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*आईएएस और आईपीएस अधिकारी इतने बेबश क्यों*

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सनत जैन

भारतीय संविधान के अनुसार देश की प्रशासनिक व्यवस्था (कार्यपालिका) के प्रमुख स्तंभ आईएएस और आईपीएस अधिकारी इतने बेबश होंगे, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है। लोकतंत्र के स्तंभ अधिकारी जब अपनी ही रक्षा नहीं कर पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में आम नागरिक किस हालत मे रह रहे होंगे। इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। हाल ही में विदेश सचिव विक्रम मिशरी उनकी बेटी और उनके परिवार जनों पर जिस तरह से ट्रोलरों द्वारा उनके ऊपर हमला किया। ट्विटर अकाउंट पर उन्हें गद्दार, देशद्रोही और ऐसे ऐसे शब्दों से उन्हें और उनके परिवार को नवाजा गया। उससे वह इतने हताहत और भयभीत हुए, उन्होंने अपने ट्विटर अकाउंट को प्राइवेट कर दिया। कुछ इसी तरह की घटना हिमांशी नरवाल के साथ हुई थी। उनके पति सेना में थे, कुछ दिन पहले ही शादी हुई थी। पहलगाम हनीमून मनाने गए थे, वहां आतंकी घटना में उनके पति की आतंकियों द्वारा हत्या कर दी गई थी। हिमांशी ने कश्मीर के लोगों के बारे में बताते हुए कहा, कश्मी‎रियों ने घटना के बाद सबकी मदद की है। उनकी इतना कहते ही सोशल मीडिया पर ट्रोलरों ने सेना के अधिकारी की विधवा हिमांशी पर हमला करते हुए उसे जिस तरीके से अपमानित किया है। सारे देश ने वह देखा है। सोशल मीडिया के ट्रोलर्स जिन्हें सत्ताधारी राजनीतिक दल का संरक्षण प्राप्त है। वह सत्ताधारी दल की विचारधारा के विपरीत यदि कोई बात कह देता है, तो उसे देशद्रोही, गद्दार, पाकिस्तान चले जाओ और तरह-तरह के ऐसे शब्दों से नवाजा जाता है। जिसे ट्रोल किया गया है वह डर तथा भय के कारण शांत होकर बैठ जाता है। सरकार और प्रशासन द्वारा इन ट्रोलरों को नजर अंदाज कर दिया जाता है। ट्रोलिंग की इस अराजक संस्कृति ने संविधान प्रदत अ‎भिव्य‎‎क्ति की स्वतंत्रता का लाभ उन परिवारों को निशाना बनाने के ‎लिये ‎किया जाता है, उनकी व्यक्तिगत गरिमा को चोट पहुंचाई जाती है। व्य‎‎क्तिगत कार्यशैली और निष्पक्षता पर भी सवालिया निशान लगाकर सोशल मीडिया में अपमानित किया जा रहा है। उसके बाद भी ऐसे लोगों पर कार्यवाही नहीं होना आश्चर्य का विषय है। कार्यवाही करने की जिम्मेदारी आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के ऊपर है। वह निंदा तो कर रहे हैं, लेकिन कोई कार्यवाही नहीं कर रहे हैं। इससे समझा जा सकता है हमारा प्रशासनिक तंत्र राजनेताओं के सामने किस तरह से बेबस है। भारतीय संविधान में नागरिकों को जो मौलिक अधिकार ‎मिले हैं। वह कानून की किताबों में तो सुरक्षित हैं, वास्तविकता उसके ठीक विपरीत है। ट्रोल आर्मी द्वारा कई वरिष्ठ अधिकारियों का सोशल मीडिया पर घोर अपमान और निराधार आरोप लगाकर समय-समय पर ट्रोल किया गया है। ट्रोलर्स उन्हें भी राजनीतिक एजेंडे से जोड़ते हैं। उनके निजी जीवन में झाँकते हैं। प्रशासनिक अधिकारियों के निर्णयों और कार्यवाही को पक्षपातपूर्ण ठहराते हैं। यह सिलसिला तब खतरनाक हो जाता है। जब सत्ता पक्ष के समर्थक संगठित रूप से अधिकारियों, पत्रकारों, राजनै‎तिक दलों के नेताओं और आमजनों को निशाना बनाते हैं। यह स्थिति मनोबल गिराने और भय फैलाने का काम करती है। स्वतंत्र प्रशासनिक निर्णयों में बाधा डालने के रुप में इसे देखा जाता है। सबसे चिंताजनक बात यह है, इस तरह की ट्रोलिंग सुनियोजित रूप से कई वर्षों से की जा रही है। बॉट्स एप, फेक आईडी और संगठित रूप से आईटी सेल की भूमिका सामने आई है। जब सजग अधिकारी अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए निष्पक्ष रूप से कार्यवाही करता है या भ्रष्टाचार- पक्षपात के खिलाफ कड़े कदम उठाता है। तो उसका विरोध ट्रोलिंग के रूप में सामने आता है। कई मामलों में परिवार को भी निशाना बनाया जाता है। परिवार सहित लोग मानसिक तनाव का शिकार होते हैं, जिससे उनके कार्य पर ‎विप‎रित प्रभाव पड़ता है। डर और भय के कारण वह अपने कर्तव्यों का सही ढंग से पालन भी नहीं कर पाते हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अधिक जिम्मेदार बनाना होगा। शासन और प्रशासन को बिना किसी भेदभाव के साइबर लॉ को सख्ती से लागू करना होगा। सरकार को ईमानदारी से काम करने वाले अधिकारियों की सुरक्षा और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए कदम उठाने होंगे। संविधान ने अधिकारियों की जिम्मेदारी कानून के रुप में तय की है। संविधान के प्रति उनकी भी जवाबदेही है यदि वही अपने अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाएंगे, तो भगवान ही मालिक है। ट्रोलिंग के इस जहरीले जाल से प्रशासनिक, न्यायिक सेवा और आम नाग‎रिकों को बचाना है, तो समाज, सरकार और न्यायपालिका को मिलकर इसके लिये ठोस पहल करनी होगी। अधिकारियों को निर्भीक होकर काम करना होगा। अधिकारी यदि अपने ही सम्मान, कर्तव्य और अधिकारौं पर ध्यान नहीं देंगे। ऐसी स्थिति में आम नागरिकों के अधिकारों को सुरक्षित रख पाना केवल हवा हवाई होगा। सोशल मीडिया की आज़ादी अभिव्यक्ति का माध्यम है। इसे किसी भी नागरिक की गरिमा को रौंदने का हथियार नहीं बनना चाहिए। भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों और भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारियों ने घटना की निंदा की है। उनके पास कार्यवाही करने के जो अधिकार थे, उन अधिकारों का प्रयोग उन्होंने क्यों नहीं किया। इसको लेकर आम आदमी अब चिंतित है। अधिकारी जब अपने और अपने परिवार की ही रक्षा नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे सिस्टम पर आम नागरिकों को कैसे भरोसा होगा। इसे आसानी से समझा जा सकता है। सरकार में बैठे मंत्रियों और प्रशासनिक अधिकारियों को इस बात को समझना होगा। आज विक्रम मिस्री और उनके परिवार के साथ जो हुआ है, वहीं अन्य अधिकारियों का भी समय आने पर हो सकता है। ‎विक्रम मिस्री और ‎हिमांशी को ‎जिन मी‎डिया एकाउन्ट से ट्रोल ‎किया गया है, उनके एकाउन्ट तुरन्त सरकार को बंद करना चा‎हिए। दो‎षियों की पहचान कर दं‎डित ‎किया जाना चा‎हिए। य‎दि ऐसा नहीं ‎किया गया तो आने वाले समय में कोई भी इसका ‎‎शिकार हो सकता है। यह समस्या इतनी बढ़ गई है। कई लोगों ने ट्रोलरों के दबाव में आत्महत्या कर ली। सरकार और प्रशासन कठोर कार्यवाही करे, यही आशा की जा सकती है।

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