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भारत लगातार पतन की ओर क्यों जा रहा है

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~सत्यजीत सत्यार्थी

भारत क्या कोई भी देश या समाज जब वैसे लोगों को अपना सर्वश्रेष्ठ आइकॉन बना लेगा जो हिंसा से, कटुता से और प्रतिशोध की भावना से भरे हुए हैं तो वह देश या समाज निश्चित रूप से पतन की ओर जाएगा क्योंकि तब उस समाज का आदर्श अहिंसा, सद्भाव और क्षमा के स्थान पर हिंसा, कटुता और प्रतिशोध हो जाएगा और ये आदर्श निश्चित रूप से किसी भी देश या समाज का पतन ही कराएंगे.

भारत के सन्दर्भ में बात करूँ तो यहाँ अलग-अलग समुदायों या आइडियोलॉजी द्वारा अपना जो सर्वश्रेष्ठ आइकॉन चुना गया है वह गलत चुनाव है और इससे न सिर्फ़ वह समुदाय बल्कि पूरा देश पतन की ओर जा रहा है.

तीन महापुरुषों के सन्दर्भ में अपनी बात रखकर इसे स्पष्ट करता हूँ.

ऐसा देखा गया है कि ब्राह्मणों द्वारा परशुराम को अपना सर्वश्रेष्ठ आइकॉन चुना गया है, आरएसएस और भाजपा द्वारा सावरकर को और दलितों द्वारा डॉ. अम्बेडकर को.

परशुराम जयंती में परशुराम की लोकप्रियता चरम पर दिखाई पड़ी. दूसरों को छोड़िए कुछ वामपंथी मित्रों तक ने लोगों को परशुराम जयंती पर बधाईयाँ भेजीं और राहुल गांधी जैसे क्रान्तिकारी और लोकप्रिय नेता भी देश को परशुराम जयंती की शुभकामनाएँ दिए.

आरएसएस और भाजपा के सबसे उदार और महान व्यक्ति अटल बिहारी वाजपेयी माने जाते हैं और यह सही भी है. उन्होंने सावरकर के संबंध में एक भाषण में कहा था-

“सावरकर माने तेज, सावरकर माने त्याग, सावरकर माने तप, सावरकर माने तत्त्व, सावरकर माने तर्क, सावरकर माने तारुण्य, सावरकर माने तीर,  सावरकर माने तलवार, सावरकार माने तिलमिलाहट … सागरा प्राण तड़मड़ला, तड़मड़ाती हुई आत्मा, सावरकर माने तितीक्षा, सावरकर माने तीखापन, सावरकर माने तिखट. कैसा बहुरंगी व्यक्तित्व! कविता और क्रांति! कविता और भ्रांति तो साथ-साथ चल सकती है, लेकिन कविता और क्रांति का साथ चलना बहुत मुश्किल है.  कविता माने कल्पना, शब्दों के संसार का सृजन, ऊंची उड़ान. कभी-कभी ऊँची उड़ान में धरातल से पाँव उठ जाएँ, वास्तविकता से नाता टूट जाए तो कवि को इसकी शिकायत नहीं होगी. उसके आलोचक भी इस बात के लिए टीका नहीं करेंगे. मगर सावरकर जी का कवि ऊँची से ऊँची उड़ान भरता था,  मगर उन्होंने यथार्थ की धरती से कभी नाता नहीं तोड़ा. सावरकर जी में ऊँचाई भी थी और गहराई भी थी.”  मोदी जी द्वारा संसद भवन में गांधीजी की ओर पीठ करके सावरकर को प्रणाम करते हुए तस्वीर को किसने नहीं देखा है भला!

कांशीराम द्वारा डॉ. अम्बेडकर के प्रचार को जो क्लाइमैक्स दिया गया उससे दलितों का सबसे बड़ा आइकॉन अम्बेडकर बन गए और फिर लगभग हर राजनीतिक दल उनके चरणों में फूल चढ़ाकर उन्हें दलितों का सबसे बड़ा उद्धारक और संविधान निर्माता बताने लगे.

इससे भारत को बहुत हानि हुई और भारत पतन के रास्ते चला गया और अभी भी निरंतर उसी रास्ते जा रहा है. आइए समझते हैं कैसे!

परशुराम एक मिथकीय पात्र है और शास्त्रों में जैसा वर्णन है उसके अनुसार उसमें कई गुण और कई दुर्गुण भी हैं. वे एक महान तपस्वी, महान योद्धा और चिरंजीवी हैं. वे अपनी माँ की हत्या कर देते हैं और वरदान माँगकर उसे जिन्दा भी कर देते हैं, गणेश का एक दाँत तोड़ देते हैं और क्षत्रियों का इक्कीस बार संहार करते हैं. यह स्पष्ट रूप से दिखता है कि कुछ गुणों के साथ उनमें हिंसा, कटुता और प्रतिशोध की तीव्र भावना थी.

सावरकर का क्रान्तिकारी जीवन महान था और उनके इस जीवन से प्रभावित होकर भगत सिंह जैसे उच्च विचार वाले क्रान्तिकारी भी उनसे प्रेरणा लेते थे लेकिन जब वे पकड़े गए तो उनका क्रान्तिकारी सोच ताश के पत्तों की तरह बिखर गया और वे सत्ता के सामने सरेंडर कर दिए और फिर जब तक जीवित रहे तब तक देश-विरोधी कार्यों में संलिप्त रहे क्योंकि सत्ता से यही वादा करके वे कालापानी से निकले थे. उनका सबसे चरम पतन तब हुआ जब उनसे प्रेरित होकर उनका एक आदमी गांधीजी की हत्या कर देता है. सपष्ट रूप से देखा जा सकता है कि कालापानी से निकलने के बाद उनमें हिंसा, कटुता और प्रतिशोध की तीव्र भावना थी.

डॉ. अम्बेडकर एक महान विद्वान थे. उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए जबरदस्त कार्य किया. उन्होंने देश के संविधान निर्माण में महान योगदान दिया. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी वे देश के लोगों के लिए महान कार्य करते रहे. लेकिन स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि उनमें हिंसा, कटुता और प्रतिशोध की भावना भी थी. गांधी, नेहरू, पटेल और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों तथा इंडियन नेशनल कांग्रेस और हिन्दू धर्म व उसके शास्त्रों तथा इसके देवी-देवताओं के प्रति उनके मन में हिंसा, कटुता और प्रतिशोध की भावना थी. डॉ. अम्बेडकर जी से पूरी सहानुभूति रखते हुए देखने का प्रयास करूँगा तो यह पाऊँगा कि गांधीजी दलित उत्थान का जो कार्य कर रहे थे वह पर्याप्त नहीं था, गांधीजी के अनुयायी और कांग्रेस पार्टी दलितों के उत्थान के लिए उतना समर्पित नहीं थी जितना समर्पित होना चाहिए था. हिन्दू धर्म दलितों के साथ निःसंदेह अन्याय किया है और इस धर्म के देवी-देवता भी अन्याय किए हैं जो भले ही काल्पनिक हो. लेकिन डॉ. अम्बेडकर के प्रति पूरी सहानुभूति रखते हुए भी इस बात को justify नहीं किया जा सकता कि कोई देश या समाज हिंसा, कटुता और प्रतिशोध की भावना से आगे बढ़ सकता है. गांधी हत्या में अम्बेडकर साहब का यह कहना कि इसे सुनकर उनके मन में सिसरो के जैसा ख़्याल आया था जब सिसरो जूलियस सीजर की हत्या का समाचार सुने थे. आप जानते हैं कि सिसरो का क्या ख़्याल आया था? जब सिसरो ने सीजर की हत्या का समाचार सुना तो उन्होंने समाचार देने वाले दूत से कहा कि जाओ और जाकर रोम के नागरिकों को कह दो कि रोम अब स्वतंत्र हो गया है और इस हत्या के बाद जब वह सीजर के क़ातिलों में से एक ब्रूटस से मिला तो वे इच्छा व्यक्त किए थे कि इस हत्या के साजिश में उन्हें भी शामिल कर लिया होता. गांधी हत्या के कई वर्ष बाद भी अम्बेडकर साहब ने यह क्षोभ व्यक्त किया था कि गांधी का नाम अभी भी चल रहा है. गांधी के अनुयायियों और कांग्रेस तथा हिन्दू धर्म के प्रति भी उन्होंने चरम रूप से हिंसा, कटुता और प्रतिशोध की भावना व्यक्त किए हैं.

तो मेरा कहना है कि परशुराम, सावरकर और डॉ. अम्बेडकर साहब के जो भी महान गुण व कार्य थे उसके लिए उनकी प्रशंसा कीजिए जो कि स्वीकार करने योग्य होगा. इन्हें इनका due respect दीजिए जो मैं देता हूँ. लेकिन इन्हें किसी भी समाज व देश का सबसे बड़ा आइकॉन नहीं बनाया जा सकता  क्योंकि इन्हें सबसे बड़ा आइकॉन बनाने से हिंसा, कटुता और प्रतिशोध अच्छे गुण के रूप में established होंगे और फिर वह समाज और देश निश्चित रूप से पतन की ओर जाएगा. भारत के साथ यही हुआ है.

देश व समाज का सबसे बड़ा आइकॉन तो कोई बुद्ध या कोई गांधी जैसा व्यक्तित्व ही बन सकता है.

तो यह आप पर निर्भर है कि आप देश को किधर ले जाना चाहते हैं- बुद्ध और गांधी के रास्ते जहाँ सत्य, अहिंसा, प्रेम, करुणा व न्याय हो… न्याय उस स्तर तक जहाँ पशु-पक्षियों तक के लिए न्याय हो या हिंसा, कटुता और प्रतिशोध के मार्ग पर.

संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भारत के विमर्श परंपरा के आलोक में यह विमर्श मैं भारत के लोगों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ.

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