डॉ. विकास मानव
® मेरी भैरवी बनने की प्रार्थना मुझ से नहीं करें
© वर्जिन लड़की मिलना असंभव जितना मुश्किल
© पेरेंट्स की स्वीकृति बिना अवयस्क को लेकर जेल नहीं जाना मुझे
ध्यान-तंत्र की भैरवी साधना में प्रकृति को ‘योनिरूपा’ है और इसी के स्वरूप एवं संरचना में प्रत्येक इकाई उत्पन्न हो रही है। इसका यह अर्थ हुआ कि पुरुष भी ‘योनिरूपा’ है और ‘स्त्री’ भी, लेकिन यह कैसे हो सकता है ?
*यह सत्य है :*
वस्तुतः हम सापेक्ष रूप में स्त्री-पुरुष हैं। कोई भी नर-मादा, चाहे वह मनुष्य हो या इतर प्राणी योनिरूपा ही होता है। इसमें पहली योनि शरीर है, दूसरी योनि हमारे शीर्ष का चांद है। इस चांद से योनियों की लड़ी गुंथी हुई है, जो पूंछ या त्रिकास्थि तक चली जाती है। एक योनि भृकुटियों के मध्य होती है। इसकी सह- रचनायें हमारे अंग-अंग में योनिरूप में श्रृंखलाबद्ध हैं।
इन सबके लिए ‘लिंग’ की उत्पत्ति शीर्ष के चांद पर होती है। यहां एक अदृश्य त्रिकोणात्मक शंकु उत्पन्न होता है, जिसका मुंह नीचे की ओर होता है। यह एक ऐसी ऊर्जा है, जो ब्रह्माण्ड में पायी नहीं जाती। शरीर के कारण उत्पन्न होती है, अर्थात् शरीर का जो पावर सर्किट बनता है, वह ‘योनि’ है। इस ऊर्जा योनि पर उत्पन्न होने वाले आवेश के कारण यह ‘लिंग’ वातावरण में अवतरित होता है।
यह अवतरित लिंग ही इस शरीर के प्राणों का आधार है। यह अपने मध्य में अमृत समेटे है, जिसे अपने में पीकर यह शरीर जीवित रहता है। इस प्रकृति के लिए भी यही क्रिया चलती है और सूर्य या ग्रहों, तारों से लेकर पेड़-पौधों तक में इस लिंग की उत्पत्ति इसी प्रकार होती है।
इसे हम अनुभूत नहीं कर पाते; क्योंकि यह अत्यन्त सूक्ष्म ऊर्जा से बनता है। हो सकता है कि कल यह विकसित उपकरणों से अनुभूत किया जा सकता है। परन्तु भैरवी विद्या की विधियों के ज्ञान और अभ्यास से इसे अनुभूत किया जा सकता है। यद्यपि यह अन्तिम चक्र की सिद्धि के बाद ही ज्ञात होता है, पर कुछ को पूर्वजन्म के अभ्यासों के कारण सरल रूप में भी ज्ञात हो जाता है। यह तो उस परमात्मा की ही कृपा है कि वह किस पर यह ज्ञान का अमृत बरसाता है।
सभी साधकों एवं ऋषियों ने कहा है कि बिना उसकी कृपा के उसे जाना नहीं जा सकता। विद्वता और पाण्डित्य से उसका ज्ञान नहीं होता, साधना मार्ग भी तभी सफल होता है, जब वह चाहता है।
शरीर और संसार तक सिमटे मूर्खों का विज्ञान इन कथनों का मजाक उड़ाता रहा है। आज भी उड़ा रहा है, वह अनेक रहस्यों को नहीं जानता। प्रतिक्षण प्रत्येक में हजारों बार वह परमात्मा अपना सारतत्त्व सबके शीर्ष में टपका रहा है। किसी में कम, किसी में अधिक, जिसकी जितनी मांग है।
कई लड़कियां मेरी भैरवी बनने के लिए मुझ से प्रार्थना करती रहती हैं. मुझे कुछ सिद्ध नहीं करना है. जितनी भी ध्यान-तंत्र की साधनाएं हैं, मैंने पूरी कर ली है. जिनको नहीं पता है, वे मेरा अध्ययन कर सकते हैं : एक बात.
दूसरी बात यह कि अगर मैं लड़की को अलौकिक मंज़िल देने के लिए उसे भैरवी के रूप में लूँ भी तो सिद्धि के परमानंद के शिखर पर पहुंचने का उसका सपना साकार होना संदिग्ध रहेगा. इसलिए कि भैरवी साधना में वर्जिन लड़की चाहिए होती है और आज के दौर में ऐसी लड़की की संभावना शेष नहीं बची है. आठ- दस साल वाली लड़की ऐसी हो सकती है, लेकिन बालिग नहीं होने के कारण उसके पेरेंट्स की स्वीकृति चाहिए होगी. ये मिलेगी नहीं. बिना स्वीकृति के उसको एक्सेट करके मुझे दोबारा जेल नहीं जाना है.
हाँ, अगर गर्ल्स या विमेंस सुपर आर्गेज्मिक सेक्सुअल सटिस्फैक्शन के महासुख की अनुभूति के लिए मुझे लेना चाहती हैं, तो ले सकती हैं. यह तो लाखों में से किसी एक को मिलता है, वो भी शायद. बदचलन बनकर कई से यूज होने पर तो यह मिल नहीं सकता. मिलता होता तो वेश्याएँ सबसे ज्यादा सुखी होती.
मैं एक-एक घंटे का सात राउंड सेक्स देने में सक्षम हूँ. इतना अगर आप अपने लिए पर्याप्त समझती हैं, तो मुझे कोई ऐतराज़ नहीं हो सकता. वैसे इसकी भी मुझे जरूरत नहीं पड़ती. मेरी स्प्रिचुअल थेरेपीज से आप वह स्टेज पाएंगी जो दुनिया का कोई भी सम्भोग नहीं दे सकता. आप कहेंगी वो कैसे? तो आपको आम से मतलब, गुठली क्या गिनना.
भैरवी साधना में ‘नारी’ महामाया का प्रतिरूप है। उस महामाया का, जो प्रकृति के रूप में अपने आंचल में प्रत्येक चर-अचर को समेटे उसका पालन कर रही है। इस महामाया के अन्दर ही समस्त देवी-देवता, भूत-पिशाच, राक्षस- किन्नर और सभी प्रकार की शक्तियां विद्यमान हैं, इसलिए साधना के मध्य ‘नारी’ इष्ट के अनुसार मानी जाती है।
जैसे यदि हम ‘लक्ष्मी’ की साधना कर रहे हैं, तो ‘भैरवी’ के तौर पर जो नारी-साधिका होती है, ‘लक्ष्मी’ का ही रूप मानी जाती है। उसकी पूजा-अर्चना उसी रूप में होती है। भैरवी साधना में नारी को दिया गया यह स्वरूप कल्पना नहीं है, यानी कल्पना के तौर पर नारी को महामाया का रूप नहीं माना गया है, बल्कि वह वास्तव में महामाया है।
*भैरवी साधना में सृष्टि :*
जब यह प्रकृति नहीं थी, तब कोई नहीं था। सर्वत्र एक तेजोमय शान्त निर्विकार शाश्वत अविनाशी तत्त्व फैला हुआ था, जिसमें कोई हलचल नहीं थी, कोई गुण नहीं था। सदा ‘शव’ के समान निष्क्रिय रहने वाले इस ‘सदाशिव’ के अतिरिक्त कहीं दूसरा कोई नहीं था ।
इस शान्त अविनाशी तत्त्व के एक अति सूक्ष्म बिन्दु पर एक विस्फोट हुआ (इसका कारण किसी को ज्ञात नहीं। वैदिक ऋषियों ने कहा है कि दूसरा तो कोई है ही नहीं, जो क्रिया करे या बल लगाये, इससे प्रतीत होता है कि यह इसी की मर्जी से होता है अथवा यह इसकी प्रवृत्ति है । वाममार्ग में इसे सदाशिव की समाधि से जागना कहा जाता है)। इस विस्फोट से एक भंवर बन गया, जिसके केन्द्र में शंक्वाकार घूमती हुई संरचना ऊपर उठी।
इसकी आकृति एक प्याले के मध्य उठे शंकु की तरह थी (यह नियमों से बनता है)। यह प्याले के साथ घूमती नाच रही थी, जिससे इस पर आवेश एकत्रित होने लगा।
साधकों ने इसे आद्यायोनि कहा है। यह अप्रत्यक्ष तत्त्व से प्रत्यक्ष भौतिक उत्पत्ति का पहला चरण है। इस समय कोई आकृति उत्पन्न नहीं होती। केवल ‘योनि’ उत्पन्न होती है।
इस आवेशित योनि की प्रतिक्रिया में इसके ऊपर एक उल्टी प्रतिकृति उत्पन्न होती है, जो ‘योनि’ की भांति ही नाच रही होती है। इस पर भी आवेश संघनित होने लगता है। भैरवी साधना में इसे ‘लिंग’ कहा गया है। इसे ‘बिन्दु’ या शिवसार भी कहा जाता है।
विपरीत आवेश से आवेशित ये संरचनायें एक-दूसरे की ओर खिंचकर टकराती हैं और दूसरा विस्फोट होता है, जिसे ‘ब्रह्मनाद’ कहा जाता है।
यह दूसरा विस्फोट त्रिआयामी होता है। पहला विस्फोट पराविस्फोट है। इससे भी लहरें (नाद) उत्पन्न होती हैं। दूसरा विस्फोट त्रिआयामी इसलिए होता है कि दोनों शंकु दोनों प्यालों के मध्य में टकराती हैं। धन एवं ऋण बिन्दुओं के टकराने से दोनों ओर विस्फोट होता है।
इसके दबाव से तीसरा विस्फोट इनके केन्द्र में होता है। इस तरह यह त्रिआयामी विस्फोट होता है। इसके नाद में तीन प्रकार की लहरें होती हैं।
*महामाया की उत्पत्ति :*
इससे एक ऊर्जा आकृति उत्पन्न होती है। इसमें धन, ऋण एवं नाभिक-ये तीन ऊर्जा बिन्दु होते हैं। शास्त्रों में इसे पृथ्वी, आकाश और सूर्य की उत्पत्ति बताया गया है। यहां पृथ्वी ‘आधार’, आकाश ‘धन’ एवं सूर्य का अर्थ ‘नाभिक’ है। यह सृष्टि का प्रथम जीवित बीज है, अर्थात् ‘आत्मा’। इसकी एक संरचना है।
एक निश्चित संरचना, जो इस प्रकार है :
फण शेषनाग -धन (आकाश) -पहला वलय -दूसरा वलय -नाभिक (सूर्य) ऋण (पृथ्वी) – तीसरा वलय -पूंछ (जेट जैसा फव्वारा).
यह संरचना मानवाकृति में नहीं है, परन्तु समस्त ऊर्जा संरचना वही है, जो मानव सहित समस्त प्राकृतिक इकाइयों में पायी जाती है। इस रहस्य को जानने के लिए साधना पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित ‘मृत्यु के बाद’ पढ़ें। यही प्रथम जीव है। इसे सृष्टि बीज कहा जाता है।
यह तीन बिन्दुओं का होता है, जहां तीन योनि, तीन लिंग का समागम होता रहता है। इसमें तीन देवियों का निवास है। एक ऊपर ‘तारा’, नीचे ‘काली’ और बीच में ‘भुवनेश्वरी’। तीसरे बिन्दु के मध्य राजराजेश्वर ‘शिव’ भुवनेश्वरी के हृदय में, अर्थात् इसके केन्द्र में रहते हैं।
यह एक विचित्र उत्पत्ति है। इसे उत्पत्ति कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि इसमें नया कुछ नहीं बनता। इसमें ‘तत्त्व’, अर्थात् सदाशिव की ही धारायें बहती हैं।
यह चक्रवात-जैसी संरचना है और चक्रवात के नियमों से ही ( समान नियम) उत्पन्न होती है। परन्तु चूंकि यह जिस तत्त्व की धाराओं से बनती है, वह तेजोमय तत्त्व है,
इसलिए अपना एक सर्किट बना लेती है और विकास करने लगती है। धीरे-धीरे विकसित होकर यह नौ ऊर्जा बिन्दुओं की संरचना बन जाती है और महामाया के बीज का पूर्ण विकास हो जाता है।
यह प्रकृति इसी का विकसित रूप है। इसके 9 बिन्दु, 108 में फिर 108 से अरबों में किसी विशाल पेड़ की तरह विकसित होते चले जाते हैं।
यह प्रकृति ‘योनि’ से उत्पन्न होती है। जहां-जहां योनि उत्पन्न होती है, ‘लिंग’ भी उत्पन्न होता है और इस प्रकृति के कण-कण में जहां भी ऊर्जा उत्पादित हो रही है, योनि और लिंग का ही समागम चल रहा है।
इस प्रकृति में प्रत्येक प्रकार की ऊर्जा के उत्पादन का यही स्त्रोत है। समस्त प्रकृति एक ऊर्जा चक्र है और यह जिस संरचना में है, उसी संरचना में इसकी प्रत्येक इकाई उन्हीं सूत्रों से उत्पन्न होती हुई क्रिया और विकास कर रही है, जिन सूत्रों से प्रकृति उत्पन्न और विकसित होती है।

