अग्नि आलोक

क्या अतीक −अशरफ हत्याकांड की तह तक जा पाएगा न्यायिक आयोगॽ

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अशोक मधुप 

शनिवार की रात उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में साढ़े  दस   बजे के आसपास पुलिस कस्टडी में माफिया अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की हत्या के बाद  प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य ने न्यायिक जांच के आदेश ही नही दिए अपितु इसके लिए आयोग भी गठित कर दिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस अरविन्‍द कुमार त्रिपाठी द्वितीय की अध्‍यक्षता में आयोग का गठन हुआ है। इसमें पूर्व पुलिस महानिदेशक सुबेश कुमार सिंह    और इलाहाबाद के रिटायर्ड जनपद न्यायधीश  ब्रजेश कुमार सोनी को सदस्य बनाया गया है।  आयोग से कहा गया है कि वह जांच कर दो माह में रिपोर्ट दे दे।आयोग बन गया किंतु प्रश्न यह है कि क्या यह आयोग हत्या के कारणों  की तह तक जा पाएगाॽ

माफिया अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ को शनिवार को  मेडिकल कराने ले जाया जा रहा था।  मेडिकल कॉलेज के पास मीडियाकर्मी बनकर आए बाइक सवार तीन हमलावरों ने ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दीं। अतीक और अशरफ के सिर में गोलियां लगीं। इससे दोनों की मौके पर ही मौत हो गई ।सारी घटना एक मिनट में पूरी हो गई। जब तक मृतक अतीक और अशरफ के सुरक्षा कर्मी सचेत होते,एक्शन करते कि हमलावरों ने सर्मपण कर दिया। हमलावरों की पहचान लवलेश तिवारी, अरुण मौर्य और सनी के रूप में हुई। लवलेश बांदा का रहने वाला है, जबकि अरुण मौर्य हमीरपुर का तीसरा आरोपी सनी कासगंज से है। बताया जा रहा है कि हमलावर दो दिनों से प्रयागराज के किसी होटल में रुके हुए थे। जांच में यह बात सामने आई  है कि तीनों सामान्य परिवार से हैं,उनकी आर्थिक  हालत ऐसी नही कि वह हत्या में  प्रयोग किया छह −सात लाख का पिस्टल खरीद सके। ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि उन्हें पिस्टल किसने उपलब्ध करायाॽ  उनके पीछे कौन हैॽ  माफिया अतीक और अशरफ की हत्या से किसका लाभ थाॽ क्या मरने वाले इन दोनों माफियाओं के पास कोई ऐसा राज था,जिसके खुलने का मरवाने वाले को डर था। एक यह भी बात आ रही है।इस समय प्रदेश में स्थानीय निकाए  चुनाव चल रहे हैं, क्या  कोई  सरकार विरोधी या योगी आदित्य नाथ  विरोधी शक्ति तो इसके पीछे नही हैंॽ  बहुत सारे सवाल हैं।  क्या  जांच  आयोग इस कांड की तह तक जा पाएगाॽ        

हालाकि हत्याकांड के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने देर रात डीजी, एडीजी और प्रमुख सचिव के साथ बैठक की। मुख्यमंत्री ने अराजकता फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए। अशरफ और अतीक की सुरक्षा में लगे सभी 17 सुरक्षा कर्मियों को निलंबित कर दिया है।

इस दुस्साहसिक दोहरे हत्याकांड के  लिए आरोपियों का कहना है कि हम अतीक गैंग का सफाया करना चाहते थे। हम प्रदेश में अपना नाम कमाना चाहते हैं। इसीलिए हमने अतीक और उसके भाई को मारने का निर्णय  लिया।दोनों को मारने के लिए हम पत्रकार बनकर आए थे। ये जानकारी शुरूआती पूछताछ में पता  चली।आगे क्या  निकलेगा,यह पूछताछ का मसला है। किंतु इन मौत के पीछे शक की सूईं कुछ प्रभावशाली सफेदपोशों की ओर भी घूमने लगी है। एक दिन पहले ही धूमनगंज थाने में पूछताछ में माफिया अतीक  ने कई बिल्डरों और बड़े लोगों से अपने रिश्तों का खुलासा किया था। आशंका  जताई जा रही है  कि राज खुलने के डर से माफिया और उसके भाई की तो  कहीं जान नही ली गई। अतीक अहमद ने रिमांड के दौरान कई सनसनीखेज खुलासे किए । प्रयागराज समेत यूपी भर में अपनी काली कमाई के बल पर खड़े किए गए आर्थिक साम्राज्य में पार्टनर के तौर पर कई गणमान्यों के नाम गिनाए थे।यह वो नाम हैं जिन्होंने अतीक के काले धन को अपनी कंपनियों में लगाया है। ऐसी दो सौ से अधिक सेल कंपनियों के बारे में पता चला था। रियल एस्टेट कारोबार में अतीक की कमाई खपाने वालों के अलावा कई सफेदपोशों तक आंच आने लगी थी। इस तरह के पचास से अधिक नामों का अतीक ने खुलासा किया था।अपराध की दुनिया में दखल रखने वाले माफिया  अतीक  के कई राजनीतिक दलों के नेताओं से भी रिश्ते रहे हैं। अतीक राजनीतिक दलों को साधने में भी बखूबी माहिर था। यही वजह थी कि दो दशकों तक उसकी अंगुलियों पर सरकारें नाचती रहीं और आला पुलिस का अधिकारी उसके सियासी रसूख के आगे घुटने टेकते रहे। 

अतीक और उसके भाई अशरफ  की मौत के पीछे कारण कुछ भी  हो, किंतु यह तो स्पष्ट  है कि इसके पीछे  इलेक्ट्रोनिक मीडिया  भी  कहीं जिम्मेदार है।जिस तरह से साबरमती जेल से लेकर अतीक अहमद और अशरफ की हत्या होने तक इलेक्ट्रोनिक मीडिया उनके पीछे लगा रहा। इनकी एक −एक गतिविधि को दिखाने की विभिन्न चैनल में होड लगी रही,उससे  सुरक्षा कवच भेद दिए जाने के अवसर तो पैदा हो ही गए । हमलावरों को पल −पल की लोकेशन तो मिलती ही रही। बाइटस के नाम इलैक्ट्रानिक मीडिया  का  कहीं भी घुंस  जाने का हमलावरों ने फायदा उठाया।उन्हें जानकारी थी कि ऐसे अवसर पर  इलैक्ट्रानिक मीडिया की कोई जांच नही करता।सो उन्होंने भी कैमरा और आईडी लेकर  इलैक्ट्रानिक मीडिया कर्मी  बन घटना को सरलता से अंजाम दे दिया।यदि माफिया अतीक और अशरफ को  मीडिया को बाइट देने के लिए  रोक  दिया  जाता।मीडिया कर्मियों को सुरक्षा घेरे से दूर रखा जाता  तो  संभवतः यह हादसा नही हो पता।

यह पहला अवसर नही है जब इलैक्ट्रिक मीडिया की लाइव घटना दिखाने का अपराधियों और आतंकवादियों ने फायदा उठाया हो।इससे पहले भी मुंबई पर आतंकवादी हमले में ऐसाहो चुका है।हमारा इलैक्ट्रानिक मीडिया मुंबई पर

 आतंकवादी  हमले की घटना को लाइव दिखाने के चक्कर में हमारे सुरक्षाबलों और कमांडो की कार्रवाई  को लाइव दिखाता रहा। हमलावरों के आका ये कार्रवाई देख पाकिस्तान से हमलावरों को गाइड करते रहे।ये भी  सूचना रहीं कि आतंकवादी होटल के अंदर कमरे में लगे टीवी पर सुरक्षाबलों की कार्रवाई देख  उसने बचने की योजना  बनाने में लगे रहे। 

 एक बात और हमारे सुरक्षा  कर्मी और नेता टीवी पर अपने चेहरे देखने का लोभ संवरण  नही कर पाते।इसीके लिए वे सुरक्षा मानकों में चूक कर जाते हैं। ये इलेक्ट्रानिक मीडिया को देख बाइट देने  खुद उसकी ओर बढ़  जाते हैं।  यहां भी ऐसा ही हुआ।यदि सुरक्षाकर्मी  मीडिया को अतीक और उसके भाई अशरफ से दूर रखने में कामयाब हो जाते , दोनों के सुरक्षा घेरे में मीडिया को न आने देते तो ये हादसा  न होता।

 सरकार ने पुलिस घेरे में हुए इस  दुहरे मर्डर की न्यायिक  जांच के आदेश तो दे दिए हैं, किंतु प्रश्न यह है कि क्या ये न्यायिक जांच आयोग इस कांड में मौके पर मौजूद  इलेक्ट्रोनिक  मीडिया की भूमिका की भी जांच करेगाॽ क्या  इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लिए  कोई गाइड  लाइन बनाने की सिफारिश  भी करेगाॽक्या कुकरमुत्तों  की तरह रोज –रोज  उग रहे न्यूज पोर्टल ,वीडियो चैनल के बारे में  गाइड लाइन बनाने को भी सरकार से कहेगाॽ  

(लेखक वरिष्ठ  पत्रकार हैं) 

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