने स्वतंत्रता के मूल उद्देश्य को पूर्ण रूप से समझा और अपनाया है? सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब हम आंबेडकर के सपनों को केवल इतिहास की किताबों में नहीं, बल्कि नीतियों, व्यवहार और समाज की संरचना में उतारें। तभी भारत वास्तव में उस स्वतंत्रसमान और बंधुत्व पूर्ण” गणराज्य के रूप में खड़ा होगा, जिसका सपना उन्होंने देखा था।0000

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