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क्या नीतीश विपक्ष को एकजुट कर पाएंगे

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राज कुमार सिंह

नीतीश कुमार किस्मत के धनी हैं। 2019 में जब केंद्रीय सत्ता का स्वयंवर था, वह दो साल पहले महागठबंधन छोड़कर NDA में वापस चले गए थे। लेकिन 2024 के सत्ता स्वयंवर से दो साल पहले ही इस बार महागठबंधन में लौट आए। पिछली बार बिना शक वह सत्ता की वरमाला के स्वाभाविक विपक्षी दावेदार बन सकते थे, लेकिन इस बार भी दौड़ से बाहर नहीं हैं। 2019 के जनादेश के बाद कांग्रेस से कुछ क्षेत्रीय दलों की एलर्जी ज्यादा मुखर हुई है। ऐसे में इन तमाम पार्टियों को एक साथ लाना सचमुच एक कठिन चुनौती है।

नीतीश को जिम्मा

नीतीश के लिए अच्छी बात यह है कि एकता के सूत्रधार की भूमिका उन्हें सौंपी गई है। हालांकि यह अकारण नहीं है। विपक्षी खेमे की बात करें तो नीतीश कुमार सबसे अनुभवी मुख्यमंत्री हैं। कभी जंगलराज के लिए बदनाम बिहार में बदलाव के जरिये एक समय नीतीश की छवि सुशासन बाबू की भी बनी। बेशक वह छवि बीजेपी के साथ गठबंधन सरकार चलाते हुए बनी थी, जबकि अब दूसरी बार नीतीश महागठबंधन में उन्हीं लालू यादव के साथ आ गए हैं, जंगलराज के लिए जिनके परिवार को कोसते थे। पर यही तो राजनीति है।

कहना मुश्किल है कि विपक्षी नेताओं के विरुद्ध CBI-ED जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई विपक्षी एकता की कवायद को तेज करती है या फिर इस कवायद से उनकी कार्रवाई रफ्तार पकड़ती है:

कामयाबी मिलेगी?

यह काम आसान नहीं है, लेकिन नीतीश के राजनीतिक अनुभव और छवि के मद्देनजर नामुमकिन भी नहीं माना जा सकता। तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने की जल्दबाजी में RJD तो नीतीश को राष्ट्रीय राजनीति में भेजने के लिए कब से उतावली है:

कठिन है डगर

इन सबके बावजूद एकता की राह सहज नहीं होगी। इन राज्यों में कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के बीच सीटों का बंटवारा खासा मुश्किल होगा। तृणमूल और वाम मोर्चा एक साथ कैसे आ सकते हैं? सवाल ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी का भी है। ये दोनों अकेले दम राज्य में सरकार बनाने में सक्षम हैं। दोनों अभी तक राष्ट्रीय राजनीति में तटस्थ भूमिका निभाते रहे हैं। जगन की YSR कांग्रेस ने तो वक्त-जरूरत राज्यसभा में मोदी सरकार की मदद भी की है। ऐसे में विपक्षी एकता की तस्वीर में सही और पूरे रंग भरने के लिए नीतीश को शरद पवार की जरूरत पड़ सकती है, जिन्हें महाराष्ट्र में गठबंधन सरकार चलाने में ही नहीं, कांग्रेस-शिवसेना जैसे विपरीत ध्रुवों को भी साथ लाने में महारत हासिल है। नेतृत्च का मुद्दा बाद के लिए छोड़ साझा अजेंडा बनाने की सोच निश्चय ही समझदारी का संकेत है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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