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मात्र श्रीकृष्ण की पूजा ही क्यों है अर्थपूर्ण ?

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 पुष्पा गुप्ता

    यदि आप शास्त्र ध्यानपूर्वक पढ़ेंगे तो पायेंगे कि श्रीकृष्ण ही वे परम भगवान् हैं जो सभी देवी–देवताओं के स्रोत हैं. उनकी पूजा सभी देवी–देवता करते हैं।

 श्रीकृष्ण भगवद्गीता में बताते हैं : अहमादिर्हि देवानां – मैं ही सभी देवताओं का स्रोत हूॅं। 

अहं सर्वस्य प्रभवो – मेरे से ही सबकुछ आता है।

श्रीकृष्ण मूल परम पुरुषोत्तम भगवान् हैं और विष्णु जी उनके विस्तार हैं. ब्रह्माजी का जन्म गर्भोदकक्षायी विष्णु की नाभि से प्रकट हुए कमल पर होता है और अन्य सभी देवताओं की उत्पत्ति ब्रह्माजी से होती है। 

      ~अथर्ववेद (1.2.4)

*यो ब्रह्मनं विदधति पूर्वं यो वै, वेदांश्च गपयति स्म कृष्णः*

   श्रीकृष्ण ही हैं जिन्होंने प्रारम्भ में ब्रह्माजी को वैदिक ज्ञान दिया था।

    नारायण उपनिषद कहता है :

      *नारायणाद् ब्रह्मा जायते, नारायणाद् प्रजापतिः प्रजायते, नारायणाद् इन्द्रो जायते, नारायणाद् अष्टो वसवो जयन्ते, नारायणाद् एकादश रुद्र जयन्ते, नारायणाद् द्वादशादित्यःI*

       नारायण से ही ब्रह्माजी का जन्म हुआ. नारायण से सभी प्रजापति उत्पन्न हुए। नारायण से इन्द्र का जन्म हुआ. नारायण से आठ वसु उत्पन्न हुए. नारायण से ग्यारह रुद्र पैदा हुए. नारायण से बारह आदित्यों का जन्म हुआ।

ब्रह्मा स्वयं कहते हैं :

      ईश्वरः परम कृष्ण सच्चिदानंद विग्रहः, अनादिः अादि गोविंद सर्व कारण कारणम्।

     भगवान् कृष्ण ही परम नियन्ता हैं और वे सभी के मूल स्रोत एवं सभी कारणो के कारण हैं।

    जो व्यक्ति परम भगवान् और देवताओं को एक ही स्तर पर मानता है उसे शास्त्र पाखण्डी कहते हैं।

ऋगवेद (१.२२.२०) कहता है :

   ॐ तद् विष्णुं परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः – भगवान् विष्णु के चरण कमल सभी देवताओं के लिए परम वंदनीय हैं। शास्त्रों में और भी अनेक श्लोक हैं जिनका अध्ययन करने पर यह प्रमाणित हो जाता है कि श्रीकृष्ण या नारायण या विष्णु ही परम भगवान् हैं। बाकी सभी उनके अाधिपत्य में हैं।  श्रीकृष्ण सरकार में उन राजा या प्रधानमंत्री के समान हैं जिनकी आज्ञानुसार सभी मंत्री अनेक सेवाओं में सेवारत रहते हैं।

      यह भी सर्वविदित है कि जब भी ब्रह्माण में रावण, हिरण्यकाशिपु, कंस इत्यादि जैसे असुरों द्वारा आपदाएं आती हैं तो सभी देवता ब्रह्माजी के नेतृत्व में भगवान् विष्णु की ही शरण लेते हैं।

    यदि हम पेड़ की जड़ में पानी डालेंगे तो क्या हमें कुछ और करने की आवश्यकता है? यदि मूलतः कृष्ण किसी भी पात्र व्यक्ति की कोई भी अर्थपूर्ण इच्छा पूर्ण करने में सक्षम हैं तो हम उनकी शरण न लेकर देवताओं की शरण क्यों लें.

     श्रीकृष्ण उन प्रेमी पिता के समान हैं जो अपने भक्तों को वो ही प्रदान करते है जो उनकी आध्यात्मिक प्रगति के लिए अच्छा है अर्थात् जो उनके लिए आवश्यक है न कि जो वह चाहता है।

     सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देवता जीव को मुक्ति प्रदान नहीं कर सकते. उनके पास इस ब्रह्माण्ड में केवल सीमित आधिपत्य है। उनकी स्थिति कम्पनी के उस मैनेजर के समान है जिसके पास केवल उसके विभाग का नियन्त्रण है।

      हिरण्यकाशिपु ने अमरत्व प्राप्त करने के लिए ब्रह्माजी को प्रसन्न करने हेतु हजारों–लाखों वर्षों तक कठोर तपस्या की। ब्रह्माजी ने प्रकट होकर कहा, मैं स्वयं ही अमर नहीं हूॅं तो तुम्हें कैसे अमरत्व का वरदान दे सकता हूॅं. मुक्ति प्रदान कर शाश्वत् आध्यात्मिक सुख तो श्रीकृष्ण ही प्रदान कर सकते हैं.

     श्वेताश्वर उपनिषद् (३.८) कहता है :

    *तं एव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पंथाः विद्यते अयन्य.*

      केवल उन परम भगवान् को जानने के पश्चात् ही कोई मृत्यु को पार कर दिव्यता को प्राप्त कर सकता है, और कोई अन्य उपाय नहीं है।

  शिवजी भी श्रीकृष्ण की विशेष स्थिति की पुष्टि करते हैं : 

    *मुक्ति प्रदाता सर्वेषां कृष्णरेव न संशयःI* (चेतना विकास मिशन).

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