डॉ सुनीलम
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी एवं समाजवादी आंदोलन के पुरोधा, पूर्व सांसद मामा बालेश्वर दयाल की 26 दिसंबर 20 को
22 वी पुण्यतिथि है।
पुण्यतिथि के अवसर पर हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी 25 दिसंबर की रात तक मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के बामनिया आश्रम में 4 दिन की पदयात्रा कर 25,000 से अधिक आदिवासी समाधि स्थल पर पहुंचकर मामाजी को पुष्पांजलि के साथ-साथ चढ़ावा अर्पित करेंगे ,अधिकतर संख्या राजस्थान से आने वाले आदिवासियों की होगी। मध्य प्रदेश प्रशासन कोरोना की गाइडलाइन को लागू कराने को लेकर खासा
चिंतित नजर आ रहा है। अखबार छाप रहे हैं कि गाइड लाइन पर आस्था भारी पड़ती दिखाई दे रही है ।
गत 15 वर्षों से मैं यात्रा में शामिल होता रहा हूँ। परन्तु कोरोना से संक्रमित हो जाने के कारण इस वर्ष मैं बामनिया में नहीं रहूंगा।
मामा बालेश्वर दयाल जी देश के एकमात्र ऐसे शख्सियत है जिन के जीवनकाल में ही उनके नाम से यात्रा शुरू हो गई थी। यात्रा में शामिल होने वालों की संख्या लगातार पांच दशकों से बढ़ती। हुई देखी जा रही है। अब तक राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात में मामाजी की 200 से अधिक मूर्तियां आदिवासियों द्वारा स्थापित की गई है, जहां नियमित तौर पर मामा जी के अनुयायी इकट्ठे होते हैं, मामा जी के नाम पर पूजा पाठ की जाती है तथा भजन गाया जाता है। अर्थात मामाजी को देवता की तरह पूजा जाता है। मामा जी के विचारों का प्रचार-प्रसार करने वाले 5000 से अधिक आदिवासी भगत भीलांचल में सक्रिय है। मामा जी के द्वारा लिखे गीतों तथा मामा जी द्वारा भीली भाषा में लिखी गई रामचरितमानस, महाभारत और 85 कहानियां सुनाई जाती है। मामा जी ने भील भाषा में साप्ताहिक पंचायती राज, काम की बात, लोक प्रशासन नाम से अखबार अपनी प्रेस स्थापित कर निकाले। बीच-बीच में अखबार बंद हो जाने के कारण पंजीयन रद्द हो जाता था इस कारण उन्होंने ‘गोबर’ नाम से अखबार निकालना शुरू किया ताकि उसके टाइटल पर कोई दावा न करे।
मामा जी का जन्म 10 मार्च 1905 को उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के निवाड़ी कला में हुआ था। पढ़ाई के दौरान ही वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए थे। वे हॉकी के अच्छे खिलाड़ी थे। मामा जी ने सबसे पहली नौकरी ग्वालियर में कोऑपरेटिव इंस्पेक्टर की की थी लेकिन खद्दर और गांधी टोपी पहनने के कारण उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। बाद में उन्होंने खाचरोद, उज्जैन में नौकरी की ।
गांधीजी के आंदोलन से प्रभावित होकर उन्होंने भगवान सत्यनारायण की कथा में दलित व्यक्ति से प्रसाद बंटवाया, जिसके चलते उन्हें नौकरी से हाथ धोना पड़ा। मामा जी ने 1937 में डूंगर विद्यापीठ, भील आश्रम की स्थापना बामनिया में की तथा पहली वनवासी महिला चतुराबाई को शिक्षित किया बाद में 20 अन्य वनवासी महिलाओं को आश्रम में रखकर पढ़ाया। मामा जी के विद्यापीठ में 200 छात्राएं शिक्षा ग्रहण करती थी तथा आश्रम में ही निवास करती थी जिन्हें मामा जी स्वयं अन्य शिक्षकों के साथ खाना बनाने से लेकर पतंग उड़ाने और गुल्ली डंडा खेलना सिखाया करते थे।
मामा जी डॉ लोहिया से प्रभावित होकर 1948 में सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हुए। 1961 में लंबे समय के लिए सोशलिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय अध्य्क्ष चुने गए।
1977 में राज्य सभा के सदस्य चुने गए। 1990 में वी पी सिंह मामाजी को पुनः राज्य सभा मे भेजना चाहते थे परंतु वे तैयार नहीं हुए।
1952 में जब पहली बार आम चुनाव में मामा जी ने घोषणा की कि, “आदिवासी लड़की का राज नहीं तो, हमारा नाम भी बालेश्वर दयाल नहीं” । उन्होंने यशोदा बेन को बांसवाड़ा राजस्थान अमझेरा निवासी जमुना देवी को झाबुआ से चुनाव जिताया। बाद में 15 से अधिक विधायक और सांसद मामाजी के नाम लेकर चुनाव जीते।
महिलाओं को उम्मीदवार बनाए जाने को लेकर मामाजी से तमाम सवाल पूछे गए। विपक्षियों ने पर्चे छापे कि मामा जी ने आदिवासियों की मूंछ उखाड़ ली है। मर्दों के रहते औरतों को खड़ा कर दिया,औरतें राजकाज चलाना क्या जाने ?यह उस समय की धारणा थी जब मामा जी कहा करते थे कि महिला ही मुल्क की मूल संस्कृति का आधार है। उन्होंने महिला शिक्षा, महिलाओं को समान अधिकार, शराबबंदी, दहेज ऐसे मुद्दों को बहुत प्रभावशाली ढंग से उठाया। मामा जी महिलाओं को लेकर सभाओं में कहते थे कि धरती की कोख से निकली मातृत्व शक्ति को पहचानो। ताकत, बल, श्रम की देवी कालका आपके खेतों में हल चलाकर हृदय की देवी मां अंबे धन धान्या उपजाकर, मन मस्तिष्क की देवी मां लक्ष्मी ही घर का संचालन करती है जिससे परिवार समृद्ध और राष्ट्र मजबूत होता है इसलिए महिलाओं का सम्मान करो।
मामा जी ने आदिवासियों को जल, जंगल, जमीन का मालिकाना हक दिलाने, सिंचाई व्यवस्था कराने के साथ-साथ किसानों की कर्जा मुक्ति, फसल बीमा को राष्ट्रव्यापी, गांव को इकाई बनाकर शिक्षा, स्वास्थ्य, कुटीर उद्योग, मनोरंजन की सर्व संपन्न इकाई बनाने को लेकर आंदोलन चलाए। मामा जी द्वारा पहले राजशाही को लेकर जो आंदोलन चलाए गए उसके चलते छह रियासतों से निकाला गया। मामा जी द्वारा भीलांचल से जो जमीदारी प्रथा के उन्मूलन के लिए आंदोलन छेड़ा गया उंसका विस्तार पूरे देश मे हुआ ।
परिणामस्वरूप जमीदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ।
मामा जी ने भीलांचल में स्वतंत्रता के पूर्व और स्वतंत्रता मिलने के बाद सतत आंदोलन चलाकर आदिवासियों के बीच समाजवाद और सत्याग्रह का विचार इतनी गहराई तक पहुंचा दिया कि देश के अधिकतर आदिवासी इलाकों में नक्सलवाद और माओवाद पनपा लेकिन भीलांचल में नहीं।
मामा जी को लेकर अब तक 10 से अधिक छात्र/छात्राओं द्वारा शोध प्रबंध विभिन्न महाविद्यालय ,विश्वविद्यालय में जमा कर पी एच डी की
डिग्रियां हासिल की गई है । मामा जी कहते थे, अपना सपना तय करो, दृढ़ संकल्प से सपनों को हकीकत में बदलो, अपना संगठन बनाओ। मामा जी का कहना था कि गैर कांग्रेस की जो सरकारें बनी वह गांधी -लोहिया -जयप्रकाश की देन थी लेकिन यह इसलिए नहीं चल पाईं क्योंकि पार्टी के संगठन का सरकार पर मजबूत नियंत्रण नहीं था। मामाजी जनता दल का बिखराव होने के बाद राजनीति से अलग हो गए थे। लेकिन वे समाजवादी विचार की पार्टियों का समर्थन करते थे। मामाजी समाजवादी एकजुटता के हिमायती थे। वे बीमारी के दिनों में भी सुरेंद्र मोहन जी और जॉर्ज फर्नाडिजजी को समाजवादी एकजुटता को लेकर पत्र लिखा करते थे।
मामा जी का सपना था कि बामनिया में आयुर्वेदिक चिकित्सालय बने, जिसमें आदिवासियों का निशुल्क इलाज हो। मामा जी की पहल पर क्षेत्र की 250 जड़ी बूटियों की पहचान भी हुई थी।
भील आश्रम अब तक सरकार की उपेक्षा का शिकार रहा है। बामनिया का नाम मामा बालेश्ववर दयाल नगर कराने ,मामा जी की झाबुआ कलेक्टरेट में मूर्ति लगाने
मामा जी का स्मारक निर्माण से लेकर मामा जी को भारत रत्न देने का मुद्दा हर 25 को अनुयायियों द्वारा उठाया जाता है। लेकिन स्थिति यथावत बनी हुई है।
