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बिना विचार ……पछताय?

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शशिकांत गुप्ते

खाली बनिया क्या करे, इस कोठी का धान उस कोठी में धरे
इस कहावत का अर्थ है,बेकार आदमी उल्टे सीधे काम करता है।
प्रख्यात कवि गिरधरजी ने ऐसे लोगों के लिए अपनी कुंडलियों में स्पष्ट लिखा है।
बिना विचारे जो करै, सो पाछे पछिताय।
काम बिगारै आपनो, जग में होत हँसाय॥
जग में होत हँसाय, चित्त में चैन न पावै।
खान-पान सनमान, राग-रंग मनहिं न भावै॥
कह गिरिधर कविराय, दुःख कछु टरत न टारे।
खटकत है जिय माँहि, कियो जो बिना बिचारे

उक्त कुंडली में उन लोगों के लिए है,जो अहंकार में बिना विचारें कोई भी निर्णय लेतें हैं। इनलोगों के ग़लत निर्णय के शिकार वे लोग हो जातें हैं, जो जागते हुए सपने देखने के आदि होतें हैं।
ऐसे लोगों के लिए शायर आदिल मंसूरी का यह शेर मौजु होगा।
ख़्वाहिश सुखाने रक्खी थी कोठे पे दोपहर
अब शाम हो चली मियाँ देखो किधर गई

ख्वाहिश का मतलब होता है,अभिलाषा,इच्छा,कामना आदि।
शायर निदा फ़ाज़ली का यह शेर मौजु होगा।
यही है जिंदगी कुछ ख्वाब चंद उम्मीदें
इन्ही खिलौनों से तुम बहल सकों तो चलो

इनदिनों बेरोजगारों के लिए नित नई उम्मीद जगाई जा रही है। लेकिन उम्मीदों पर पानी तब फिरता है जब पता चलता है कि, चार दिन की चांदनी फिर वही अंधेरी रात इसी कहावत के साथ इस लोकोक्ति की का भी स्मरण होता है, कहीं ऐसा ना हो, सर मुंड़ाते ही ओले पड़े इस तरह की स्थिति का सामना करने का मुख्य कारण है।
हम को उन से वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

मिर्ज़ा ग़ालिब
इसीलिए बिना विचारें कुछ भी नहीं करना चाहिए।
आज जो कुछ हो रहा है, यह सब देख,सुन कर आश्चर्य होता है।
अहिंसा के पुजारी बापू के देश में हो रहा है।
लेखक को स्वरचित रचना का स्मरण हुआ
आग तो
है आग
दावानल जंगल में
जलती है जो स्वयं ही।
जलाई जाती एक
कहते हैं
जिसे अलाव
ईद गिर्द बैठ कर
हँसी ठिठोली,गप शप
जमती है चौपाल
एक होती है आग
घास फूस में है, जलती
जलने में क्षण
और
बुझने में पल
है लगता।
एक होती
बहुत ही
संवेदनशील
कहते हैं,
जिसे जठराग्नि
यह भूखे को
बना देती है असहनशील
संदेश देती
भूखे पेट
भजन न होई गोपाल
एक होती मुखाग्नि
जलाती है जो
नश्वर को
इस यथार्थ के साथ
सत्य है
राम का ही नाम।
एक लगाई जाती है,
वैमनस्यता, फैलाने
दंगों को भड़काने
यह आग
करती है पैदा
अलगाव
और
इस उक्ति को
करती सार्थक
घर फूंक
देख तमाशा
एक आग है
जो सुलगना चाहिए,
दिलों में, और
जो शब्दों से
दूर करे भ्रांति,
हो अहिंसक क्रांति
यह आग ही
कर सकती है उद्वेलित
जन मानस को
ऐसी ही
जलना चाहिए
यथार्थ में अग्नि नहीं
शाब्दिक आग
जो जगाए सोतों को
इस आग की लपटों
को बुझने न देना कभी,
नहीं तो
रह जाएगा
सिर्फ धुंआ
जो फैलाएगा प्रदूषण
अंर्तमन की आग
कभी न बुझे
जलना चाहिए निरन्तर,
जरूरी है समझना
उक्त आग जलाना
और भड़काऊ
आग लगाने
का अंतर
वैचारिक आग
देती है
संदेश
शांति से भी
हो सकती है
क्रांति
वर्तमान में
है अनिवार्य
वैचारिक क्रांति।

रचना 7 जून 2020 को लिखी थी।

शशिकांत गुप्ते इंदौर

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