अग्नि आलोक

हासिल कर पाएंगे अपेक्षित भाषायी स्वतंत्रता?

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वृषभ प्रसाद जैन
आजादी के अमृत महोत्सव की सार्थकता प्रमुख रूप सेतीन प्रश्नों परआधारित है – पहला, हम कितने स्वतंत्र हुए हैं? दूसरा, हम कितने स्वतंत्र नहीं हो पाए हैं? और तीसरा, हम जितने स्वतंत्र नहीं हो पाए हैं, वह स्वतंत्रता हम कैसे हासिल कर पाएं? हमने राजनीतिक स्वतंत्रता को तो 15 अगस्त 1947 से प्राप्त करना प्रारंभ कर लिया और 26 जनवरी 1950 को भारत के संविधान को बनाकर गणतंत्रात्मक रूप में कुछ अंशों में पूरा कर लिया। उसके बाद विभिन्न अधिनियम, परिनियम, अध्यादेश, विनियम और नियम बनाकर तथा तदनुसार विभिन्न संस्थाओं का सृजन कर निरंतर करते चले आ रहे हैं। यह सब हमारी राजनीतिक स्वतंत्रता की ओर बढऩे का क्रम रहा है जो निरंतर जारी है। इस बीच में भी हमने अपने कुछ अधिनियम परिनियम बिना काम के भी बनाए, यानी दूसरों के दबाव में या दूसरों की नकल करके।

हमने राजनीतिक स्वतंत्रता के अतिरिक्त तीन प्रमुख लक्ष्य और रखे थे — भाषायी स्वतंत्रता, शैक्षिक स्वतंत्रता और आर्थिक स्वतंत्रता। भाषायी दृष्टि से देखें, तो स्पष्ट है कि हम परतंत्र स्वतंत्रता से पहले थे ही नहीं, बल्कि निरंतर हो रहे हैं और यह क्रम लगातार जारी भी है। यह प्रश्न भी मन में उठने लगा है कि यह क्रम कभी रुकेगा या नहीं? क्योंकि स्वतंत्रता के पहले अंग्रेजी का प्रयोग अधिक था ही नहीं, बल्कि स्वतंत्रता के बाद निरंतर बढ़ता जा रहा है। हमने वे तथ्य भी आम जनता को बताए नहीं, जिनके आधार पर वह यह समझ पाती कि बच्चों को अपनी भाषाओं में पढ़ाने में ही उनका हित है, हमारा हित है और राष्ट्र का भी हित है। यह जन-जागरण का काम नहीं हुआ। भाषायी स्वतंत्रता ही हमारी वास्तविक स्वतंत्रता है, क्योंकि उसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो निहित है ही समस्या को ठीक तरह से समझने की स्वतंत्रता और स्वायत्तता भी है और समस्या के ठीक समाधान निकालने की स्वतंत्रता भी। सरकार में एक बड़े उच्च पद पर बैठे हमारे एक मित्र ने अभी कुछ दिनों पहले प्रश्न किया कि अमरीका में या वहां के किसी संस्थान में विकसित उत्पाद 6 माह के भीतर पूरे विश्व में बिकने लगता है, यह काम हमारे विश्वविद्यालय, आइआइटी और आइआइएम क्यों नहीं कर पाते? कारण यह है कि हमारे शैक्षिक तंत्र में जिन अच्छे बच्चों ने जो तथाकथित अच्छी शिक्षा अच्छे संस्थानों से हासिल की है, वह तो अंग्रेजी में हासिल की है, इससे वे अच्छे वेतन पर विदेशों में जाकर तो स्थापित हो सकते हैं और विदेशी कंपनियों में ही काम कर वे हमारे लिए भी उत्पाद दे सकते हैं और परिणामस्वरूप विदेशी कंपनियों को ही आर्थिक रूप में और अधिक समृद्ध कर सकते हैं, लेकिन हमें नहीं और हमारे यहां भी नहीं। उन्हें विदेशों की परतंत्रता हमारी स्वतंत्रता से अच्छी लगती है और जब वे एक बार वहां जाकर बस गए, तो फिर हमेशा के लिए वहां के आर्थिक साम्राज्य को समृद्ध करने में तल्लीन हो गए। इस तरह वे अपने देश में टिके नहीं और हमारे यहां जो टिका हुआ तंत्र है, वह समस्या के मूल में गया नहीं कि हमारी समस्याएं और हमारी जरूरतें क्या-क्या हैं? उन समस्याओं और उन जरूरतों का मूल कहां है? जब अपनी समस्याओं और जरूरतों का मूल हमने नहीं समझा तो भला हम उनका समाधान कैसे दे पाते? कुल मिलाकर हमारा शैक्षिक तंत्र हमारी जरूरत के उत्पाद और समाधान नहीं दे पाता। पश्चिम के देश और हमारे समीप का देश चीन भी जब हमारी जरूरतों और समस्याओं के समाधान के उत्पाद देंगे तो जाहिर है उनका आर्थिक तंत्र भी बढ़ेगा और उनकी समृद्धि भी। और हम निरंतर गिरते जाएंगे भी। जो स्वतंत्रता के बाद तेजी से हुआ और हो भी रहा है।

भले हम उत्पादों का वास्तविक उत्पादन अपने देशों की फैक्टरियों में कर रहे हैं, पर उनका बौद्धिक उत्पादन तो विदेशी कंपनियों ने किया है, इसलिए डॉलर मजबूत हुआ है और हो रहा है, क्योंकि रॉयल्टी उनके खाते में जा रही है। अभी-अभी कोरोना काल में जब हमारी कंपनियों ने वैक्सीन बनाई और अनेक देशों में उसका निर्यात हुआ, तो हमारा रुपया मजबूत हुआ था। आजादी से पहले दुनिया का सबसे अच्छा इस्पात, अच्छी मलमल, अच्छे मसाले हम पैदा करते थे, दुनिया के सबसे अच्छे शैक्षिक संस्थान हमारे पास थे, इसलिए हम विश्व-गुरु थे। हम वास्तव में अनुसंधान करते थे, अपनी और विश्व दोनों की जरूरतों को समझते थे और उसके आधार पर अपने उद्योगों व शैक्षिक तंत्र को विकसित करते थे, पर आज हम यह सच नहीं समझ पा रहे हैं और तदनुसार हम कर भी नहीं पा रहे है। आजादी के इस अमृत-महोत्सव के अवसर पर हम यह संकल्प लें कि हम भाषा के स्तर पर स्वतंत्र होकर रहेंगे, भाषा की परतंत्रता से आजादी की ओर कदम रखना आज से ही प्रारंभ करेंगे। तभी हम शैक्षिक और आर्थिक स्वतंत्रता के अपेक्षित स्तर को भी छू पाएंगे। स्वाभाविक है कि इसका आधार सच्चा अनुसंधान ही है। हमारे शैक्षिक तंत्र को इस दिशा में बढ़ना ही चाहिए।

वृषभ प्रसाद जैन,जाने-माने भाषाविद और भारतीय भाषा मंच के राष्ट्रीय संयोजक

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