सुसंस्कृति परिहार
डीयू की इस घटना की ख़बर मिलते ही जिस तरह से NHRC ने तुरंत संज्ञान लिया ,पुलिस सक्रिय हुई है वह इस बात का प्रमाण है कि एक जाति विशेष के लिए इतनी जल्दी कार्य वाही क्योंकर शुरू हुई? एक दृष्टि से यह खबर अच्छी लगती है। काश!सभी निष्पक्ष मीडिया कर्मियों को भी तुरंत ऐसी कार्रवाई की उम्मीद मिल पाती।
बहरहाल, आजकल आंदोलनों से जिस तरह लोग बेबाकी से जुड़ते चले जा रहे हैं।यह गोदी मीडिया के लिए आगे भयावह स्थिति ला सकते हैं क्योंकि अब तक 90फीसदी मीडिया ने इस सरकार की नाकामियों को जिस तरह छुपाकर तारीफों की बरसात की है।उसकी पोल पट्टी निरंतर खुलती जा रही है।जो सोशल मीडिया से जुड़े पत्रकार लगातार दिखा रहे हैं।
रुचि तिवारी दिल्ली विश्वविद्यालय के UGC Regulation के समर्थन में चल रहे SC/ST/OBC के आंदोलन में घुसकर जिस तरह के अनुचित सवाल दागती हैं जिससे यह समझने में देर नहीं लगती कि वे आंदोलन की रीति नीति से ज्यादा आंदोलन की आलोचनाओं का सहारा ले रही हैं जिसका विरोध वहां के छात्र छात्राएं करते हैं तो वे बदतमीजी पर उतर आती हैं और एक दलित छात्रा को गिराकर बाल खींचती हैं।मारपीट करने लगती है। जिससे माहौल हंगामेदार हो जाता है। वे जातिवादी होने का वितंडावाद खड़ा करती हैं और यहां से भागकर समीपवर्ती थाने में डीयू के छात्रों पर जुल्म ज़्यादतियों के आरोप लगा देती है।जान को खतरे का भी इल्ज़ाम लगाती हैं।थाने में जब दूसरा पक्ष रिपोर्ट दर्ज कराने पहुंचता है तब एबीवीपी के छात्र आईसा की छात्राओं के साथ जिस तरह की हरकतें पुलिस थाने में करते हैं उसके वायरल वीडियो को क्या पुलिस देखेगी।
धन्य है ऐसी महिला पत्रकार जो छात्रों की पीड़ा को ना समझते हुए उन्हें सरकारी पाठ पढ़ाने जाती हैं। उन्हें यह समझ लेना चाहिए अब गोदी मीडिया ही सरकार के दिन भी पूरे होने वाले हैं।कितने दिन इस तरह की पत्रकारिता चलेगी।
इसी तरह की एक महिला को याद कीजिए जिसने जेएनयू में धुसकर मारपीट की थी नाम था कोमल शर्मा…वह भी एबीवीपी से थीं और जेएनयू को बदनाम करने की कोशिश की थी।
हाल ही यौन अपराधी एपस्टीन के बचाव में उतरी एनडीटीवी की एंकर पद्मजा जोशी को ही देख लीजिए। सरकार की चापलूसी ऐसे मुद्दे पर हो रही है जिसकी ख़बरें दिल दहला रही हैं।
ऐसे अनेकों उदाहरण आज सामने आ रहे हैं।जो बहुत दुखद है। सोचिए हमारा समाज किस तरह पतनशील होता जा रहा है।
अभी भी वक्त है बिकाऊ होने की जगह ज़रा दिल की आवाज़ भी सुन ली जाए। पीड़ितों का साथ दें। महिलाओं का हृदय कहा जाता है बहुत उदार होता है उनसे ऐसी बेरुखी की अपेक्षा नहीं की जा सकती है।यदि यह होता रहता है तो यह पतन की पराकाष्ठा होगी।
फिलहाल रुचि तिवारी जी के साथ हुई बदसलूकी का मलाल ज़रुर है।उनकी प्रतिष्ठा का सवाल है। सरकार पुलिस सब उनकी है लेकिन इस तरह का सवाल बनाना पत्रकार का काम नहीं है।वह दिन दूर नहीं जब चापलूस मीडिया का भंडा भी फूटेगा? कौन कितने में बिका वगैरह वगैरह।

