ऐश्वर्या शर्मा/ मनीष तिवारी
बॉलीवुड एक्ट्रेस प्रियंका चोपड़ा ने बेबाकी से कहा था कि मुझे बॉलीवुड में कभी भी मेल एक्टर के बराबर फीस नहीं मिली। मेल को-स्टार की सैलरी की 10% ही फीस मुझे मिलती। ये गैप आज भी बना हुआ है।
अब जरा कंगना रनोट की बात भी सुनें- ‘फिल्म की सफलता की गारंटी कोई नहीं ले सकता तो पैसों के मामले में एक्टर-एक्ट्रेस के बीच इतना भेदभाव क्यों? मैं मेल एक्टर्स से ज्यादा पैसा डिजर्व करती हूं।’
ये तो रही भारत की बात, अब जरा विदेश चलते हैं जहां जेंडर सैलरी गैप को लेकर हॉलीवुड एक्ट्रेस सलमा हायक ने कहा-महिलाएं विश्व की 66% वर्कफोर्स हैं लेकिन हमें दुनिया की आय का केवल 10% ही मिलता है। यह बेहद दुखद है।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा तो एक जैसे काम के लिए महिलाओं को कम सैलरी देने को देश और समाज का नुकसान मानते हैं। उनका कहना है कि महिला-पुरुषों के बीच सैलरी गैप अमेरिकी मूल्यों का अपमान है। जब तक ऐसा रहेगा, तब तक देश का कारोबार, समाज और राष्ट्र नुकसान झेलता रहेगा।
भारत में सोशल एक्टिविस्ट कमला भसीन ने कहा था, ‘कुदरत ने पुरुष और महिला में फर्क कम किया है, उनमें समानताएं ज्यादा हैं। पुरुषों को शारीरिक रूप से पावरफुल समझा गया और समाज पुरुष प्रधान बन गया।’
दुनिया में 72% पुरुष और सिर्फ 47% महिलाएं कर रहीं नौकरी
पावर के इस खेल ने जब जॉब सेक्टर में एंट्री ली। इससे महिला और पुरुष के बीच की खाई गहरी होती चली गई। ‘इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन’ के अनुसार दुनिया में जहां 72% पुरुष जॉब कर रहे हैं, वहीं महिलाएं 47% ही नौकरीपेशा हैं। उनकी सैलरी पुरुषों के मुकाबले आधी भी नहीं है।
भारत में महिला कर्मचारी पुरुष कर्मचारियों के मुकाबले 35% तक कम सैलरी पा रही हैं। यह सैलरी गैप हर क्षेत्र में है। हालांकि, इस दिशा में कुछ कंपनियों ने महिलाओं के हक में कदम उठाए हैं। टेक महिंद्रा, डॉबर, अडोब इंडिया, एमफेसिस जैसी कुछ प्राइवेट कंपनियों ने जेंडर सैलरी गैप की दीवार को तोड़ा और महिलाओं को पुरुषों के समान वेतन देना शुरू किया। सिर्फ सरकारी नौकरियों ही हैं, जहां महिलाओं और पुरुषों को समान वेतन मिलता है।
2022 में BCCI ने अपने कॉन्ट्रैक्ट में पुरुष और महिला क्रिकेटरों को बराबर मैच फीस देने की घोषणा की।
सदियों से जारी भेदभाव, 150 साल पहले शुरू हुई बराबर सैलरी की बात
यूरोप से लेकर अमेरिका तक दुनिया के सारे देशों में महिला कर्मचारियों को पुरुषों से कम पैसे देने का सिलसिला थमता नहीं दिखा, तो इसके खिलाफ आवाज उठनी शुरू हुई। 1869 में अमेरिका के न्यू यॉर्क टाइम्स में छपे एक लेटर में सवाल उठाया गया कि आखिर सरकारी महिला कर्मचारियों को पुरुष कर्मचारियों की तुलना में कम सैलरी क्यों दी जाती है। 1888 में ब्रिटेन में फीमेल ट्रेड यूनियन लीडर क्लेमेंटिना ब्लैक ने देशभर में घूमकर महिलाओं को जागरूक करना शुरू किया और ट्रेड यूनियन कांग्रेस में समान काम, समान सैलरी के लिए आवाज बुलंद की।
दिल्ली यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. तारा शंकर बताते हैं कि 1950-60 के दशक में अमेरिका में पहली बार फेमिनिज्म वेव की 4-5 मांगों में से एक बराबर सैलरी की मांग भी थी। तब महिलाओं को पुरुषों से आधा वेतन मिलता। आंदोलन के बाद सरकारों ने कानून बनाए और सैलरी में गैप काफी हद तक कम हुआ।
प्यू रिसर्च के मुताबिक आज भी अमेरिका में महिलाओं को पुरुषों से 18 फीसदी कम सैलरी मिल रही है। वहां के रूल्स और ह्यूमन राइट्स बहुत मजबूत हैं। इसलिए प्राइवेट कंपनियों पर भी जेंडर पे गैप कम करने का बहुत दबाव है।
विदेश की तुलना में भारतीय महिलाओं को बराबर सैलरी न मिल पाने की कई दूसरी वजहें भी हैं। एक तो भारत में महिला आंदोलन ने कभी इतना जोर नहीं पकड़ा। सोशल मीडिया ने इन मुद्दों को हवा दी। महिलाओं की सैलरी कम होने के पीछे सोसायटी भी अहम रोल अदा करती रही है। साथ ही जाति और जेंडर का भी इसमें योगदान है।
एकजुट होकर नहीं लड़ पातीं महिलाएं, पावर गेम में मात खा रहीं महिलाएं
डॉ. तारा शंकर कहते हैं कि पुरुष आसानी से यूनियन बनाकर अपनी मांगों के लिए लड़ते हैं। उन्हें दूसरी कंपनियों और अपने आसपास हो रहे बदलावों की जानकारी रहती है। जबकि महिलाएं यहां पिछड़ जाती हैं। वे संगठित होकर अपनी मांग नहीं रख पाती हैं। न ही उनकी परिस्थितियां उनका साथ देती हैं। जेंडर पे गैप की एक बड़ी वजह पावर गेम भी है। दुनिया भर में पुरुष महिलाओं के हाथ में ताकत नहीं आने देना चाहते। इंडिया में यह पावर गेम बहुत भद्दी शक्ल ले लेता है। पुरुषों की कुंठा साफ नजर आती है जब वे पीरियड लीव और चाइल्ड केयर लीव देने को लेकर बहस करते हैं।
पुरुषों में कानून का डर महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकता है
डॉ. तारा बताते हैं कि महिलाओं को कंपनियों, फैक्ट्रियों में सेक्शुअल हैरासमेंट से बचाने के लिए विशाखा गाइडलाइंस का पालन करना पड़ता है, शिकायतें सुनने के लिए कमिटी बनानी पड़ती है। जिसका तोड़ निकाला गया कि महिलाओं को नौकरी पर रखो ही मत। कोई महिला कर्मचारी शिकायत करेगी, तो ऊपर से लेकर नीचे तक सबकी नौकरी खतरे में आ जाएगी, मामला सोशल मीडिया में आ जाएगा। इस कारण सीनियर लेवल पर बैठे पुरुष महिलाओं को नौकरी देने से बचने लगे हैं। अगर कोई फीमेल कैंडिडेट दलित हो तो उसके पीछे रह जाने की आशंका और बढ़ जाती है। उसकी रक्षा के लिए बने कानूनों का उल्टा असर भी होता है।
‘ऑक्यूपेशनल सेग्रीगेशन’ से भेदभाव, महिलाओं के सेक्टर में भी पुरुष आगे
कामों का बंटवारा जेंडर के मुताबिक होने के बावजूद पुरुष नर्सिंग जैसे वुमन सेंट्रिक पेशे में हों तो उन्हें महिलाओं से ज्यादा सैलरी मिलती है, जबकि मेल सेंट्रिक नौकरियों में महिलाओं को लिया ही नहीं जाता। अगर नौकरी मिले भी तो उनकी सैलरी पुरुषों से कम होती है। शेफ, हेल्थकेयर, टीचिंग और सोशल वर्क जैसी नौकरियों में जहां पुरुषों की संख्या बढ़ी है, उनकी सैलरी भी महिलाओं के मुकाबले तेजी से बढ़ती है। पुरुष एकजुट होकर पैसा बढ़वा लेते हैं। मॉन्स्टर सैलरी इंडेक्स रिपोर्ट कहती है कि इन क्षेत्रों में पुरुषों को महिलाओं के मुकाबले 21% ज्यादा सैलरी मिलती है।
शादीशुदा महिलाओं की डबल ड्यूटी, मदरहुड के बदले मिलती है कम सैलरी
एचआर स्मिता ओमर कहती हैं कि शादीशुदा महिलाओं को डबल-ट्रिपल ड्यूटी करनी पड़ती है। उन्हें घर, बच्चा और करियर संभालना होता है। जॉब देते समय कंपनियां इन मुद्दों पर बात करती हैं जो महिलाओं की बार्गेनिंग पावर छीनती है और उन्हें कम सैलरी ऑफर की जाती है।
महिलाओं के लिए मदरहुड भी सजा बन जाती है। कंपनियों को फीमेल वर्कर को कानूनी तौर पर मैटरनिटी लीव देनी पड़ती है। इसलिए पेनल्टी के तौर पर उन्हें पहले ही कम सैलरी ऑफर की जाती है। प्रेग्नेंट महिलाओं को नौकरी तलाशने में बड़ी दिक्कत होती है। महिला मां है तो उनकी परफॉर्मेंस और काबिलियत पर सवाल किए जाते हैं।
कंपनियां चाहती हैं कि कर्मचारी ओवरटाइम करें या काम लेकर घर भी जाएं। लेकिन, वर्किंग मदर को घर पर बच्चे की देखभाल भी करनी पड़ती है। इसलिए उनसे उतना ज्यादा काम करवा पाना मुश्किल होता है। इस कारण पुरुषों और अनमैरिड लड़कियों की तुलना में उनकी सैलरी सबसे कम बढ़ती है।
US की जॉइंट इकोनोमिक कमिटी 2014 की रिपोर्ट के अनुसार महिलाओं को तो पुरुषों से पीछा रखा ही जाता है लेकिन जो वर्किंग मॉम को सिंगल वर्किंग वुमन से भी पीछे कर दिया जाता है। वर्किंग मदर्स को सिंगल वर्किंग वुमन से 3% और पुरुषों से 15% कम वेतन मिलता है।
पुरुषों को नहीं पसंद फीमेल बॉस, ग्लास सीलिंग से रोक देते हैं पावर
कंपनियों में जब डिसीजन मेकिंग का चार्ट तैयार किया जाता है, तो जानबूझकर महिलाओं की संख्या वहां कम रखी जाती है। निर्णायक मंडल बनाने वाले ज्यादातर पुरुष होते हैं और वे अपनी बराबरी में किसी महिला को देखना पसंद नहीं करते।
ज्यादातर सर्वे में यह बात भी देखने को मिली है कि पुरुषों को महिला बॉस को रिपोर्ट करना, उसके आदेश और डांट बर्दाश्त नहीं होती। इसलिए भी महिलाएं कंपनियों के मैनेजमेंट बोर्ड में नजर नहीं आती हैं। कंपनियां काबिल होने के बावजूद महिलाओं ज्यादा जिम्मेदारियों वाली पावरफुल पोजिशन नहीं देतीं। इसे ग्लास सीलिंग कहते हैं। भेदभाव के चलते उनकी पावर सील कर दी जाती है। यह ज्यादातर ऑर्गेनाइजेशन में देखने को मिलता है। पुरुषों को यह गलतफहमी भी होती है कि महिलाएं अपनी काबिलियत के बूते बॉस नहीं बनीं। उन्हें महिला होने का फायदा मिला है। महिलाएं अगर अपनी मेहनत और अनुभव से बॉस बन जाए तो कई पुरुष उनका सम्मान और सहयोग नहीं करते।
कम सैलरी का विरोध नहीं कर पातीं फीमेल बॉस
क्राइम अगेंस्ट वुमन जैसे मुद्दे पर शोध कर चुके डॉ. तारा बताते हैं कि अगर महिलाएं टॉप पोजिशन पर पहुंच भी जाएं, लेकिन उसी पोजिशन के लिए कंपनी पुरुषों को ज्यादा सैलरी देती हैं। भले ही दोनों बराबर काबिल हों। ऐसी स्थिति में महिलाएं विरोध भी नहीं कर पाती हैं। क्योंकि, वे मुश्किलें झेलते हुए इतनी महिलाओं के बीच से अकेले टॉप पर पहुंची हैं और यही उनके अभूतपूर्व हो जाता है। उन्हें डर होता है कि कम सैलरी का विरोध करने से नौकरी खतरे में पड़ सकती है। बॉस होने के बावजूद वे मन मसोसकर चुप रह जाती हैं, क्योंकि उनके पास जॉब के ऑप्शंस बहुत कम होते हैं, लेकिन अब धीरे-धीरे ये बदल रहा है।
प्राइवेट कंपनियां नहीं मानतीं नियम, आधी सैलरी पर भी तैयार हो जाती हैं महिलाएं
कुछ बड़ी कंपनियां जेंडर पे गैप काफी हद तक कम कर चुकी हैं। सेक्स रेश्यो भी बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन, 95 फीसदी नौकरियां छोटी कंपनियां देती हैं। इन कंपनियों पर किसी की नजर नहीं जाती। इसलिए वहां सुधार भी नहीं होता। एक कंपनी की महिला एचआर ने अपना नाम न देने की शर्त पर कहा कि जाति या जेंडर के आधार पर सैलरी में भेदभाव न करने का कानून भी है, लेकिन कोई उसपर ध्यान नहीं देता।
महिलाएं जॉब घर के पास ढूंढती हैं। यह बात कंपनियां भी समझती हैं। इसलिए वे इसका फायदा उठाकर उन्हें कम सैलरी ऑफर करती हैं। कई बार तो महिलाएं पुरुषों के मुकाबले आधी सैलरी पर काम करने को तैयार हो जाती हैं।
समाज की सोच और पॉलिसीज में कमी से नौकरियों से नदारद हो रहीं महिलाएं
जॉब में फ्लैक्सिबिलिटी न मिलने के कारण भी लड़कियों को करियर से ब्रेक लेना पड़ता है। लिंक्डइन के एक सर्वे के मुताबिक कोविड महामारी के बाद नौकरी छोड़ने वाली 70 फीसदी महिलाओं ने इसकी वजह कंपनियों में फ्लैक्सिबल पॉलिसीज न होना बताईं। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के मुताबिक देश में 2020-21 में सिर्फ 32 फीसदी विवाहित महिलाओं के पास रोजगार है। 68 फीसदी शादीशुदा महिलाओं की जिंदगी चूल्हे-चौके तक सिमटी हुई है।
दुनिया के सारे देशों को संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स पूरे करने हैं। इनमें से एक लक्ष्य जेंडर पे गैप कम करने का भी है। लेकिन, अभी सैलरी कम देने के लिए सजा का प्रावधान नहीं है।
देश और कंपनियों के लिए मुनाफे का सौदा
ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका में हुए अलग-अलग सर्वे में यह बात सामने आई कि अगर जेंडर पे गैप खत्म कर दिया जाए तो जीडीपी में 10 से 15 फीसदी तक की ग्रोथ हो जाएगी। रिसर्च के मुताबिक-
- डायवर्सिटी हमेशा कंपनियों के लिए फायदेमंद साबित होती है।
- जिन कंपनियों में सभी जातियों, धर्म और जेंडर के लोग हैं, उनकी प्रोडक्टिविटी दूसरी कंपनियों की तुलना में हमेशा बेहतर होती है।
- जहां डायवर्सिटी ज्यादा होती है, वहां भेदभाव की आशंका कम हो जाती है।
- विविधता से माहौल बेहतर होता है और अच्छा काम करने वाले लोगों की संख्या भी बढ़ जाती है।
- 500 फॉर्च्यून कंपनियां जेंडर पे गैप कम कर रही हैं और वर्कफोर्स में डायवर्सिटी ला रही हैं।
रिजर्वेशन से डायवर्सिटी बढ़ा रहीं कंपनियां
एक मल्टीनेशनल कंपनी में एचआर स्मिता ओमर बताती हैं कि अब बड़ी विदेशी कंपनियां अपने यहां जेंडर पे गैप को दूर करने में जुटी हुई हैं। वे अपने यहां एथनिक, जेंडर और सेक्शुअल डायवर्सिटी को बढ़ावा देते हुए रिजर्वेशन भी लागू कर रही हैं। स्मिता कहती हैं कि भारतीय कंपनियां अभी इस तरह उतना ध्यान नहीं दे रही हैं। इसकी वजहें भारतीय समाज की सोच और बुनावट से जुड़ी हुई हैं।
क्या कहती हैं बिजनेस वुमन
बिजनेस कंसल्टिंग फर्म 12101 की को-फाउंडर रिद्धि गुप्ता कहती हैं कि लग्जरी लाइफस्टाइल समेत कई इंडस्ट्रीज में महिलाएं बिजनेस को अच्छे से लीड कर रही हैं। सैलरी काबिलियत के मुताबिक मिलनी चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई लड़का है या लड़की। इसका फायदा कंपनी को भी मिलेगा। कंपनी छोड़ने वालों की संख्या 50 फीसदी तक घट जाएगी।
इसी तरह, स्टेम मेटावर्स की को-फाउंडर और सीईओ रितिका अमित कुमार कहती हैं कि महिलाएं अपनी बात मजबूती के साथ नहीं रख पाती हैं, न निगोशिएट कर पाती हैं। समान काम के लिए महिलाओं को समान वेतन देने का मतलब है उन्हें बराबर की इज्जत देना है, जो वे डिजर्व करती हैं। जब कर्मचारियों को फायदा मिलेगा तो कंपनियों को भी मुनाफा होगा।
पॉलिसी मेकिंग के लेवल पर भी पॉलिटिक्स का शिकार महिलाएं
स्कॉटलैंड की प्रथम मंत्री निकोला स्टर्जन ने इसी साल फरवरी में इस्तीफा दिया। इनसे पहले न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री जेसिंडा अर्डर्न ने 25 जनवरी को अपना पद छोड़ दिया था। दोनों मंत्रियों के पीछे हटने की वजह थी पुरुषों से सियासी चुनौती। एक शोध के अनुसार महिलाओं को वर्कप्लेस पर मेल को-वर्कर की तुलना में ज्यादा दुश्मनी का सामना करना पड़ता है।
समान काम के लिए समान वेतन का बेअसर कानून
अमेरिका: 1963 में इक्यूअल पे एक्ट बना। भेदभाव करने पर 10 हजार डॉलर तक जुर्माना और 6 महीने की जेल या दोनों का प्रावधान।
भारत: समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 में पास हुआ। सजा के तौर पर 10 हजार रुपए तक जुर्माना और 3 महीने की जेल संभव।
ब्रिटेन: 1970 में इक्वल पे एक्ट बना। 2010 में इसे इसका नाम इक्वैलिटी एक्ट पड़ा। इस कानून के तहत 5000 यूरो तक का जुर्माना है।
हमारे देश में समान पारिश्रमिक अधिनियम भले ही 1976 में पास किया गया हो लेकिन इतने साल बीतने के बाद भी जब भुगतान की बात आती है तो असमानता आ जाती है। सैलरी गैप के पीछे महज एक सोच है। इसका कोई तर्क नहीं है। महिला पुरुषों के साथ कंधों से कंधा मिलाकर काम कर रही है। पूरी ईमानदारी से अपनी ड्यूटी निभाती हैं ऐसे में जरूरी है मानसिकता बदलना और नारीशक्ति को सम्मान देना।

