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निर्भया पुनः निर्दयता की शिकार और अपराधी निर्भीक क्यों

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शशिकांत गुप्ते

मुम्बई में पुनः एक निर्भया बर्बरता का शिकार हुई।इस तरह जंघन्य अपराध को आंजाम देने वाले इतने निर्भय कैसे हैं? इन क्रूर लोगों के हौसले कब तक बुलंद रहेंगे? अपराधी इतने बेख़ौफ़ कैसें?
स्त्रियों के लिए सुरक्षा,उनकी शिक्षा,उन्हें बराबरी का दर्जा,सामाजिक, राजनैतिक,व्यवसायिक व्यापारिक हर क्षेत्र में स्त्रियों को बराबरी का प्रोत्साहना मिलना चाहिए? क्या उक्त बातें स्त्रियों के लिए सिर्फ और सिर्फ कागजों पर,विज्ञापनों में और नित नई बनने वाली योजनाओं का प्रचार करने मात्र के लिए हैं?
एक फ़िल्म का यह संवाद बहुत प्रचलित हुआ था। कितने आदमी थे सियासत में यह संवाद बदल गया है।सियासत में यह संवाद इसतरह बोला जाता है। मेरे आदमी है? किसके आदमी है?कौन है, इन लोगों का सरपरस्त?सियासतदानो का सरक्षण तो सड़क और तब प्रत्यक्ष देखने की मिलता है जब,एक नाबालिग यातायात के नियम का उल्लंघन करता है और उसे पुलिसकर्मियों द्वारा रोका जाता है तब वह मोबाइल से अपने आक़ा कॉल करता है और उसका रसूखदार हिमायती बड़े अभिमान से कहता है, छोड़ दो यह मेरा अपना है।
नारी की सुरक्षा के समय हमारी धार्मिक आस्था कहाँ लापता हो जाती है? वैसे तो जब हमपर धार्मिकता का जुनून चढ़ता है,तब हम बेख़ौफ़ होकर, एक गरीब विधर्मी को मार मार कर अधमरा कर भगवान का नाम लेने के लिए बाध्य किया जाता है?
एक अबला के साथ जब हैवानियत होती है,तब Good goernance मतलब सुशासन का ढिंढोरा पीटने वालें अबला के परिजनों पर ऐसे अमानवीय कृत्य के लिए दबाव बनातें हैं कि, वे लोग आपराधिक मामले को रफादफा कर दे? गवाह और सबूतों को मिटाने के लिए सुशासन के लोगों द्वारा अबला के शव को अर्धरात्रि अग्नि को समर्पित किया जाता है। जब की धार्मिक मान्यता है सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार नहीं होता है?
सियासत में सक्रिय स्त्रियां जो सिर्फ निर्वाचित जनप्रतिनिधि ही नहीं है,बाकयदा संविधान की शपथ लेकर मंत्री भी बन गई हैं।ये स्त्रियां मौन क्यों हैं?क्या इन स्त्रियों की स्मृति तब ही जागती है, जब ये स्त्रियां विपक्ष में होती हैं,और तात्कालिक सरकार को कोसने के साथ कमजोरी का प्रतीक चिड़िया भेंट करने का नाटक करती है?
जब एक सूबे का आला अधिकारी, यह कर लोकतंत्र का मख़ौल उड़ाता है कि, आंदोलनकारियों का सिर फोड़ दो? जब एक केंद्रीय मंत्री देश ….. गोली मारो यह कहते हुए गर्व का अनुभव करता हो?
कैसे रुकेंगे यह निर्दयता पूर्ण अपराध?
ऐसे अनेक व्यावहारिक और स्वाभिवक प्रश्न आमजन के जहन में उपस्थित होतें हैं,और जगरूक नागरिक के जहन में ऐसे प्रश्न पैदा होने भी चाहिए?
राजनीति,धर्म,धनबल, और बाहुबल की जबतक सांठगांठ रहेगी,तबतक अपराधों का रुकना असम्भव है?
जबतक फिल्मों में खलनायक का आतंक दो घंटे पैंतालीस मिनिट तक दिखाया जाएगा और अंत के मात्र पांच मिनिट में खलनायक का नाटकीय अंत दिखया जाएगा तब तक अपराधियो के हौसले बुलंद रहेंगे?
जबतक भारतीय पटकथा लेखक खलनायक के द्वारा हर तरह के गैर कानूनी कार्य को बेख़ौफ़ होकर आंजाम देने की पटकथाएं लिखकर धनार्जन करतें रहंगे,तबतक अपराधियों को कानून की धज्जियाँ उड़ाते हुए नए नए अपराधों को आंजाम देने के तौर तरीके सीखने को मिलेंगे?
सफाई अभियान तब सार्थक होगा जब लोगों की दिमागी सफाई होगी?

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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