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सांसद विधायक की पेंशन क्यों खटकती है  ?

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गोपाल राठी,पिपरिया 

जब से सरकार ने कर्मचारियों की पुरानी पेंशन बन्द कर दी तब से सबको सांसदों विधायकों की पेंशन बार बार याद आ जाती है l जब से सरकार ने स्थायी नौकरियां बन्द करके तदर्थ नौकरी की स्कीम निकाली तब से विधायक सांसदों को मिलने वाली पेंशन सबको चुभने लगी है l

सांसदों , विधायकों और जनप्रतिनिधियों को पेंशन का प्रावधान जब किया गया था तब राजनीति धंधा नहीं एक मिशन था l राजनीति में मिशनरी भाव से जुड़े व्यक्ति का कोई धंधा रोज़गार नहीं होता था l सेवा और संघर्ष से जुड़े ऐसे व्यक्तियों के लिए पेंशन व यात्रा की सुविधा देने के पीछे उद्देश्य यह रहा कि वे शेष जीवन भी इसी तरह कार्य करते रहें l उन्हें जीवन के उत्तरार्ध में नौकरी न खोजनी पड़े l 

डॉ. लोहिया का लोकसभा सदस्य बनने के पहले कोई स्थायी ठिकाना नहीं रहा l सांसद बनने के बाद उन्हें जो आवास आवंटित हुआ वो ही उनका स्थाई पता बना l उनका न कोई व्यवसाय था और न कोई निजी संपत्ति और न बैक एकाउंट l अटलबिहारी वाजपेयी जैसे जीवनदानी ने भी वर्षों संसद को जीवंत बनाये रखा l उन्होंने ज़िंदगी में कोई व्यवसाय नहीं किया l वे पूर्णकालिक राजनैतिक कार्यकर्ता थे l होशंगाबाद नरसिंहपुर क्षेत्र के सासंद रहे हरिविष्णु कामथ की भी अपनी कोई न निजी संपत्ति थी और न ठिकाना l वे जनता के पैसे से चुनाव लड़ते थे और लोकसभा में जनता की पैरवी करते थे l जवाहरलाल नेहरू ने अपनी पैतृक संपत्ति और आनंद भवन जैसा भव्य मकान राष्ट्र को समर्पित कर दिया था l उनकी आय का स्रोत उनकी किताबों की रॉयल्टी और सांसद का मिलने वाला मानदेय था l जवाहर लाल नेहरू के पिता मोतीलाल जी बड़े वकील थे उन्होंने वकालत से खूब पैसा कमाया लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने तो कभी वकालत  नहीं की l इसी संसद में मधु लिमये जैसे तेजस्वी सांसद थे वे स्वतंत्रता संग्राम सैनिक को मिलने वाली कोई पेंशन नहीं लेते थे जबकि वे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के जुझारू सैनानी थे l 1962 – 1967 में  संबलपुर ओडिसा से लोकसभा सदस्य  रहे किशन पटनायक उस समय सबसे कम उम्र के सांसद थे l सांसद से निवृत होने के बाद उन्होंने सांसद को मिलने वाली पेंशन और किसी अन्य सुविधा का लाभ नहीं लिया l उनकी पत्नी सरकारी स्कूल में टीचर थी उनके वेतन और दोस्तो से मिले आर्थिक सहयोग से उनका शेष जीवन चला l मित्रों के आग्रह पर उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दिनों में रेल यात्रा की सुविधा का लाभ लेना स्वीकार किया l क्योंकि उन्हें राजनैतिक उद्देश्य से बहुत यात्रा करनी पड़ती थी l उन्हें कई बार ट्रेन में आरक्षण नही मिल पाता था l किशन पटनायक कई बार पिपरिया आये वे रेल की साधारण बोगी ने सामान्य नागरिक की तरह यात्रा करते थे l कम्युनिस्ट पार्टियों के सांसदों का जीवन बेहद सादगीपूर्ण होता था वे अपना मानदेय भी पार्टी फंड में जमा करते थे जहां से उन्हें जीवन निर्वाह के लिए एक निश्चित राशि दी जाती थी l सांसद विधायक को पूर्णकालिक राजनैतिक कार्यकर्ता मानकर उनका मानदेय निर्धारित किया जाता ताकि उनके सामने आजीविका का संकट खड़ा न हो l यह पेंशन उनके राजनैतिक कर्म के प्रति राज्य का सम्मान है l राजनीति में सादगी  त्याग और तपस्या समय के साथ खत्म हो गई l अब तो सांसद विधायक करोड़ो के आसामी है l इसलिए उन्हें दी जा रही पेंशन सबको खटक रही है l

पहली दूसरी लोकसभा में ऐसे बहुत से लोग थे जिनका कोई कामधंधा या व्यवसाय नहीं था l वे पूरी तरह राजनैतिक कार्यकर्ता थे ll उस समय तक राजनीति पैसा बनाने का जरिया भी नहीं था l भ्र्ष्टाचार तो था लेकिन वहः अदृश्य था l उसमें नेताओं की लिप्तता दिखाई नहीं देती थी l धीरे धीरे राजनीति में पुराने राजे महाराजओं की संख्या बढ़ती गई l पूँजीपतियों ने भी राजनीति में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप शुरू कर दिया l इन सबने मिलकर चुनावों को इतना महंगा कर दिया कि अब कोई साधारण व्यक्ति चुनाव लड़ने की कल्पना ही नहीं कर सकता l सारे कार्पोरेट्स राजनैतिक दलों को चंदा देते है और सरकारें उनके हित मे कानून बनाती है l बिंना पैसे के राजनैतिक कार्य की अब कोई संभावना नहीं रही l ग्वालियर की राजमाता तो अपने निजी हैलीकॉप्टर से चुनाव प्रचार करती थी l वे संसाधनों के मामले में सत्ताधारी कांग्रेस से होड़ करती थी l

वर्तमान में मुख्यधारा के राजनैतिक दलों के सांसद और विधायक अपने पद पर रहते हुए इतना पैसा कमा लेते है इतनी संपत्ति जुटा लेते है कि उनके लिए पेंशन का कोई विशेष महत्व नहीं होता l नेताओं को मिलने वाली पेंशन में सबसे बड़ी विसंगति जो सामने आई वहः यह है कि वे विधायक  सांसद (लोकसभा ) सांसद (राज्यसभा) और लोकतंत्र सेनानी ( मीसाबंदी) की चार चार पेंशन एक साथ ले रहे है l जो लाखों में होती है l एक व्यक्ति को एक साथ मिलने वाली चार चार पेंशन एक मज़ाक है l जिसमें भाजपा कांग्रेस सभी शामिल है l पेंशनधारक जनप्रतिनिधियों को एक पेंशन छोड़कर शेष पेंशन स्वेच्छा से सरेंडर कर देना चाहिए l पंजाब की सरकार ने तो कानून बना दिया है l

कर्मचारियों की पेंशन सामाजिक सुरक्षा की एक गारंटी थी l जिससे सरकार मुकर चुकी है l सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण से साफ हो गया है कि अब सरकार की प्राथमिकताएं बदल गई है l कल्याणकारी सरकार होने का मुखोटा उतर चुका है l सरकार की कार्पोरेट्स परस्ती साफ साफ दिखाई दे रही है l पेंशन कोई अहसान नहीं बल्कि सरकार का सामाजिक दायित्व है जिसे निभाने में  सरकारें नाकाम रही है l संघर्ष इसी मुद्दे पर होना चाहिए  l 

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