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पुस्तक को दिया गया पुरस्कार रद्द करने पर क्यों हो रहा है बवाल?

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विश्वनाथ सचदेव
लगभग 2 साल पहले अंग्रेजी में एक किताब छपी थी- ‘फ्रैक्चर्ड फ्रीडम’। इसकी चर्चा भी हुई थी, और यह पुस्तक काफी बिकी भी। साल भर पहले कोबाड़ गांधी की इस पुस्तक का मराठी अनुवाद पब्लिश हुआ। ट्रांसलेशन अनघा लेले ने किया था। कुछ ही दिन पहले महाराष्ट्र सरकार ने इस अनुवाद को पुरस्कृत कर पुस्तक को फिर से चर्चा में ला दिया। लेखक कोबाड़ गांधी और अनुवादक अनघा लेले, दोनों को खूब बधाइयां मिलीं। फिर अचानक महाराष्ट्र सरकार जैसे नींद से जागी और पुस्तक को दिया गया पुरस्कार रद्द करने की घोषणा कर दी। कारण यह बताया कि इस पुस्तक में लेखक ने नक्सलियों का महिमामंडन किया है और सरकार इसका समर्थन नहीं कर सकती। अवॉर्ड रद्द करने के साथ-साथ उस समिति को भी भंग कर दिया गया, जिसने पुस्तक को पुरस्कृत करने की सिफारिश की थी। सरकार के मुताबिक समिति का दायित्व बनता था कि वह सरकार की जानकारी में यह बात लाती कि इस पुस्तक में नक्सलियों का जयगान है!

इस्तीफों की झड़ी
मराठी साहित्य जगत में सरकार की इस समूची कार्रवाई की तीव्र भर्त्सना हो रही है। अनेक नामचीन रचनाकारों ने भी मराठी भाषा साहित्य से संबंधित पुरस्कार लेने से इनकार कर दिया है। प्रज्ञा पवार, शरद बाविस्कर, आनंद करंदीकर, सुहास पलसीकर जैसे साहित्यकारों ने सरकारी समिति से भी इस्तीफा दे दिया है। महाराष्ट्र सरकार के प्रति नाराजगी व्यक्त करने और इस्तीफा देने का यह सिलसिला अभी जारी है। सवाल यह है कि क्या संबंधित पुस्तक में सचमुच नक्सलवाद का महिमामंडन करके हिंसात्मक कार्यवाही का समर्थन किया गया है? इस संदर्भ में कुछ बातें गौर करने लायक हैं-

नक्सलवाद बनाम गांधी
यहीं यह भी रेखांकित किया जाना जरूरी है कि दलितों, पिछड़ों के संघर्ष के प्रति अपनी सहानुभूति को कोबाड़ गांधी ने कभी छुपाया नहीं। वह और उनकी दिवंगत पत्नी अनुराधा पिछड़ों के अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार सक्रिय रहे हैं, पर दोनों का यह भी कहना रहा है कि उन्होंने हिंसात्मक कार्रवाई का समर्थन कभी नहीं किया। ज्ञातव्य है कि सन 60-70 के दशक में बंगाल के नक्सलबाड़ी से दलितों-आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक आंदोलन शुरू हुआ था। आगे चलकर भले ही इस आंदोलन में ऐसे लोगों का प्रवेश हो गया जो अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए हिंसात्मक कार्रवाई को भी जायज मानते थे, पर आंदोलन से मूल रूप से सहानुभूति रखने वाले बहुत से लोग अहिंसात्मक संघर्ष के ही पक्षधर रहे। कोबाड़ गांधी का कहना है कि उनकी गणना ऐसे ही लोगों में होनी चाहिए। साथ ही उनका यह भी कहना है कि उनका उद्देश्य सामाजिक असमानता को समाप्त करना है। वह कहते हैं कि इस असमानता को समाप्त करने के लिए संघर्ष के लक्ष्यों को बदलना पड़ेगा। और समानता के संघर्ष के बजाय सबकी खुशी का संघर्ष करना होगा। यह संघर्ष सबकी प्रसन्नता, स्वतंत्रता और अच्छे मूल्यों के लिए होना चाहिए।

बहरहाल, देश का जनमानस आज यह तो चाहता है कि पिछड़ों को विकास का समान और पर्याप्त अवसर मिले, पर नक्सली हिंसा को स्वीकार नहीं कर सकता। कोबाड़ गांधी भी यही कह रहे हैं। पुरस्कार देकर वापस लेने के इस विवाद की जहां तक बात है तो इसके कुछ अहम पहलू हैं जिनका जिक्र करना जरूरी है-

महाराष्ट्र की शानदार परंपरा
साहित्य और संस्कृति के संदर्भ में महाराष्ट्र की शानदार परंपरा रही है। साहित्य और साहित्यकार को यहां विशेष सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। महाराष्ट्र में साहित्य सम्मेलनों में राजनेता मंच पर नहीं, श्रोताओं के बीच बैठते या बैठाए जाते हैं। सिर्फ सत्ता में होने के कारण उन्हें यह अधिकार नहीं मिल जाता कि वे साहित्य और साहित्यकार के बारे में फरमान जारी कर सकें। दूसरे, साहित्यिक विधाओं के लिए सरकार जो पुरस्कार देती है, उसका मतलब किसी को उपकृत किया जाना नहीं है। ये पुरस्कार विशेषज्ञ समितियों के माध्यम से दिए जाते हैं। फ्रैक्चर्ड फ्रीडम के मराठी अनुवाद को एक विशेषज्ञ समिति ने पुरस्कार के योग्य पाया था। पुरस्कार की घोषणा अवश्य सरकार ने की, पर मात्र इससे पुरस्कार सरकार विशेष का अथवा सरकार में बैठे राजनीतिक दल का नहीं हो जाता। महाराष्ट्र सरकार को अपने निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए। जनतांत्रिक मूल्यों का तकाजा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा हो और रचनाकार को आदर सहित पुरस्कृत किया जाए।

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