सुसंस्कृति परिहार
इस वक्त समूचा देश एक दोराहे पर खड़ा है।भारत का वजूद और उसकी अस्मिता तार तार हो रही है।एक वक्त का शक्तिशाली भारत आज विदेशी ताकतों से डरा हुआ है। ख़ामोश है। अंदरूनी हालात भी साम्प्रदायिकता, और जातिवादी और नारी अस्मिता पर हमलों से घिरे हुए हैं। संसद में प्रतिपक्ष और विरोधी सांसदों को बोलने का अवसर ही नहीं मिलता।यानि प्रजातांत्रिक व्यवस्था ठप है।तीन महिला सांसदों से डरे प्रधानमंत्री ,को वे दांत से काट सकती थीं इसलिए लोकसभाध्यक्ष ने जोखिम लेना उचित नहीं समझा उन्हें लोकसभा आने से रोक दिया। उधर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सुप्रीम कोर्ट में जाकर एसआईआर पर बहस मुबाहिसा करना उन्हें आतंकित किए हुए है।

मित्रों,यह तो राजनैतिक गलियारों में हो रहा है। लेकिन महिलाएं तो अब सड़क पर निकलकर जोश से नारे लगा रही हैं वह एक नए बदलाव के संकेत हैं।
उत्तराखंड की अंकिता भंडारी की हत्या जिसमें किस रसूखदार के लिए विशेष सर्विस की बात सामने आई।उसे लेकर उत्तराखंड में महिलाएं जिस तरह सरकार पर हमला बोलते हुए जिस तरह आक्रामक हैं। इसमें नया इंडिया दिखता है ।यदि ऐसी ही जिम्मेदारी प्रत्येक यौन हिंसा और बच्ची के गुम होने पर हर जगह दिखाई देने लगे तो महिलाओं को कमज़ोर समझने वाले दांत निपोरते नज़र आएंगे।
हालांकि कांग्रेस शासन में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में ऐसी सोच को विकसित करने विभिन्न मंचों पर छात्रों और अध्यापकों के बीच संवाद होते रहते थे जिनसे जन हितैषी आंदोलन खड़े हुए हैं और उन्हें कामयाबी भी मिली है। यहीं से प्रतिरोध की महिला आवाज़ भी मुखर हुई है ।
आज भी फासिस्टवादी सरकार के हस्तक्षेप के बावजूद यह बुनियाद कमजोर नहीं हुई है बल्कि अन्य विश्वविद्यालयों तक पहुंची है। यूजीसी बिल को लागू करने चारों ओर आज जो आवाज़ें सुनाई दे रही हैं उनमें महिला स्वर सबसे मुखरता से गुंजायमान हो रहा है। तमाम विश्वविद्यालय की छात्राओं का ये नया स्वरूप उनमें आए बदलाव को दर्शाता है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दिशा संगठन के छात्र छात्राएं सामयिक जनगीत गाकर प्रतिरोध को मज़बूत किए हुए हैं।पिछड़े और दलित वर्ग महिलाओं ने भी इस तकलीफ़ को समझा है।वे भी आंदोलनरत हैं।
भारत के इतिहास में हालांकि वामदलों और उनके युवा संगठनों में महिलाओं का बर्चस्व रहा है जो आज भी ज़िंदा है लेकिन अब जब महिला अत्याचार और राजनीति का तालमेल, अपराधियों के संरक्षण के कारण निरंतर उफान पर है तब हर महिला और बच्ची सहमी हुई नज़र आती है। इसलिए अब वह संघर्ष के लिए तैयार है। पिछले दिनों दुनियां भर के राजनायिकों, उद्योग पतियों के नाम जब से एपस्टीन फाइल में सामने आए हैं। वहां नाबालिग बच्चियों के साथ यौन हिंसा, उनके खून पीने और उनके मांस को भूनकर कबाब बनाकर खाने के दृश्य सामने आए हैं तब से महिलाओं की नींद उड़ी हुई है।
इस फ़ाइल में भारत के मुखिया,मंत्री और उद्योगपति के नाम भी सामने आए हैं जिन्होंने चिंता को और बढ़ाया है भारत में नेताओं से वैसे भी डर लगने लगा है।बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा अपने मायने खोता जा रहा है।ऐसे मायूस और दुखकर माहौल में महिलाओं की सक्रियता ज़रुरी है।
उन्हें ऐसे समाज की स्थापना करनी होगी जो इस गंदे माहौल में आसान रास्ता निकालें।हाल ही में राजधानी दिल्ली में गुम हुए लोगों की जो सूची आई है उसमें महिलाएं और नाबालिग बालक बालिकाओं की संख्या 80%है।नज़र रखनी होगी कहीं भारत भी ऐसे एपस्टीन जैसे किसी गिरोह से तो नहीं जुड़ गया है।
वर्तमान सरकार मनुवादी सरकार है जिसमें स्त्रियां गुलाम और दासियों के मानिंद थी। आज बलात्कारियों को सरकारी संरक्षण इसे बढ़ा रहा है।हाल ही में पटना के एक होस्टल से नीट छात्रा के साथ दुष्कर्म की आवाज़ उठाने वाले निर्दलीय सांसद पप्पू यादव को गिरफ्तार किया गया है।ऐसे अनेकों मामले हैं। यक़ीनन बच्चों की सुरक्षा अब महिलाओं की मांग का प्रमुख मुद्दा बन चुका है।तब इस मनुवादी सरकार का डटकर प्रतिकार और मज़बूत करना होगा।वरना हमारी ख़ामोशी बच्चों की जिस्म फरोशी को पन- पाएगी। बच्चियों पर हमें बाहर निकलने पर प्रतिबंध लगाना होगा। वे यही तो चाहते हैं। महिलाओ का बराबरी से खड़े होना सवाल करना उन्हें नापसंद है जबकि संविधान हमें बराबरी का हक देता है।इस तंगदिली का विरोध सब साथ मिलकर करें।बिल्किस बानो से लेकर सोनिया गांधी जी के बारे में इनके विचार सभी की जानकारी में हैं। महिला पहलवानों और मणिपुर की महिलाओं पर इनको तरह नहीं आया।
उत्तराखंड और विश्वविद्यालयीन छात्राओं और चल रहे आंदोलनों से प्रेरणा लें।देश को बर्बाद होने से बचाने ज़ोरदार हुंकार भरें। महिलाओं की आजादी के लिए संघर्ष ज़िंदा रखें। आखिरकार देश की आधी आबादी का सवाल है।