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*हमेशा चुनाव में क्यो चर्चा में रहता है रतन खतरी से लेकर फलोदी सट्टा बाजार*

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@सत्येन्द्र हर्षवाल

भारत मे कही भी चुनाव  हो  ओर सट्टा बाजार का जिक्र न हो असम्भव,बचपन मे ओपन टु क्लोज,ओर अक्खर जैसे शब्द न जाने कहा से कान में आ पड़ते थे,उत्सुकता भी रहती थी मगर उस वक्त यह सब जानकारी पहुच के बाहर थी,हा तब इतना जरूर सुना जाता था कि सट्टे में ही सबसे ज्यादा ईमानदारी है आज का तो पता नही खेर,सबसे पहले 1962 में वर्ली (बम्बई) कल्याण जी भगत जी ने इसकी शुरुआत की ,हालांकि 1961 में न्यूयॉर्क में कॉटन में यह सब था जिसे बाद में बंद कर दिया था बहरहाल,1962 के बाद रत्न ख़तरी ने 1964 में न्यू वर्ली मटका की शुरुवात की कल्याण जी भगत का मटका रोज चलता था जबकि रतन ख़तरी का सोमवार से शुक्रवार इसके बाद भी जो नाम ,सफलता रतन ख़तरी को मिली वो किसी को नही मिली, अक्सर बचपन मे सुना करते थे 1975-80 के दशक में की कल्याण में क्या आया, ओर यह भी सुनते थे कि फला अखबार में अक्खर(अंक) आते है,खेर, कराची, पाकिस्तान के एक सिंधी प्रवासी, रतन खत्री ने काल्पनिक उत्पादों और ताश के पत्तों की शुरुआती और समापन दरों की घोषणा करने का विचार पेश किया। संख्याओं को कागज के टुकड़ों पर लिखा जाता था और एक मटके , एक बड़े मिट्टी के घड़े में डाल दिया जाता था। फिर एक व्यक्ति एक चिट निकालेगा और विजयी संख्याओं की घोषणा करेगा। पिछले कुछ वर्षों में इस प्रथा में बदलाव आया, जिससे ताश के पत्तों की एक गड्डी से तीन नंबर निकाले जाने लगे, लेकिन नाम “मटका” ही रखा गया।इसी तरह इंदौर में भी सराफा बाजार में थी एक जगह जिसे गुदड़ी कहते थे,यही से पानी पतरा, (बारिश की संभावना पर सट्टा) गटर ( पानी गिरने के बाद गटर कितनी भरेगी इन सब पर भी इन्दोर में सट्टा चलता था,ओर उसका दृश्य कुछ ऐसा था उस दौर में कई सराफे की दो गैलरी में आमने सामने लोग खड़े रहते थे और चिल्ला चिल्ला कर भाव व सट्टा लगाते थे,आप सोच रहे होंगे कि इन पर उस समय क्या कोई रोक नही थी? तो जैसा में पहले लिखता आया हु की उस वक्त इन्दोर चार बिल्लास का था,बहुत कम आबादी थी,सतर्कता इतनी नही थी।

अब बात फलोदी सट्टा बाजार की राजेस्थान का एक जिला है फलोदी ,राजस्‍थान के फलौदी में रोजाना अघोषित तौर पर करोड़ों रुपए का सट्‍टा लगता है। सुबह 11 से देर रात तक तमाम मुद्दों पर सट्टा लगाया जाता है। बताया जाता है कि यहां करीब 20 से 22 मुख्‍य सट्टा कारोबारी हैं। इनके अलावा यहां सैकड़ों दलाल और सटोरिये हैं। यह सारे कारोबारी और सटोरिये बारिश, फसल, चुनाव, क्रिकेट से लेकर क्षेत्र में मामूली चीजों पर जैसे सड़क पर दो सांड की लड़ाई में कौनसा सांड जीतेगा और कौन हारेगा। किसी ने जूता फेंका तो वो सीधा गिरेगा या उल्‍टा पर भी सट्टा लगाया जाता है। कुल मिलाकर यहां नुक्कड़ से लेकर घरों तक सट्टा खेला जाता है। जिसमें बड़े से लेकर बच्चों तक फलौदी सट्टा बाजार में एक्टिव हैं। इसमे काम करने वालो को 3% कमीशन दिया जाता है,ऐसा कहा जाता है कि

राजस्‍थान के फलौदी में पिछले 500 साल से सट्टा लगाया या खेला जाता है। हाल ही में राजस्‍थान, मध्‍यप्रदेश, छत्‍तीसगढ़ समेत पांच राज्‍यों में हुए चुनावों की हार-जीत को लेकर भी फलौदी के सट्‍टा बाजार की बड़ी चर्चा है।

कैसे काम करते हैं फलौदी के सटोरिये : अब सवाल यह है कि आखिर कैसे फलौदी के सटोरिये लगभग सही अनुमान लगा लेते हैं। इसके पीछे उनके अपने तर्क हैं। मान लीजिए, उन्‍हें चुनावों में हार-जीत पर सट्टा लगाना है तो वे तमाम अखबारों और मीडिया की खबरों को देखते और पढते हैं, नेताओं की सभाओं में आने वाली भीड़ को देखते हैं, लोगों से चर्चा करते हैं, नेताओं के क्षेत्रों में आम लोगों से बात करते हैं। किस नेता को पसंद किया जा रहा है, किसे नापसंद। पार्टी की स्‍थिति क्‍या है और यहां तक कि अपने सट्टा नेटवर्क में बाकी सटोरिये किस पर सबसे ज्‍यादा दाव लगा रहे हैं यह सब देखते हैं और अपना एक ‘कलेक्‍टिव ओपिनियन’ तैयार करते हैं, इसी को आधार बनाकर रूझान तय किया जाता है। इसी आधार पर लोकसभा चुनावों में जीत-हार के दावे किए जा रहे हैं।हर्षवाल

*लेख की कुछ जानकारी गूगल महाशय से*

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