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स्त्री रहस्य है और पुरुष पहेली : एक अज्ञात एक अबूझ~डॉ. प्रिया

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~डॉ. प्रिया

स्वर्ग से निष्कासित इंद्र की प्रमुख नृत्यांगना उर्वशी नाम की एक अप्सरा ने ‘अपने समय के सूर्य’ और प्रबल पराक्रमी राजा पुरुरवा को पागलों की तरह बन-प्रांतर में प्रव्रज्या करने को बाध्य कर दिया.
दुनिया की सबसे पुरानी किताब ‘ऋग्वेद’ के दसवें मण्डल के सूक्त ९५ में केवल १७ ऋचाएँ पुरुरवा और उर्वशी संवाद की हैं, जिसके आधार पर कालांतर में कालिदास, वेदव्यास, कथासरित्सागर, ब्राह्मण और आधुनिक काल में दिनकर तक कोई १७ हज़ार पृष्ठ लिखे जा चुके हैं और भविष्य में भी लिखे जाते रहेंगे; जिस पर एक निहायत ही दिलचस्प उपन्यास-आख्यान लिखा जा सकता है.
पुरुरवा और उर्वशी के बीच जिन १७ ऋचाओं में जो संवाद है वह एक पुरुष और स्त्री के बीच संवाद है वह मनुष्यता के इतिहास का प्रथम स्त्री-पुरुष संवाद है. यह ध्यान से पढ़ने पर अंतिम संवाद लगता है और यह स्त्री की कठोरता और पुरूष की कातरता का प्रथम प्रामाणिक दस्तावेज़ है.

कहाँ वेदों का प्रामाणिक भाष्य करने वाले सायण और कहाँ मैं दावण (खींचने वाला ग्रामीण), लेकिन ‘ऋग्वेद’ के इस सूक्त का कविता-भाष्य करने का दुस्साहस करता हूँ और शताब्दियों से सुलग रही इस शब्द-वेदी पर अपनी समिधा अर्पित करता हूँ :
इस संवाद की पूर्वकथा यही समझनी चाहिये कि उर्वशी चार वर्ष तक पुरुरवा के साथ पत्नी की तरह रहकर एक दिन अंतर्धान हो गयी और यह भी प्रतिवाद है कि वह पुरुरवा से अधिक अपने मेमनों से प्यार करती थी और पुरुरवा उसके वियोग में पागल हो गया जंगल जंगल भटकने लगा.
एक दिन रेगिस्तान में भटकते हुये एक पोखर में अपनी सखियों के साथ स्नान करती उर्वशी दिख गयी और कहा जाता है कि यह संवाद इसी पोखर के सन्निकट घटित हुआ.
हे निष्ठुर, उर्वशी!
क्या बातचीत के जरिये कोई रास्ता नहीं निकल सकता जिससे अपना जीवन पूर्व की तरह सुखमय हो जाये? पुरुरवा ने उर्वशी से पूछा.
निरर्थक बातचीत से क्या हासिल होगा. मैं अब तुम्हारे लिये वायु की तरह दुर्लभ हूँ. उर्वशी ने कहा.
तुम्हारे बिना मैं बेकार हो गया.
भुजाओं से बाण तक नहीं उठता.
सब कुछ धूमिल है.
भूल गया हूँ सिंह गर्जना.
घर चलो, उर्वशी!
हे, पुरुरवा
तुमने मुझे तीन बन्धनों में कसा है.
मैं शरीर पर शासन करती थी.
तुम्हारे जाने के बाद सब निस्तेज हो गया है.
दूसरी अप्सराएं भी अब शोर मचाती नहीं आतीं.
वे भयभीत हिरणियों और
दांतों से लगाम काटते अश्वों की तरह भाग जाती हैं.
मैं अतृप्त हूँ, उर्वशी!
पुरुरवा, जाओ.
लेकिन आँसू बहाते हुये मत जाओ.
भूल जाओ आसक्ति.
मूर्ख! मेरा ठिकाना नहीं पा सकते.
यहीं भू-लुंठित हो जाता हूँ, उर्वशी.
मेरा शरीर दुर्गति को प्राप्त करेगा.
उसे जंगली भेड़िये चबायेंगे.
ऐसा नहीं होगा.
तुम सकुशल जाओ, पुरुरवा.
और ध्यान से सुनो!
स्त्रियों की मैत्री स्थायी नहीं रहती.
स्त्रियों और लकड़बग्घों का हृदय समान रूप से कठोर होता है.
चार बरस मैं तुम्हारे साथ रही, पुरुरवा. तेजस का स्वाद दिन में अनेक बार लिया है. मैं उसी सन्तुष्टि के सागर में विचरण करती हूँ.
मैं बहुत व्याकुल हूँ, उर्वशी
आओ घर लौट चलें.
जाओ!
तुम ज़रूर मृत्यु पर विजय प्राप्त करोगे.
और जीते-जी स्वर्ग का भोग करोगे.
हो सकता है तुमसे कभी फिर मुलाक़ात हो न हो.
तुम जाओ, पुरुरवा.
यह कह कर उर्वशी फिर अंतर्धान हो गयी !
~~~
यही स्त्री-पुरुष-सार है.
बाक़ी जो है वह गप्प है, क़िस्सा है. कहानी है, उपन्यास है, कविता है. मुल्ला का अमामा है या बनिये की किताब है!

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