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हिंदू और मुसलमान हमेशा एक दूसरे के विपरीत क्यों?

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शुरुवात कैसे हुई दुश्मनी की। इस्लाम का जन्म हुआ मक्का में आज से करीब 1400 साल पहले, हिंदुस्तान से हजारों मील दूर । सनातनियों को इस धर्म के बारे में कुछ मालूम नहीं था । अरब से एक मुहम्मद बिन कासिम आए राजा दाहिर से लड़ने नौवीं शताब्दी में ।युद्ध हुआ । हारे जीते युद्ध में , दाहिर की मृत्यु कहते हैं इसी राजा से युद्ध के दौरान हो गई वो लड़ाई दो राजाओं के बीच थी , हिंदू मुस्लिम जैसा कुछ नहीं था । हिंदू फिर रहने लगे डेढ़ सौ साल तक शांति से। फिर आए गजनवी लूटने भी, मारने भी , स्त्रियों को गुलाम बनाने भी , इस्लाम के नाम से , क्योंकि हिंदू मूर्तिपूजा क्यों करते हैं इस्लाम में ये कुफ्र है यानी बड़ा गुनाह । बस उसके बाद इस्लामी आक्रमणकारी आते गए, वही मूर्तिपूजकों को काफिर मानकर उनकी हत्या , दंड देने को कई सुलतानों ने इस्लाम की आज्ञा मानकर सजाएं दीं। यह सात सौ सालों के इतिहास में लिखा है खुद मुस्लिम इतिहासकारों ने पूरी ईमानदारी से इन सजाओं को लिखा है । बस हिंदुओं के साथ मुस्लिमों की दुश्मनी की वजह यही है । पर ये भी सही है की समझदार मुस्लिम ऐसा नहीं मानते।

हिंदू-मुसलमान एक क्यों नहीं हो सकते?

क्या करोगे भई एक हो कर ? सरकार और व्यवस्था ने कुछ हद तक दोनो को जबरन ही सही साथ में बांध कर तो रखा ही है जिससे विशेष संप्रदाय वालों को कसमसाहट जो रही है ।

पढ़ने लिखने गाने बजाने में उन्हें कोई दिलचस्पी है नहीं उन्हें बस आबादी और अक्सरियत बढ़ाने और अपना अकीदा दूसरों के गले जबरन उतारने में दिलचस्पी है , तो ऐसे में एकता के कोई माने नहीं हैं ।

गंगा जमुनी तहजीब और कौमी एकता के ढकोसले के नाम पर काफी हिंदुओं को इन्होंने और फिल्मवालों ने गुमराह किया ही है ।

तभी श्रद्धा वाल्कर और तुनिशा वाली वारदात होती है।

और राउल बाबा कहते हैं कि यह सब झूठ है । मतलब बताओ ??

मेरे बचपन में दूरदर्शन पर एक सीरियल आता था जिसमें पढ़ाई में कमजोर बच्चे के पीछे उसके मां बाप पड़ते थे “पम्मी आई ए एस बनो” टाइटल सॉन्ग कुछ यूं था “क्या बनोगे , क्या बनोगे क्या बनोगे मुन्ना तुम ? मम्मी कहती बाणों डॉक्टर पापा कहते अफसर , इंजिनियर बन जाओ भैया …”

मुझे भी कुछ यही पूछने का मन कर रहा है इस एकता रानी के हाथ थाम कर हमारा क्या फायदा होगा ?

इस देश में ज्यादा टैक्स और अक्सरियत होने के बावजूद हम हिंदुओं को स्पेशल ट्रीटमेंट मिलता नहीं है ४७ में इनके लिए सेपरेट देश दे दिया बावजूद अब इस देश में जो कुछ है हमको इनके साथ बांटना पड़ रहा है ।

हिंदू तो हमेशा घाटे में ही रहे न।

बाकी यह लोग बांटने का ठीकरा भले किताबों पर फोड़े। हमारी एक किताब बंटवारे का समर्थन नहीं करती , जिनकी करती है उन्होंने बंटवारे की मांग भी की तो साहब कुसूर किताब का नहीं जहनियत का है , जो यूं तो बदलेगी नहीं ।

हिन्दू और मुसलमान के बीच मे नफरत का मूल कारण है इसका विरोध न करना। कुछ राजनीतिक दल अपने निजी फायदों के लिये कुछ मुसलमानों या हिन्दुओ के द्वारा किये गयं दुष्कर्मो को पूरी कॉम पर मढ़ कर अपना फायदा लेते है। इसमें कुछ बेवकूफो के साथ मिलने के साथ अन्य भी भेद चाल में ही चल कर इसे समर्थन देने लगते है।

परन्तु अक्सर ये देखा जाता है कि हिन्दुओ में इसका विरोध किया जाता है, परन्तु केवल कुछ ही मुस्लिम इस भेदभाव का विरोध करते है शायद वे अपनी ही कोम से निष्कासित होने के डर से नही करते जिस से उन पर हिन्दुओ को भरोसा कम होता जा रहा है।

जब तक वे खुल के गलत को गलत नही कहेंगे तब तक दूसरे दलों को उन पर उंगली उठाने का मौका मिलता रहेगा। इसलिए मैं ये आशा करता हूँ की कोई भी जाति का व्यक्ति केवल अपने निजी हित या अपनी कोम के बारे में न सोचते हुए अपने देश के लिये पहले सोचे और किसी भी गलत काम को चाहे वह उनके कोम के कुछ लोगो द्वारा किया जा रहा हो, उसका खुल के विरोध करना चाहिए जिससे किसी को भी केवल कुछ लोगो के पाप का भागी पूरे समुदाय या कोम को बोलने का मौका ना मिले।

 क्या भारत में सचमुच हिंदुओं और मुसलमानों को एक दूसरे से खतरा है ?

मेरा जन्म जिस जगह हुआ था वहाँ की 50% से ज्यादा आबादी मुसलमान है| हमने साथ मिलकर दिवाली, होली और ईद मनाई है | हमारे समय में सलीम, एआज़, रियाज़ , सब मिलकर होलिका सजाते थे, और हम ताजिया बनाते थे| मेरा पड़ोसी जलालउद्दीन कस्बे का सबसे बेहतरीन रावण बनाता था और उसका भाई जावेद रात में राम बनकर रावण दहन करता था|


पूरे भारत में की दंगे देखे पर हमारा कस्बा और हमारा जिला काभी धार्मिक आग में नहीं झुलसा| | न बाबरी के बाद, न गोधरा के बाद| सब अपने काम से काम रखने वाले लोग थे|


पिछले 7-8 वर्ष से समीकरण बदलने लगे हैं, नई पीढ़ी के कुछ हिन्दू मुसलमान बच्चे फेस्बूक यूनिवर्सिटी द्वारा पढ़ाई गई धार्मिक कट्टरता का शिकार हैं और अलग ग्रुप बनाकर रहते हैं | उनकी सोच उनकी फेस्बूक पोस्ट से भी परिलक्षित होती है|

बड़े अपने काम में मशरूफ़ हैं , और बुजुर्गों की कोई सुन नहीं रहा है| भटके हुए लोगों को कौन रास्ता दिखाएगा|?

फिर भी जिनकी उम्र 30 के ऊपर है, वे समझदार हैं और मिलजुक कर रहते हैं| ईद के दिन मैं उनके यहाँ सिवैयाँ खाने जाता हूँ और उनकी बच्चियाँ दुर्गा अष्टमी के दिन हमारे यहाँ कन्या भोज में आती हैं| हम एक दूसरे की बारात में डांस भी करते हैं |


2018 के पंचायत चुनाव में भाजपा समर्थित जयराम की जीत हुई थी और उसने काँग्रेस के हाजी सुल्तान को 2 वोट से हराया था|
2022 में भाजपा ने जयराम को समर्थन नहीं दिया तो वो काँग्रेस में चला गया और हाजी सुल्तान भाजपा में या गया । जब चुनाव हुए तो हाजी सुल्तान ने काँग्रेस समर्थित प्रत्याशी को 250 वोट से हराया|

और विस्तार से बताऊँ तो हमारे यहाँ आर धर्म के लोग शिवराज सिंह की सादगी को काँग्रेस के ज्योतिरकदित्य सिंधिया की अकड़ से ज्यादा पसंद करते थे| पर अमित शाह और मोदी की जुगाड़ू और तोड़ फोड़ की राजनीति की कीमत हमारे यहाँ से शिवराज सिंह ने चुकाई|

राजनैतिक दल अपने फायदे के लिए धर्म या जाती नहीं देखते हैं और अपने फायदे के लिए हमें धर्म और जाति के नाम पर लड़ा भी देते हैं।


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