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एशियाड और ओलंपिक में भारत की इतनी शर्मनाक स्थिति क्यों ?

Mandatory Credit: Photo by Aflo/Shutterstock (10346040b) The Olympic Rings adorn an event square which opens at Tokyo's Nihonbashi to mark just one year to the start of the 2020 Tokyo Olympics and Paralympics. Tokyo Olympic Games One Year to Go, Japan - 24 Jul 2019

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कितने राष्ट्रीय शर्म,क्षोभ और दुःख का विषय है कि क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में सातवाँ सबसे बड़ा और जनसंख्या के दृष्टिकोण से दूसरा सबसे बड़ा देश भारत एशियाड खेलों या ओलंपिक की पदक तालिका में ताईवान,उत्तर कोरिया,दक्षिण कोरिया,ईरान और इंडोनेशिया जैसे नन्हें,गरी़ब और निर्धन देशों से भी पीछे शर्मनाक नम्बर पर आ जाता है । हम दुनिया की आबादी के 17.5 प्रतिशत और पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को घेरे एक अरब पैंतीस करोड़ लोगों का एक बड़ा देश एक-एक पदक के लिए तरसते रहते हैं ! ताइवान जैसा छोटा देश,जो एक छोटे से टापू पर स्थित है जिसका क्षेत्रफल हमारे एक छोटे से राज्य केरल से भी छोटा है ! जिसकी आबादी हमारे पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा से भी कम है ! हमारे कथित भारत महान से ज्यादे पदक लेकर पदकतालिका में हमारे से ऊपर स्थान बनाने में कामयाब हो जाता है ! सच्चाई यह है कि हम काल्पनिक और मिथ्याशब्द आडंबरों से अपनी प्रशंसा में स्वयं को कथित विश्वगुरु,जगतगुरु और आध्यात्मिक गुरू कहकर अपनी पीठ भले ही थपथपा लेते हों लेकिन जब वास्तविकता के धरातल पर विश्व के अन्य देशों से तुलना होती है तो हम चाहे खेलों में श्रेष्ठता की बात हो,स्वास्थ्य का मामला हो,शिक्षा की बात हो,आम जनता के जीवन में खुशहाली का मामला हो,महँगाई की बात हो,गरी़बी की हो,भूख से मरने की हो,नवजात शिशुओं की मृत्यु दर हो,रोजगार का हो,साफ्ट पॉवर शक्ति का हो,पर्यटन का मामला हो हर क्षेत्र में हम विश्वस्तर पर कहीं भी नहीं ठहरते हैं,हर क्षेत्र में हमारी स्थिति अत्यन्त दयनीय और शर्मनाक है ! हम लगभग हर पाँच वर्षों पर विश्व में होने वाली खेल प्रतिस्पर्धाओं यथा एशियाड ,ओलम्पिक या अन्य वैश्विक खेल प्रतिस्पर्धाओं में अपनी और अपने देश की मान-मर्यादा,स्वाभिमान, आत्मगौरव को अपनी शर्मनाक पराजय से धूल-धूसरित करते रहने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते हैं ! यक्ष प्रश्न है कि हर बार इस शर्मनाक स्थिति से उबरने के लिए हम भी चीन जैसे कुछ सालों के लिए इन खेल प्रतिस्पर्धाओं से अपने को अलग रखकर,गाँव,जिले,राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर ईमानदारी से प्रतिभागियों का चुनाव कर,उन्हें विश्वस्तरीय प्रशिक्षण देकर,उन्हें इस लायक  बनाने का ईमानदारी से प्रयत्न क्यों नहीं करते ताकि विश्वस्तरीय खेल प्रतिस्पर्धाओं में हम भी अपनी आबादी और क्षेत्रफल के समानुपातिक पदकतालिका में अपना सम्मान जनक स्थान बना सकें ! पदकतालिक में भारतीय खेल की टीम की इस दीन-हीन अवस्था इस देश के सभी स्वाभिमानी आवाम का भी मन लज्जा और शर्म से भर उठता है !

दुनिया के अत्यन्त छोटे-छोटे देश जिनकी आबादी हमारे किसी एक बड़े महानगर के बराबर और हमारे एक छोटे से प्रदेश के बराबर क्षेत्रफल के बराबर है वे देश भी एशियाड ओलम्पिक या पैराओलंपिक या अन्य खेल प्रतियोगिताओं में पदक तालिका में हमसे ज्यादे पदक जीतकर हमें हर बार शर्मिंदा करते रहे हैं । हम हैं,कि हमें शर्म आती ही नहीं ! न हमारे अन्दर राष्ट्रीय अस्मिता का बोध है,न राष्ट्रीय गौरव है ! हम हर दूसरे,चौथे साल विश्व स्तर पर आयोजित इन खेल प्रतिस्पर्धाओं में अपनी विश्वस्तरीय बेइज्जती कराते ही रहते हैं,परन्तु हम आगे अपनी कमियों को सुधारकर पदकतालिका में अपना सम्मानजनक स्थान बनाने के लिए पिछले ओलंपिक,राष्ट्र मंडल या एशियाड आदि खेलों में आए शर्मनाक पदक से आत्मग्लानि का बोध करके इन खेलों के महाकुंभ शुरू होने से काफी पहले ही ईमानदार कोशिश आज तक कभी भी नहीं किए हैं ! आखिर हमारे देश,यहाँ के समाज और यहाँ की सत्तारूढ़ सरकारों के कर्णधारों का स्वाभिमान का इतना पतन क्यों हो गया है ?                कुछ युवा खिलाड़ी गरी़बी और सरकारी सुविधा से वंचित होते हुए भी अपनी लगन, परिश्रम,जीवटता और जुझारूपन से एक-आध  अप्रत्याशित पदक लाते भी हैं,जो उसका सारा श्रेय उनका व्यक्तिगत होता है,सरकार उनके खेल के पदक लाने से पूर्व उनको खेल की तैयारियों में कोई आर्थिक मदद नहीं की होती है,हाँ,पदक मिलने के बाद उन्हें आर्थिक तौर पर बहुत मोटी राशि देने की झड़ी लगा देती है । वर्तमान समय में अपने देश में खेलों की इतनी दयनीय और शर्मनाक स्थिति के लिए इस देश में सर्वव्याप्त भ्रष्टाचार,जातिवाद,गरी़बी,भूखमरी,बेरोजगारी, भाई-भतीजावाद ,शिक्षा पर शिक्षामाफियों का कब्जा और सबसे ज्यादा जिम्मेदार यहाँ की आपाद भ्रष्टाचार में डूबी राजनैतिक व्यवस्था है । दुनिया के बहुत से छोटे-छोटे देशों में भी वहाँ के स्कूलों में चाहे वे शहरी क्षेत्र में हों या ग्रामीण क्षेत्र में हों वहाँ के स्कूलों के भवन सभी सुविधाओं यथा उनके सुन्दर,आरामदायक भवन,मेज-कुर्सियाँ,प्रयोगशालाएं,स्वच्छ पेय जल, शौचालय,खिलाड़ियों के लिए सभी सुविधाओं से संपन्न खेल के सुन्दर मैदान आदि सभी सुविधाएं रहतीं हैं जहाँ पढ़ने और खेल-कूद की एक सुदृढ़ संरचना और संस्कृति बनी हुई है। वहाँ छोटे बच्चों को बचपन से ही खेलने की हर तरह की सुविधा और मदद वहाँ की सरकारों द्वारा बिना किसी जातिगत व धार्मिक भेदभाव के स्कूलों में व्यवस्था कराई जाती है,वहाँ राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभावान खिलाड़ियों का चयन बिना किसी जातिगत और धार्मिक भेदभाव और पक्षपात के किया जाता है । खेलसंघों के मुखिया खेल के उच्च जानकार और विशेषज्ञ लोग होते हैं,जो वैज्ञानिक आधार पर विशेषज्ञ प्रशिक्षकों की देख-रेख में बच्चों को खेल की बारीकियों के साथ कठिन प्रशिक्षण देते हैं,वही उच्च प्रशिक्षित खेलों के खिलाड़ी अन्तर्राष्ट्रीय खेल प्रतिस्पर्धाओं में अपने देश के राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक पदकों की झड़ी लगा देते हैं ।
                  हमारे देश में भी उक्तवर्णित विदेशों में जैसे स्कूलों में सरकार द्वारा बच्चों को सुविधाएं प्रदान की जातीं हैं और बगैर किसी जातिगत् व धार्मिक भेदभाव के प्रतिभागियों का वहाँ चयन होता है कुछ इसी तरह की व्यवस्था हो,तो निश्चित रूप से हमारे देश में भी प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की कमी नहीं है । खिलाड़ियों के चयन में निष्पक्षता,देश भर में फैले स्कूल-कॉलेजों में पढ़ाई और खेल का स्वस्थ्य वातावरण,खेल महासंघों  के अध्यक्ष पद से भ्रष्ट नेताओं को हटाकर खेल विशेषज्ञों की नियुक्ति आदि-आदि कुछ समाधान हैं,जिनको करके हमारा देश भारत भी खेल की दुनिया में अपना सम्मानजनक स्थान अवश्य बना सकता है। इसके अतिरिक्त खेलों में सम्मानजनक स्थान पाने का अन्य कोई समाधान का उपाय नहीं है । प्रायः हम देखते हैं एशियाड,राष्ट्रमंडल या ओलंपिक में इस देश की शर्मनाक पदक तालिका के बाद तुरंत खेलों में सुधार करने और बेईमानी तथा भ्रष्टाचार खतम करने की बातें और कसमें तथा संकल्प समाचार पत्रों, टीवी कार्यक्रमों में खूब जोर-शोर से होती है,परन्तु थोड़े ही दिनों बाद होता कुछ नहीं है,बल्कि सब कुछ पुनः हरबार शीतनिद्रा में चला जाता हैं,पुनःभाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और खेलों तथा खिलाड़ियों की उपेक्षा होनी शुरू हो जाती है,जबकि एशियाड, राष्ट्रमंडल,ओलंपिक या उस जैसी सम्मानित वैश्विक स्तर की अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में पदक लाने के लिए वर्षों की मेहनत,लगन व कड़े अभ्यास की जरूरत पड़ती है। यक्ष प्रश्न है इस मामले में हम,हमारा समाज और हमारा देश कब सुधरेगा ?आखिर हमारे देश,यहाँ के समाज और यहाँ की सत्तारूढ़ सरकारों के कर्णधारों के राष्ट्रीय स्वाभिमान का इतना पतन क्यों हो गया है ! वास्तव में इस देश में प्रतिभाशाली प्रतिभागियों की कमी नहीं है,कमी इस देश के शीर्ष स्तर पर बैठे नौकरशाहों,भ्रष्ट नेताओं और नीतिनिर्धारकों की नीयत में है जो अपने स्वार्थ,कमीशन,भाई-भतीजावाद के चलते प्रतिभागियों के चयन में ही हेराफेरी करके सुयोग्य और सुपात्र प्रतिभागियों का चयन न करके अपने अयोग्य रिश्तेदारों,मित्रों और रसूखदार लोगों के बच्चों का प्रतिभागी के तौर पर चयन कर इन वैश्विक स्तर के खेल प्रतिस्पर्धाओं में भेजकर इन वैश्विक प्रतिस्पर्धाओं में इस देश और इस बड़े राष्ट्र राज्य की नाक कटाने का कुकृत्य करते रहते हैं। अब यह स्थिति सुधरनी ही चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतिस्पर्धाओं में भेजे जाने वाले प्रतिभागियों के चयन में ईमानदारी और पारदर्शिता होनी ही चाहिए,इसके अतिरिक्त ईमानदारी से चयनित इन अभ्यर्थियों के प्रशिक्षण के लिए विश्वस्तरीय सुविधाएं भी उन्हें प्रदान की जानी चाहिए । अगर उक्तवर्णित ये ईमानदार कोशिश की जाय तो निश्चितरूप से हमारा देश खेलों के इन महाकुंभों की पदकतालिका में अन्य विकसित,बड़े तथा स्वाभिमानी देशों की तरह सम्मानित स्थान पर विराजमान हो सकता है ।
-निर्मल कुमार शर्मा ,प्रताप विहार ,गाजियाबाद ,उप्र

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