अग्नि आलोक

क्या लोग करेंगे कांग्रेस के संदेश पर भरोसा

Share

उमेश चतुर्वेदी

रायपुर में हुए महाधिवेशन के जरिए कांग्रेस ने कई संदेश दिए। उसने वोटरों का भरोसा हासिल करने की कोशिश के साथ यह मेसेज दिया कि कांग्रेस अकेली पार्टी है, जो पूंजीपतियों की बजाय आम लोगों के सशक्तीकरण पर ज्यादा यकीन करती है। इस तरह से वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बरक्स खुद को कहीं ज्यादा भरोसेमंद साबित करना चाहती है। लेकिन क्या वोटर उसे इतना भरोसेमंद मानेंगे कि वे बीजेपी को नकार सकें? क्या कांग्रेस ने महाधिवेशन में ऐसा कुछ किया है कि वह बीजेपी की नीतियों और नीयत के प्रति जनता में व्यापक पैमाने पर अविश्वास पैदा कर सके?

रायपुर में कांग्रेस अधिवेशन में पूर्व अध्‍यक्ष सोनिया गांधी और अध्‍यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे

परिवारवाद से कितनी दूर

संदेश यह देने की कोशिश हुई कि इन फैसलों के पीछे कांग्रेस के पहले परिवार की कोई भूमिका नहीं है। लेकिन पर्यवेक्षक मानते हैं कि जिस तरह कांग्रेस अध्यक्ष का स्वतंत्र चुनाव और उन्हें बॉस बताना दिखावा था, कांग्रेस कार्यसमिति के लिए संचालन समिति द्वारा लिया गया फैसला भी वैसा ही है।

प्रियंका गांधी का स्‍वागत

25 मार्च को रायपुर पहुंचीं प्रियंका के स्वागत में रायपुर हवाई अड्डे से महाधिवेशन स्थल तक की करीब दो किलोमीटर की सड़क पर गुलाब की पंखुड़ियां बिछाई गईं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की ओर से प्रियंका के लिए ऐसा किया गया। इससे कांग्रेस में पहले परिवार के प्रति चाटुकारिता की पराकाष्ठा का ही संदेश गया।

राहुल गांधी ने कांग्रेस में एक परिवार एक पद का नारा दिया था। उन्होंने गांधी-नेहरू परिवार से बाहर के व्यक्ति को पार्टी नेतृत्व देने पर भी जोर दिया था। परिवार से बाहर का अध्यक्ष तो आ गया, लेकिन क्या कांग्रेस सचमुच प्रथम परिवार के प्रभाव से मुक्त होकर लोकतांत्रिक बन पाई? कांग्रेस संचालन समिति का खरगे को कार्यसमिति बनाने का अधिकार देना भले ही लोकतांत्रिक लगे, लेकिन कांग्रेसजनों को भी पता है कि अगली कार्यसमिति ठीक वैसे ही गांधी-नेहरू परिवार की मर्जी से बनेगी, जैसी बनती रही है। कांग्रेस ने परिवारवाद के आरोप को सतह पर खारिज करने की कोशिश की, लेकिन अधिवेशन में जो हुआ, उससे लोगों में वह विश्वसनीयता नहीं बना पाई। इसका संकेत आम कांग्रेसियों के बयान हैं, जो साबित करते हैं कि रायपुर में जो हुआ, उसके पीछे गांधी-नेहरू परिवार की ही मर्जी थी।

राहुल गांधी और सीएम भूपेश बघेल

सोनिया का संदेश

इस बीच, राहुल गांधी ने इटली के एक अखबार को दिए इंटरव्यू में आरोप लगाया कि मोदी के दबाव में मीडिया उनकी खबरें तक नहीं दिखाता, उनका बयान तक नहीं छापता। इस आरोप की कलई इस महाधिवेशन की हुई धुआंधार मीडिया रिपोर्टिंग ने खोल दी। जिस तरह विशेषकर टीवी पर कार्यक्रम की रिपोर्टिंग हुई, साफ है कि कांग्रेस का महत्व मीडिया की नजर में कम नहीं हुआ है। महाधिवेशन में कांग्रेस ने अपने मिनी घोषणापत्र में कहा कि तीसरे मोर्चे की अवधारणा और गठन, चुनावों में बीजेपी के लिए फायदेमंद साबित होगा। मतलब साफ है कि समूचा विपक्ष उसकी छतरी के नीचे आ खड़ा हो। बिहार के पूर्णिया की रैली में नीतीश कुमार ने इस विचार का एक तरह से समर्थन भी कर दिया। लेकिन अभी शरद पवार, ममता बनर्जी और के चंद्रशेखर राव जैसे नेताओं की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। यानी कांग्रेस की चुनावी छतरी के नीचे आने को लेकर विपक्षी धड़े में अब भी उलझन है।

कांग्रेस के संदेशों पर कांग्रेसजन भरोसा कर सकते हैं, लेकिन महाधिवेशन में जिस तरह पार्टी के पहले परिवार का वर्चस्व एक बार फिर साबित हुआ है, उससे बीजेपी के लिए उस पर परिवारवाद का आरोप लगाने का और मौका मिलेगा। वैचारिक आधार पर भी पार्टी कोई ठोस संदेश नहीं दे पाई। शशि थरूर के भाषण से इसका संकेत भी मिला। ऐसे में कांग्रेस मोदी पर उनकी सादगी के बहाने जब भी तंज कसेगी, लोग उसे विश्वसनीय नहीं मानेंगे। चुनावी मैदान में उसका परिवारवाद उसकी राह में फिर बाधा बनकर खड़ा नजर आएगा। जनता के दिलों में जब भी उतरने की बात होगी, उसके सामने चुनौतियां होंगी। यानी कांग्रेस की राह बहुत मुश्किल है और महाधिवेशन से बहुत कुछ नहीं बदला है।

Exit mobile version