शशिकांत गुप्ते
आज सीतारामजी मुझे बहुत ही अलहदा अंदाज में दिखाई दिए।
सीतारामजी आज मुझसे मिलते ही संत कबीर साहब का यह दोहा सुनाने लगे।
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय
जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय
मैने सीतारामजी से पूछा आज उक्त दोहे को स्मरण करने की कोई खास वजह है?
सीतारामजी ने मेरे सवाल को नजर अंदाज कर कबीर साहब का दूसरा दोहा सुना दिया।
कबीरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर
जो पर पीर न जानही, सो का पीर में पीर
(पीर का मतलब पूज्य व्यक्ति)
यह दोहा सुनकर मैं कुछ कहता,उससे पहले सीतारामजी ने मुझे संत नरसिंह मेहता रचित भजन की निम्न पंक्तियां सुना दी।
वैष्णव जन तो तेने रे कहिए जे पीड़ पराई जाणे रे
पर दु:खे उपकार करे तोये, मन अभिमान ना आणे रे
मै समझ गया आज सीतारामजी पूर्ण रूप से व्यंग्यकार की मानसिकता में है।
मैने सीतारामजी से पूछने की कोशिश की आज ऐसा क्या हो गया,कौनसा मुद्दा मिल गया व्यंग्य करने के लिए?
सीतारामजी ने मुझसे कहा इन दिनों नीति और नियत पर बहस होनी चाहिए।
नीति बहुत ही लोक लुभावन बनाई जा रही है।
नीति का बखान विज्ञापनों में दर्शाया जा रहा है। लेकिन नीति पर अमल करने के लिए नियत संदेहास्पद है।
मैने कहा सीतारामजी मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है। आज आप क्या कुछ कह रहें हैं?
सीतारामजी ने मुझसे गुस्से में कहा,आप मुझ पर अविश्वास कर रहे हो?
मैने कहा मैरी क्या औकात मैं आप पर अविश्वास करूं।
सीतारामजी थोड़ा शांत हो कर कहने लगे,असहमति तो लोकतंत्र की बुनियाद है।
आप मुझ पर अविश्वास कर सकते हो,आपको पूरा अधिकार है।
सीतारामजी ने अपनी बात को जारी रखते हुए कहा,मै इस देश का एक समझदार,ईमानदार,
जवाबदार और,जागरूक
नागरिक हूं।
आप जिस मुद्दे पर मेरा अविश्वास करोगे मैं,उसी मुद्दे पर ही बोलूंगा।
यदि मैं जवाब देने में असमर्थ हुआ तो,मैं आपसे क्षमा भी मांग लूंगा। मैं जानता हूं क्षमा वीरस्य भूषणम्
मै अपनी जवाबदेही से भागूंगा नहीं,ना ही मैं मुद्दे से भटकूंगा,ना ही आपको भटकाऊंगा।
इसीलिए मैंने शुरुआत में ही संत कबीर साहब के दोहे को उद्धृत किया है।
बुरा जो देखन ….?
मैने कहा मैं आपके सम्पूर्ण कथन को अच्छे से समझ गया हूं,और मै आपकी व्यंग्य लिखने शैली से भलीभांति परिचित हूं।
आपको प्रणाम करते हुए आज की वार्ता को यहीं विराम देता हूं।
शशिकांत गुप्ते इंदौर

