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सीएम बनने की इतनी जल्दी क्यों है अजित पवार को?

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गंगाधर ढोबले

अजित पवार की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी के चार मायने हो सकते हैं। पहला, वर्तमान एकनाथ शिंदे सरकार पर मंडराते अस्थिरता के बादल। दूसरा, संकट को अपने पक्ष में भुनाने की महत्वाकांक्षा। तीसरा, ईडी-सीबीआई के छापों से बढ़ता दबाव और चौथा, मोदी-बीजेपी का समर्थन करने की राजनीतिक मजबूरी। आगे बढ़ने से पहले मौजूदा समीकरण पर एक नजर डाल लेना ठीक रहेगा।

बीजेपी की चिंता

चतुर राजनीतिज्ञ वही माना जाता है जो संकट न हो तो संकट पैदा करे और संकट पैदा हो तो उसे अपने पक्ष में मोड़ ले। शायद अजित दादा यही करना चाहते हैं। सन 2019 की घटना को याद करें।

इस तरह एनसीपी में बगावत का अजित दादा का पहला एपिसोड फेल हो गया। लेकिन उनके चाचा एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने कांग्रेस, उद्धव ठाकरे की शिवसेना और कांग्रेस के साथ मिलकर तीनों का असंभव सा लगने वाला गठबंधन बना लिया। उस सरकार में भी अजित दादा का सिक्का चल गया और वह फिर से उपमुख्यमंत्री बन गए। इसलिए इस कांड को बगावत कहें या शरद पवार की कोई राजनीतिक चाल इसके खुलासे में जाने की जरूरत नहीं है।

इस बार अजित दादा की दूसरी बगावत की चर्चा है। परदे के पीछे बीजेपी-अजित दादा के बीच मंत्रणाएं चलती रही हैं।

लेकिन अजित दादा की यह दूसरी बगावत भी असफल होती दिखाई दे रही है। इसलिए जनता की अदालत में वह आए और मुख्यमंत्री पद का अपना दावा ठोक दिया। साथ-साथ यह भी कह दिया कि जीते-जी एनसीपी नहीं छोडूंगा। इसमें भी शरद पवार की बल्ले-बल्ले है। न सांप मरा, न लाठी टूटी। न एनसीपी टूटी, न अजित दादा का कद बढ़ा। खुदा न खास्ता शिंदे-फडणवीस सरकार गिर गई तो शरद पवार कोई राजनीतिक चमत्कार भी करवा सकते हैं। उद्धव, शिंदे, कांग्रेस को जोड़कर नई सरकार बन सकती है और तब अजित दादा के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता खुल सकता है।

वैसे, उनके खिलाफ सिंचाई घोटाले और महाराष्ट्र सहकारी बैंक से एनसीपी से जुड़े लोगों की चीनी मिलों को अनाप-शनाप लोन मंजूर कराने के आरोप हैं। ईडी ने बैंक मामले में पहला आरोप-पत्र दाखिल किया है। इसमें अजित दादा का नाम नहीं है। लेकिन दूसरा पूरक आरोप-पत्र भी दाखिल हो सकता है।

एक जैसे दांव

राजनीतिक दांव पेच में चाचा-भतीजे एक जैसे हैं। दोनों ने हफ्तेभर के अंदर मीडिया को लंबे इंटरव्यू दिए, जिससे राज्य का राजनीतिक तापमान बढ़ गया। चाचा शरद पवार ने एक चैनल को इंटरव्यू में कह दिया कि अडाणी मामले में संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) जांच की जरूरत नहीं है। जब हो-हल्ला हुआ तो पलटकर कहा, ‘एनसीपी जेपीसी को उपयोगी नहीं मानती, लेकिन विपक्ष चाहता है तो हम इस पर दबाव नहीं डालेंगे।’ अब भतीजे अजित दादा ने एक मराठी अखबार को दिए इंटरव्यू में मुख्यमंत्री पद पर दावा ठोंक दिया। लेकिन बाद में इस पर हो-हल्ला हुआ, तो कह दिया, ‘मुख्यमंत्री पद की आकांक्षा कोई गलत बात नहीं है, लेकिन एनसीपी तोड़कर यह नहीं होगा। मैं जीते-जी एनसीपी में रहूंगा।’ राजनीतिक वार-पलटवार में हो गए न- यथा चाचा तथा भतीजा!

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