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क्या केवल मीठे सियासी बयानों से किसान आंदोलन का समाधान हो जाएगा?

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अभिमनोजः

किसान आंदोलन को लेकर जितने मीठे सरकारी बयान दिए जा रहे हैं, उससे ठीक उलट कड़वी सियासी चालाकियां दिखाई जा रही हैं, इसीलिए बड़ा सवाल है कि- क्या केवल मीठे सियासी बयानों से किसान आंदोलन का समाधान हो जाएगा?किसान आंदोलन को तोड़ने के तमाम प्रयासों के बावजूद आंदोलन जारी है और बढ़ता जा रहा है.

इस आंदोलन को लेकर किसान नेता राकेश टिकैत का कहना है कि देश में भूख पर व्यापार करने की इजाजत नहीं दी जा सकती. प्रधानमंत्री मोदी के ताजा बयानों को लेकर उनका कहना है कि- कृषि उपज पर न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर कानून बनाया जाए और नए कृषि कानूनों को वापस लिया जाए. याद रहे, राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि एमएसपी है, एसएसपी था और एमएसपी रहेगा.

खबरें हैं कि इस पर टिकैत का कहना था- देश में भूख पर व्यापार नहीं होगा. भूख जितनी लगेगी अनाज की कीमत उतनी होगी. देश में भूख का व्यापार करने वालों को बाहर निकाला जाएगा. जिस तरह विमानों के टिकटों की कीमत दिन में तीन से चार बार बदलती है, उस तरीके से फसल की कीमत तय नहीं की जा सकती.

प्रधानमंत्री का कहना था कि एक नया समुदायष् उभरा है जो प्रदर्शनों में लिप्त है. इस पर जवाब देते हुएकरते हुए टिकैत ने कहा, हां, इस बार यह किसान समुदाय है जो उभरा है और लोग किसानों का समर्थन कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि नए कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे किसानों ने यह रेखांकित किया है कि एमएसपी को लेकर कोई कानून नहीं है, जिसकी वजह से व्यवसायी कम कीमतों पर उनकी उपज खरीदकर उन्हें लूटते हैं.

उन्होंने किसानों के जारी आंदोलन को जाति और धर्म के आधार पर बांटने के प्रयासों की भी निंदा की. उन्होंने कहा कि इस अभियान को पहले पंजाब के मुद्दे के रूप में दर्शाया गया, उसके बाद सिख और फिर जाट मुद्दे के रूप में इसे पेश किया गया. इस देश के किसान एकजुट हैं. कोई भी किसान बड़ा या छोटा नहीं है. यह अभियान सभी किसानों का है.जाहिर है, किसान आंदोलन को अब किसी भी सरकारी तरीके से भटकाया नहीं जा सकता है, इसलिए समाधान के लिए सियासी चतुराई की नहीं, किसान हित की ईमानदार कोशिश की जरूरत है!

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