प्रणव प्रियदर्शी
वह नब्बे के दशक का मध्य था, और हम अपनी उम्र के ढाई दशक पूरे कर तीसरे दशक की ओर बढ़ रहे थे, जब दूसरे शहर में रह रही एक मित्र ने मुंबई का हमारा जीवन देखने के बाद पत्र के जरिए कहा था, ‘तुम लोगों का संघर्ष रंग लाएगा।‘ मित्र की यह टिप्पणी हमारी तारीफ थी, उसके पीछे का भाव हम तक पूरी स्पष्टता से पहुंच गया था, फिर भी हमें हैरत हुई शब्द संघर्ष पर। क्या हम जो कर रहे हैं, जिस तरह से रह रहे हैं, उसे संघर्ष कहेंगे?
उस मित्र की नजर से देखें तो जवाब स्पष्ट हां था। हम चार-पांच दोस्त साथ रहे रहे थे, उनमें से दो-तीन के पास ही नियमित आय वाली नौकरी थी। मैं उनमें से एक था, पर मैं भी किसी बड़े मीडिया ग्रुप का हिस्सा नहीं था, एक सांध्य दैनिक से जुड़ा था। जो वेतन मिल रहा था, उसमें कहीं अपना फ्लैट खरीदना तो दूर किराये पर ढंग का घर लेकर परिवार सहित रहना भी मुश्किल था। ऐसे जीवन को सेट्ल्ड लाइफ तो नहीं ही कह सकते। और लाइफ सेट्ल नहीं है तो फिर संघर्षपूर्ण ही कही जाएगी।
लेकिन फिर भी, मित्र के उस ऑब्जर्वेशन ने हमें न केवल चकित किया, बल्कि अपनी जिंदगी को लेकर व्यंग्यात्मक भाव से भर दिया। लगा, कोई हमें बेवजह ही ज्यादा महान मान रहा है। हम तो इतने मजे की जिंदगी जी रहे थे कि उसमें निहित खतरों की ओर देखने की फुरसत ही नहीं थी। खतरे निश्चित रूप से थे, और हम उन खतरों से अवगत भी थे- शारीरिक हमलों की आशंका से लेकर आर्थिक असुरक्षा तक। मगर वे खतरे जीवन का लुत्फ उठाने के हमारे जज्बे को कमजोर नहीं कर पाते थे।
इसका एक सबूत यह भी है कि अब तक की पूरी जिंदगी पर एक नजर डालूं तो बाद के कथित सेट्ल्ड लाइफ के मुकाबले उस दौर की चमक जरा भी फीकी नहीं लगती। बल्कि जर्नलिस्टिक थ्रिल की बात करें तो वह दौर सब पर भारी ही दिखता है।
जाहिर है, जीवन की चुनौतियां काफी हद तक सोचने के हमारे ढंग पर निर्भर करती हैं। मेरी उस मित्र को लगा, उस दौर में मेरी चुनौती यह थी कि मैं कैसे जल्द से जल्द बड़े मीडिया ग्रुप में अपनी जगह सुनिश्चित करूं और मेरे जीवन का संघर्ष कुछ कम हो। मैं उस दौर की चुनौती यह मानता था कि बड़े मीडिया ग्रुप से मिलने वाली सुरक्षा के बजाय ‘सार्थक पत्रकारिता’ के जज्बे को अपने अंदर सलामत रखूं। चुनौती का यह रूप ही था, जिसने उस दौर में एक बड़े अखबार समूह से मिले प्रस्ताव को ना करने को प्रेरित किया।
मगर, ये बातें तो मैं अब कह रहा हूं, जब मुड़कर अपनी जिंदगी को देखने की फुरसत मिली है। उस दौर में तो ये बातें सिखाने वाले कई बेहतर उदाहरण आसपास के लोगों की जिंदगी से मिल रहे थे।
मिसाल के तौर पर एक युवा आईपीएस मित्र ने अपने नाम के साथ लगे ईमानदार के तमगे पर, एक निजी बातचीत में कहा था, ‘लोग कहते हैं, मैं ईमानदार हूं। काहे का ईमानदार भाई। जिस कुर्सी पर मैं बैठा हूं, बिना हाथ-पैर डुलाए हर महीने दस लाख (94-95 की बात है) रुपये मेरे पास आने ही हैं। मेरी कुल जमा ईमानदारी यह है कि मैं वह रकम नहीं ले रहा। लेकिन मेरे नीचे का अफसर ले रहा है, मेरे ऊपर के लोग ले रहे हैं। यह जो ‘जल प्रवाह’ है, इसे रोकना मेरे बूते के बाहर की बात है। मैं तो पूरी ताकत से अपनी छतरी थामे हूं कि किसी तरह मैं भीगने से बचा रहूं और सच यह है कि वह छतरी भी कब फट जाएगी मुझे नहीं मालूम।‘
जाहिर है, उस अफसर की चुनौती, उस दौर में यह थी कि अपनी छतरी को फटने से जब तक हो सके बचाए रखे, हालांकि उसी के बैच के कई अन्य अफसर अपनी चुनौती यह मान रहे थे कि दस लाख की उस रकम को जितना हो सके, बढ़ाते रहें।
(प्रणव प्रियदर्शी वरिष्ठ पत्रकार-लेखक हैं। हाल में उनकी दो किताबें आई हैं, “चौराहों पर चौराहे” और रुचिरा गुप्ता की “आई किक एंड आई फ्लाई” का अनुवाद “मैं लड़ी और उड़ी”।)

