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क्यों एक अद्भुत गहरी रेमेडी  होम्योपैथी

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नीलम ज्योति 

     _होम्योपैथी चिकित्सा करने में अधिक गहराई में जाती है। यह मनोमय कोष, मनस-शरीर पर भी कार्य करती है। यहाँ रोग पर नहीं, तन मन के सिम्पटम्स पर विचार किया जाता है. यह लक्षण चिकित्सा है. डॉक्टर आप की मनोस्थिति, आपकी सोच, पॉजिटिविटी, निगेटिविटी, स्वप्न, तासीर, रूचि, अरुचि, लाइफ हिस्ट्री भी पूछता है. जो डॉक्टर रोगी की गहन एनालिसिस नहीं करता वह होम्योपैथी के साथ खिलवाड़ करता है.

   इस रेमेडी संस्थापक हैनिमैन ने अपनी सर्वकालिक महानतम खोजों में से एक खोज की और वह थी औषधि की मात्रा. यह जितनी सूक्ष्मतर होती जाती है उतनी ही वह और गहराई में पहुंच जाती है। उन्होंने होम्योपैथी की औषधि को बनाने की इस विधि को ‘शक्तिकरण’-‘गुणन’ (potentizatio) कहा। 

     वे औषधि की मात्रा कम करते चले जाते हैं। वे औषधि की एक निश्चित मात्रा लेगे और इसे दस गुना मिल्क शुगर या पानी के साथ मिश्रित करेगे। एक भाग औषधि और दस भाग पानी, वह इनको मिला देगे। फिर पुन: वह इस नये मिश्रण का एक भाग लेगे और पुन: वह इसको नौ गुने पानी या मिल्क शुगर के साथ मिला देगे।

     इसी ढंग से वह आगे बढ़ेगे; पुन: वह नये घोल से एक भाग लेगे और उसे नौ गुने पानी में मिला देगे। वह ऐसा करेगे और औषधि की शक्ति बढ़ेगी। धीरे-धीरे औषधि परमाणु के तल पर पहुंच जाएगी।

     यह इतनी सूक्ष्म हो जाएगी कि आप विश्वास ही नहीं कर सकते कि यह कार्य कर सकती है. यह करीब-करीब मिट चुकी होती है।

    यही है जो होम्योपैथिक औषधियों पर लिखा होता है पोटेंसी. छ: पोटेंसी, तीस पोटेंसी, दो सौ पोटेंसी, एक हजार पोटेंसी। जितनी बड़ी पोटेंसी होगी औषधि की मात्रा उतनी ही कम होगी।.

    दस लाख पोटेंसी का अर्थ है : मूल औषधि का दस लाखवां भाग ही शेष बचा है, लगभग ना— कुछ अंश है उसमें। वह करीब-करीब मिट चुकी है, लेकिन तब यह मनोमय की सर्वाधिक गहरी परत में प्रविष्ट हो जाती है।

    यह आपके मनस शरीर में प्रविष्ट हो जाती है। यह एक्यूपंक्चर से अधिक गहराई में जाती है। यह करीब-करीब ऐसा ही है जैसे कि आप परमाणु के तल पर या परमाणु से भी सूक्ष्म स्तर पर पहुंच गए हो।

    तब यह आपके शरीर को स्पर्श नहीं करती है, तब यह प्राण शरीर को भी स्पर्श नहीं करती. यह तो बस भीतर प्रविष्ट हो जाती है।

    यह इतनी सूक्ष्म है और इतनी छोटी कि इसके रास्ते में कोई अवरोध नहीं आता। यह तो बस मनोमय कोष, मनस शरीर में प्रविष्ट हो जाती है और वहां से यह कार्य करना आरंभ कर देती है। यानी अब आप को प्राणमय कोष से भी बड़ा अधिष्ठाता मिल गया है।

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