आरती शर्मा
दुनिया में कई अनोखी परंपराएं हैं, लेकिन नामीबिया की हिंबा जनजाति की परंपरा सबसे अलग है. इस जनजाति के लोग पानी से नहाना छोड़ चुके हैं.
नहाने से कोई इंसान बदसूरत नहीं हो जाता. यहां की फीमेल स्वर्ग की परी जैसी सुंदर हैं और दिव्य महक की मालकिन भी.
उनका मानना है कि पानी की बचत जरूरी है और शरीर को साफ रखने के लिए अन्य प्राकृतिक तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है. इसी वजह से वे जड़ी-बूटियों के धुएं से स्नान करते हैं। यह तरीका उन्हें साफ-सुथरा और स्वस्थ रखता है.
*धुएं और लोशन का खास प्रयोग :*
हिंबा जनजाति के लोग विभिन्न जड़ी-बूटियों को जलाकर निकलने वाले धुएं से शरीर को साफ करते हैं. यह धुआं शरीर से बैक्टीरिया और गंदगी को दूर करता है. इसके अलावा वे एक खास तरह का लोशन भी लगाते हैं जो पशुओं की चर्बी और हेमाटाइट नामक मिनरल से बनाया जाता है. यह लोशन उनकी त्वचा को नमी देता है, सूरज की तेज किरणों से बचाता है और कीड़ों को भी दूर रखता है.
*शादी के दिन ही पानी से स्नान की रश्म :*
हिंबा महिलाओं के लिए पानी से स्नान करना एक बहुत बड़ी रस्म माना जाता है. माना जाता है कि महिलाएं केवल अपनी शादी के दिन ही पानी से नहाती हैं.
उसके बाद वे केवल धुएं और लोशन से ही अपनी स्वच्छता बनाए रखती हैं. यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी लोग इसे निभा रहे हैं.
*मां बनने की अनूठी परम्परा :*
हिंबा जनजाति में मां बनने की तैयारी भी खास तरीके से की जाती है. गर्भधारण से पहले महिलाओं को बच्चों से जुड़े गीत सुनने और खुद नए गीत बनाने की सलाह दी जाती है.
महिला अपने साथी को यह गीत सुनाती है और दोनों मिलकर इसे गाते हैं. गर्भावस्था के दौरान यह गीत दूसरी महिलाओं को भी सिखाया जाता है और बच्चे के जन्म पर भी गाया जाता है. यही गीत बच्चे की पूरी जिंदगी में अलग-अलग अवसरों पर गाया जाता है.
*प्राचीनता और आधुनिकता का संगम :*
हिंबा जनजाति अपने प्राचीन पारंपरिक रीति-रिवाजों को मानती है, लेकिन आधुनिक दुनिया से भी तालमेल बैठा रही है. वे अपनी अनूठी जीवनशैली को बनाए रखते हुए शिक्षा और अन्य सुविधाओं की ओर भी बढ़ रहे हैं.
उनकी परंपराएं दुनिया को यह संदेश देती हैं कि स्वच्छता और स्वास्थ्य केवल पानी से ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक तरीकों से भी संभव है.
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