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धार्मिक उपदेशों से नैतिकता क्यों नहीं बढ़ती

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*रजनीश भारती

हमने अनुभव किया कि कुछ अपवादों को छोड़ कर नास्तिक लोगों में नैतिकता अधिक होती है।

 मगर जन धारणा हमारे इस अनुभव के विपरीत है। लोगों की  ऐसी धारणा बना दी गई है कि नास्तिक लोग नैतिक नहीं होते तथा साधू संतों के सत्संग से नैतिक मूल्य, मानवीय मूल्य, ईमानदारी, दयानतदारी बढ़ती है और भ्रष्टाचार में कमी आती है।

मगर आँकड़े इस जनधारणा के उलट हैं-

आज के 40-50 साल पहले बहुत कम सत्संग होता था। फिर भी लोगों में नैतिकता ज्यादा थी।

देहात में तो कहीं चार-छ: महीने में एकाध बार सुना जाता था कि फलां जगह सत्संग है तो वहाँ जाने पर अक्सर देखा जाता था कि एकाध दर्जन साधू होते हैं भजन गाते हैं, फिर खाना खाते हैं। फिर आपस में बात-चीत होती थी, तो बात- चीत में कुछ चमत्कारिक किस्से-कहानियां और कुछ ऐसे प्रश्न होते थे जैसे- रावण की नानी का क्या नाम था? कौशल्या के पिता का क्या नाम था? परशुराम के पिता का क्या नाम था?…….. यही सत्संग था। रहे होंगे कुछ बड़े प्रवचन कर्ता उस वक्त भी, मगर गांव देहात में तो ऐसा ही था। सत्संग बहुत कम होता था लेकिन उस समय लोगों में नैतिकता का ग्राफ आज के मुकाबले ऊँचा था जब कि आज सत्संग बहुत बढ़ गया है, मगर नैतिकता?

आज हमारे देश में 20 करोड़ टेलीविजन हैं, अमूमन हर एक टेलीविजन को 4-6 लोग देखते हैं। हम 5 ही का अनुपात मान लें तो 20 करोड़ टेलीविजन को देखने वाले कम से कम 100 करोड़ लोग होंगे। ज्यादातर लोग आस्था चैनलों से जुड़े हैं जिसमें लगातार एक से एक प्रकाण्ड विद्वानों/महान संतों का प्रवचन आता रहता है। इस तरह 100 करोड़ लोग टेलीविजन व मोबाइल आदि के माध्यम से रोज सत्संग करते हैं। इतने बड़े पैमाने पर सत्संग तो पूरे इतिहास में कभी भी नहीं होता था मगर इतिहास में कभी इतने भ्रष्ट और अनैतिक लोग नहीं थे, जितना आज हैं।

 तब सवाल उठता है कि जब सत्संग कम होते थे तो समाज में नैतिकता और मानवता ज्यादा थी भ्रष्टाचार कम था मगर जब सत्संग बढ़ गया तो नैतिकता और मानवता घट गयी और भ्रष्टाचार बढ़ गया। ऐसा क्यों?

यदि संत्संग से नैतिकता और मानवता बढ़ती है तो आज नैतिक व मानवीय मूल्य ज्यादा होना चाहिए, मगर ऐसा नहीं है। सत्संग प्रवचन करने वाले बड़े-बड़े महन्त खुद भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं और उनमें से जिनका पोल खुल गया वे जेलों में हैं। बाहर वही हैं जिनका पोल नहीं खुला है। इससे सिद्ध होता है कि सत्संग से भ्रष्टाचार को नहीं रोका जा सकता। 

कुछ लोग कहते हैं, उपदेशक का आचरण सही नहीं तो उपदेश प्रभाव नहीं डाल पाता। मगर हम कहते हैं अगर दवा सटीक है तो डाक्टर कितना भी धूर्त हो, दवा तो अपना काम करेगी ही। कमी सिर्फ डाक्टर में नहीं, दवा में भी कमी है। तभी तो दवा ज्यों-ज्यों दिए मर्ज त्यों-त्यों बढ़ता गया।

तो फिर इंसान बदलता कैसे है?

दूसरा उदाहरण यह है कि हम साधारण ट्रेनों में सफर करते समय यह देखते हैं कि अधिकांश लोग ट्रेन में गंदगी फैलाते हुए जाते हैं। फर्श पर कहीं मूंगफली का छिलका गिरा देते हैं तो कहीं गुटखा खाकर थूक देते हैं, कहीं दोना फेंक देते हैं तो कहीं कागज की पुड़िया फेंक देते हैं, शौचालय की दुर्दशा तो वर्णन करने लायक नहीं होती।  फिर हम देखते हैं कि वही यात्री जब शहर पहुँच जाते हैं और अपने-अपने कल-कारखानों या दुकानों में काम करने के लिए मैट्रो ट्रेन में जाते हैं। तो मैट्रो की फर्श पर कहीं मूंगफली का ना छिलका गिराते हैं न तो कहीं गुटखा खाकर थूकते हैं, न कहीं दोना फेंकते हैं और न तो कहीं कागज की पुड़िया फेंकते हैं। बिना किसी सत्संग प्रवचन के सारे लोग गन्दगी फैलाना बन्द कर दिए। 

यात्री तो वही हैं मगर मेट्रो में जाते ही उन यात्रियों में यह बदलाव कैसे हुआ? न कोई सत्संग, न प्रवचन, न उपदेश… कैसे लोग एकाएक बदल गए। दरअसल साधारण ट्रैनों के मुकाबले मेट्रो की व्यवस्था अलग है। यानी ट्रेन की व्यवस्था बदल गयी तो यात्रियों का व्यवहार भी बदल गया। इससे हमें सीख मिलती है कि पूरे देश की व्यवस्था बदल कर आप इंसान को बदल सकते हैं। इसका मतलब अगर हम किसी तरह के शोषण के शिकार हैं तो शोषण वाली व्यवस्था को बदल कर ही उस शोषण से मुक्ति पा सकते हैं। अगर पूंजीवाद या सामन्तवाद की बुराइयों के कारण इंसान बद से बद तर होता जा रहा है तो समाजवादी व्यवस्था कायम कर देने से ही वह बेहतर इंसान बन सकता है। 

अत: अंधविस्वासियों का यह दावा कि “हम बदलेंगे, युग बदलेगा”  एकदम गलत है। युग की व्यवस्था बदलने से ही हम बदलते हैं, बेहतर इंसान बेहतर व्यवस्था में ही पैदा होते हैं। जहाँ निजी सम्पत्ति के लिए गलाकाट प्रतिस्पर्धा चल रही हो, वहाँ नैतिकता, मानवता, सद्भाव सिर्फ दिखावा ही हो सकता है। सत्संग वगैरह से दिखावा थोड़ा बढ़ जाता है। ऐसे सत्संगी मनुष्यों को देखा गया है कि मौका पाते ही दिखावा छोड़ कर अपने सत्संगी भाइयों का ही शिकार कर लेते हैं। वास्तव बेहतर व्यवस्था ही बेहतर इन्सान पैदा कर सकती है। मार्क्स ने ठीक ही कहा है- मनुष्य का सामाजिक अस्तित्व ही उसके व्यक्तित्व का निर्धारण करता है।

*रजनीश भारती*

*जनवादी किसान सभा*

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