वाचस्पति शर्मा
सबसे मुश्किल समय में प्रतिकूल परिस्तिथियों में निकला व्यंग्य किसी भी समाज की सबसे बड़ी ताकत को ज़ाहिर करता है.लोग हिटलर पर उस समय भी चुटकुले बनाते थे जब वो उसकी आलोचना करना तक किसी की मृत्युदंड का आधार बन जाता था। उस समय भी उसपर स्किट , नुक्कड़ नाटक और व्यंग लिखे जाते थे जब वो लाखो लोगो को डेथ कैम्प में भेज रहा था। जिनमे सिर्फ यहूदी ही नहीं खुद उसके जर्मन रेस वैचारिक विरोधी , शिक्षाविद , वकील , बुद्धिजीवी भी थे.
पोलैंड , बेलारूस आदि देशों में नात्सी कब्ज़े के दौरान तमाम जनता अपने गाँव छोड़कर घने जंगलों में महीनों महीनों तक छिपी रही। उन्होंने घने जंगलों में अपनी बस्तियां बनायीं और फ्रीजिंग ठण्ड और तमाम मुश्किलात में जंगलो में रहे। इनमे कई यहूदी लोग बहुत अच्छे पढ़े लिखे, नौकरीपेशा और व्यवसायी थे। इतनी परेशानियों के बावजूद वो जंगलों में हिटलर के ऊपर व्यंग्य बनाते थे , उस पर कटाक्ष करती कवितायें और कहानिया लिखतें थे, और नाटक खेलते थे ।
चार्ली चैप्लिन ने ” दा ग्रेट डिक्टेटर” फिल्म तब बनायी थी जब हिटलर और मुसोलिनी अपने चरम पर थे , और फिल्म में दोनों को इतना बड़ा मसखरा दिखाया गया था की आप हँसतें हँसतें पागल हो जाओगे। चार्ली ने ही अपनी फिल्म मॉडर्न टाइम्स में जर्मन के आधौगिक क्रान्ति के समय पूंजीवादी शोषण का जबरदस्त मज़ाक उड़ाया था। ( याद कीजिये – मॉडर्न टाइम फिल्म में चार्ली चैप्लिन का मैकेनिकल अस्सेम्ब्ली लाइन पर खाना खिलाने वाली मशीन का परीक्षण )भगत सिंह और साथियों के लेख आप पढ़ें तो पता चलेगा की वो लोग हमेशा मस्ती मज़ाक करते रहतें थे , एक दूसरे को चिढ़ाते रहतें थे.फांसी के तख्ते की और जाते उनकी मुस्कुराहटें ब्रिटिश साम्रज्य्वाद के मुंह पर तमाचा थीं , की तुम हमें मौत से भी नहीं डरा सकतें। कोन्ग्रेस्स के प्राइम टाइम में कृष्ण चन्दर ने ” एक गधे की आत्मकथा” किताब लिखी , जिसमे कोंग्रेसी नेताओं को भिगो भिगो के व्यंगातमक चोटें मारी गयी थी। परसाईं ने तो किसी को नहीं छोड़ा , उन्होंने तो अटल बिहारी बाजपेयी जी के प्रधानमन्त्री बनने की महत्वाकांक्षा को चालीस साल पहले ही पकड़ लिया था। और एक व्यंग में उन्होंने लिखा की ये आदमी शीशे के सामने प्रैक्टिस करता है की प्रधानमंत्री बनने के बाद ये विदेशी राजनयिकों से कैसे हैंडशेक करेगा। आदि आदि। समय बदला , व्यंगात्मक अभिव्यक्ति के साधन बदलें , लेकिन व्यंग्य के मूल में भावना वही है , सन्देश वही पुराना है – की “हम तुमसे नहीं डरेंगे”. जब अनुराग कश्यप नोटबंदी पर “चोक ” फिल्म बनातें हैं, जब संजय मिश्र ” बहुत हुआ सम्मान में कॉमेडी करतें हैं ” जब सम्पत सरल तमाशेबाज राजा सुनाते हैं , जब श्याम रंगीला ,वरुण ग्रोवर , रजत कपूर , राजीव निगम और कामरा अपने वीडियो निकालतें हैं। जब Vikas H. Sood भाई फ़र्ज़ी राष्ट्रवादी वीडियो लगतें हैं , जब Manish Singh Reborn , Hemant Malviya , अपूर्व भारद्वाज व्यंग्य लिखतें हैं, तो उन व्यंग के एक सामान्य व्यंग्य से बहुत आगे जाकर गूढ़ अर्थ होतें हैं। वो एक व्यंगात्मक अभिव्यक्ति के साथ साथ अधिसंख्य जनता की कुन्द हो चुकी तर्कशक्ति को चुनौती देतें हैं। वो भक्तों के अंदर भरी कुंठा को एक्सपोज करतें हैं। मुश्किल परिस्तिथियों में व्यंग किसी भी समाज की जागरूकता और उसकी सामाजिक चेतना को व्यक्त करता है। सकारात्मक मस्तिष्क की मसल पावर को बढ़ाता है।इसके साथ साथ सबसे बड़ा सन्देश ये फासिस्ट नेताओं के समर्थकों के मुंह पर एक तमाचा मारता है की तुम्हे और तुम्हारे आकाओं को हम एक हंसी खेल खिलद्दड़ से ज्यादा कुछ नहीं समझते।और साथ साथ ये आपके समाजिक विज्ञान की समझ को भी प्रेक्षित करता है की आप वर्तमान निज़ाम के परिवर्तित होने के बारे में पूरी तरह से निश्चिंत हैं।
बस… आपकी यही, बेबाकी यही सकारत्मकता भक्तों को और उनके आकाओं को अंदर तक कचोटती है। इसे मुक़र्रर रखना है साथियों।
व्यंग्य क्यों ज़रूरी है ??

