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महिला दिवस विशेष…प्रेरणा बन रहीं नए भारत की नारी शक्ति

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यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:
अर्थात् जहां पर नारियों की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। जहां पर ऐसा नहीं होता है वहां पर सभी कार्य
निष्फल होते हैं।

भारतीय संस्कृति में नारी सम्मान की संपूर्णता मात्र इस एक श्लोक से ही स्पष्ट हो जाती है। महिला शक्ति के बिना किसी राष्ट्र
की समृद्धि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ऐसे में केवल नारी उत्थान नहीं, नारी के नेतृत्व में विकास की दृष्टि बीते चंद
वर्षों में राष्ट्र की नीति बनी है। साथ ही, इसमें केंद्र सरकार की संवेदनशील सोच ने समाज में जन-जन को जागृत भी किया है
और अब बेटियां अभिमान बनकर उभर रही हैं। लोग अब बेटियों को आत्मनिर्भरता की उड़ान भरते देखना चाहते हैं। यही
वजह है कि न्यू इंडिया में आज देश की बेटियां हर क्षेत्र में अपना परचम फहरा रही है। आइए जानते हैं कि आजादी के अमृत
महोत्सव वर्ष में जब दुनिया अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस (8 मार्च) मना रही है तो महिला शक्ति की आकांक्षाओं को कैसे नए
भारत में मिल रही है नई उड़ान…

बेटियों को खिलने दो,
उन्हें हंसने दो, मुस्कराने दो।
उन्हें भी पढ़ने दो,
आसमान अपने नाम करने दो।
संवर उठेगा समाज,
जब बेटियों को मिलेगी शक्ति।
बढ़ेगा देश,
जब साथ होगी आत्मनिर्भर नारी शक्ति।
बेटियों की आगे बढ़ने की ललक
अब पूरी हो रही है।
कुछ कर दिखाने के जज्बे को
अब जमीन मिल रही है।
सेना हो या स्टार्टअप,
ओलंपिक हो या रिसर्च
या फिर आइटी इनोवेशन,

बेटियों का हो रहा है आर्थिक सशक्तीकरण,
गर्व कर रहा है पूरा राष्ट्र।
हर बंधन हर बाधा को पार करो,
कोई रुकावट तुम्हें नहीं रोक सकती।
देश को नई ऊंचाई पर ले जाएगी
हमारी बेटियों की सामूहिक शक्ति।

शब्दों में पिरोई गई ये चंद पंक्तियां नए भारत की अमृत यात्रा का यथार्थ बन रही हैं। समग्र दृष्टिकोण के साथ महिला शक्ति
को केंद्रीय भूमिका में लाने के केंद्र सरकार के अथक प्रयासों का ही परिणाम है कि आज राजपथ पर गणतंत्र दिवस परेड का
नेतृत्व हो या सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान राफेल उड़ाना या मोर्चे पर दुश्मनों से मुकाबला करना या खेल जगत के क्षेत्र में
देश का नाम रोशन करना या फिर स्वरोजगार के अवसरों का लाभ उठाकर बराबरी के साथ देश की आर्थिक तरक्की को संबल
देना, महिला शक्ति पुरुषों के साथ सिर्फ कंधे से कंधा मिलाकर नहीं बल्कि उनसे कहीं आगे निकल राष्ट्र का अभिमान बन रही
हैं।। महिलाओं ने अपनी अद्भूत क्षमता से यह साबित कर दिखाया है कि अगर उन्हें समान अवसर मिले तो सिर्फ घर ही
नहीं, एक समृद्ध, गौरवशाली राष्ट्र का भी निर्माण कर सकती हैं।
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष की रिपोर्ट के मुताबिक पुरुषों के समान महिलाओं की कार्यबल में हिस्सेदारी से भारत की जीडीपी में
27 प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है। यदि 50 प्रतिशत कुशल महिलाएं कार्यबल में शामिल होती हैं, तो विकास दर 1.5
प्रतिशत बढ़कर 9 प्रतिशत प्रति वर्ष हो सकता है। नए भारत में महिलाओं को श्रम बल में शामिल किए जाने की आवश्यकता
ही है कि केंद्र सरकार निरंतर महिलाओं को समानता के अवसर और सुरक्षित वातावरण देने के लिए नए संकल्पों के साथ
नित नई-नई पहल कर रही है। किसी भी संकल्प के साथ साधना जुड़ जाती है और मानव मात्र के साथ ममभाव जुड़ जाता है
तो एक नए कालखंड का जन्म होता है, नया सवेरा होता है। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका
प्रयास’ यही अमृतभाव आज अमृत महोत्सव में नए भारत के लिए उमड़ रहा है। इसी कर्तव्यभाव से करोड़ों देशवासी आज
स्वर्णिम भारत की नींव रख रहे हैं। हमसे ही राष्ट्र का अस्तित्व है, और राष्ट्र से ही हमारा अस्तित्व है। ये भाव नए भारत के
निर्माण में भारतवासियों की सबसे बड़ी ताकत बन रहा है। केंद्र सरकार के प्रयासों से एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण हो रहा
है जिसमें भेदभाव की कोई जगह नहीं है। एक ऐसे समाज का निर्माण हो रहा है जहां समानता और सामाजिक न्याय की
बुनियाद मजबूत हो रही है।
महिला सशक्तीकरण: नया अध्याय, नए आयाम
एक समय था जब देश में महिला सशक्तीकरण को सीमित दायरे में देखा जाता था। गांव और गरीब परिवारों की महिलाएं
इससे दूर थीं। लेकिन बीते कुछ वर्षों में इस भेद को खत्म करने के लिए भी केंद्र सरकार ने काम किया है। आज महिला
सशक्तीकरण का चेहरा वो 9 करोड़ गरीब महिलाएं भी हैं जिन्हें पहली बार गैस कनैक्शन मिला है और धुएं वाली रसोई से
आजादी मिली है। आज महिला सशक्तीकरण का चेहरा वो करोड़ों माताएं-बहनें भी हैं जिन्हें स्वच्छ भारत मिशन के तहत
उनके घर में शौचालय मिला है, जिसको उत्तर प्रदेश में इज्जत घर कहा जाता है, जिन्हें अपने सर पर पहली बार प्रधानमंत्री
आवास योजना के तहत पक्के मकान का ही नहीं बल्कि उसका मालिकाना हक भी मिला है। इसी तरह, करोड़ों महिलाओं को
गर्भावस्था और प्रसव के समय सहायता मिलती है, करोड़ों महिलाओं को अपना जनधन बैंक खाता मिला है और जब सरकार
की सब्सिडी सीधे महिलाओं के बैंक खातों में जाती है, तो ये महिलाएं, महिला सशक्तीकरण और बदलते हुये भारत का चेहरा
बनती हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं, “दुनिया जब अंधकार के गहरे दौर में थी, महिलाओं को लेकर पुरानी सोच में जकड़ी थी, तब
भारत मातृशक्ति की पूजा, देवी के रूप में करता था। हमारे यहां गार्गी, मैत्रेयी, अनुसूया, अरुंधति और मदालसा जैसी
विदुषियां समाज को ज्ञान देती थीं। कठिनाइयों से भरे मध्यकाल में भी इस देश में पन्नाधाय और मीराबाई जैसी महान
नारियां हुई। और अमृत महोत्सव में देश जिस स्वाधीनता संग्राम के इतिहास को याद कर रहा है, उसमें भी कितनी ही
महिलाओं ने अपने बलिदान दिये हैं। कित्तूर की रानी चेनम्मा, मतंगिनी हाजरा, रानी लक्ष्मीबाई, वीरांगना झलकारी बाई से
लेकर सामाजिक क्षेत्र में अहल्याबाई होल्कर और सावित्रीबाई फुले तक, इन देवियों ने भारत की पहचान बनाए रखी।”
आत्मनिर्भर भारत के केंद्र में नारी

भारत की नारी शक्ति का आत्मविश्वास आज बढ़ा है और अब वह खुद अपने भविष्य का निर्धारण कर देश के भविष्य को
दिशा दे रही हैं। पहले जब कभी बिजनेस की बात होती थी, तो उसका यही मतलब निकाला जाता था कि बड़े कॉरपोरेट और
पुरुषों के काम की बात हो रही है। लेकिन सच्चाई ये है कि सदियों से भारत की ताकत हमेशा छोटे एमएसएमई के रूप में
स्थानीय उद्योग रहे हैं। इन उद्योगों में जितनी भूमिका पुरुषों की होती है, उतनी ही महिलाओं की होती है। टेक्सटाइल
इंडस्ट्री हो या पॉटरी, कृषि या दुग्ध उत्पाद से जुड़े उद्योग, इनका आधार महिलाशक्ति और महिला कौशल ही है। जबकि
पुरानी सोच वालों ने महिलाओं के कौशल को घरेलू कामकाज का ही विषय मान लिया था। देश की अर्थव्यवस्था को आगे
बढ़ाने के लिए इस पुरानी सोच को बदलना जरूरी है। ‘मेक इन इंडिया’ आज यही काम कर रहा है। आत्मनिर्भर भारत
अभियान महिलाओं की इसी क्षमता को देश के विकास के साथ जोड़ रहा है। इसी का परिणाम है कि आज मुद्रा योजना की
लगभग 70 प्रतिशत लाभार्थी महिलाएं हैं। करोड़ों महिलाओं ने इस योजना की मदद से अपना काम शुरू किया है और दूसरों
को भी रोजगार दे रही हैं। इसी तरह, महिलाओं में स्वयं सहायता समूहों के जरिए उद्यमिता को बढ़ाने के लिए दीन दयाल
अंत्योदय योजना चलाई जा रही है। देश की महिलाओं का उत्साह और सामर्थ्य इतना है कि बीते 6-7 सालों में स्वयं
सहायता समूहों की संख्या तीन गुना बढ़ गई है। यही प्रगति भारत के स्टार्टअप ईको-सिस्टम में भी देखने को मिल रहा है। वर्ष
2016 से देश में 56 अलग-अलग सेक्टर्स में 60 हजार से ज्यादा नए स्टार्टअप बने हैं। इनमें से 45 प्रतिशत में कम से कम एक
निदेशक महिला है।
समान अवसर से बदली तस्वीर
सम्मान और समान अवसर मिले तो महिला शक्ति का योगदान कितना बड़ा हो सकता है, इसकी झलक दिखने लगी है।
‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ ‘सुकन्या समृद्धि’ जैसी योजनाओं ने लिंगानुपात में क्रांतिकारी बदलाव किया है। पहली बार
प्रति एक हजार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या 1020 तक पहुंची है। स्कूलों से लड़कियों के ड्रॉप आउट की दर कम हुई
है, क्योंकि इन अभियानों से महिलाएं खुद जुड़ी हैं। यह भारत की मिट्टी का असर है कि जब नारी कुछ ठान लेती है, तो उसकी
दिशा नारी ही तय करती है। कम उम्र में शादी बेटियों की पढ़ाई और करियर में बाधा न बने, इसके लिए बेटियों की शादी की
उम्र को 21 साल करने का प्रयास है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का शुभारंभ करते हुए सात साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी ने कहा था, “भारत का प्रधानमंत्री एक भिक्षुक बनकर आपसे बेटियों की जिंदगी की भीख मांग रहा है। बेटियों को
अपने परिवार का गर्व मानें, राष्ट्र का सम्मान मानें। आप देखिए इस असंतुलन से हम बहुत तेजी से बाहर आ सकते हैं। बेटा
और बेटी दोनों वो पंख है जिसके बिना जीवन की ऊंचाईयों को पाने की कोई संभावना नहीं है। इसलिए ऊंची उड़ान भरनी है
तो सपनों को बेटे और बेटी दोनों पंख चाहिए तभी तो सपने पूरे होंगे।” अमृत महोत्सव वर्ष में आई राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य
सर्वेक्षण रिपोर्ट में लिंगानुपात में ऐतिहासिक परिवर्तन (1000 पुरुषों के मुकाबले 1020 महिलाएं) उस संकल्प को साकार
होने का जीता जागता प्रमाण है। अमृत महोत्सव वर्ष में आज देश लाखों स्वाधीनता सेनानियों के साथ आजादी की लड़ाई में
नारीशक्ति के महत्वपूर्ण योगदान को याद करते हुए उनके सपनों को पूरा करने का प्रयास कर रहा है। इसीलिए, आज सैनिक
स्कूलों में पढ़ने का बेटियों का सपना पूरा हो रहा है, अब देश की कोई भी बेटी, राष्ट्र-रक्षा के लिए सेना में जाकर महत्वपूर्ण
जिम्मेदारियां उठा सकती है, महिलाओं का जीवन और करियर दोनों एक साथ चलें, इसके लिए सबसे अधिक मातृ अवकाश
देने वाले देशों की श्रेणी में भारत शामिल है। देश के लोकतंत्र में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। 2019 के चुनाव में
पुरुषों से ज्यादा महिलाओं ने मतदान किया। देश की सरकार में बड़ी बड़ी जिम्मेदारियां महिला मंत्री संभाल रही हैं। ये
बदलाव इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि नया भारत कैसा होगा, कितना सामर्थ्यशाली होगा।
नए भारत के विकास चक्र में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ रही है। पिछले 7 सालों में देश ने इस ओर विशेष ध्यान
दिया है। प्रतिष्ठित पद्म सम्मान में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी इसका एक और उदाहरण है। 2015 से लेकर अब तक 185
महिलाओं को उनके अभूतपूर्व कार्यों के लिए पद्म सम्मान दिया गया है। इस वर्ष भी 34 पद्म पुरस्कार अलग-अलग क्षेत्रों में
काम कर रही महिलाओं को मिले हैं। ये अपने आप में एक रिकॉर्ड है। आज तक कभी इतनी ज्यादा महिलाओं को पद्म सम्मान
नहीं मिला है। इसी तरह, आज खेलों में भी भारत की बेटियां दुनिया में कमाल कर रही हैं और ओलंपिक तक में देश के लिए

मेडल जीत रही हैं। कोविड महामारी के खिलाफ इतनी बड़ी लड़ाई पूरे देश ने लड़ी, इसमें भी नर्सेस, डॉक्टर्स और महिला
वैज्ञानिकों ने बड़ी भूमिका निभाई है। महिला सबसे अच्छी शिक्षक और प्रशिक्षक भी होती हैं।
नारी सुरक्षा: कानूनी कवच
2014 में केंद्र में नई सरकार बनने के बाद से राष्ट्रीय स्तर पर महिला सुरक्षा से जुड़े अनेकों प्रयास किए गए। आज देश में
महिलाओं के खिलाफ अपराध पर कड़े कानून हैं, बलात्कार जैसे जघन्य मामलों में फांसी का भी प्रावधान किया गया है।
देशभर में फास्ट ट्रैक कोर्ट्स भी बनाई जा रही हैं और कानूनों का सख्ती से अनुपालन कराने के लिए व्यवस्थाओं को भी
सुधारा जा रहा है। थानों में महिला सहायता डेस्क की संख्या बढ़ाना हो, चौबीस घंटे उपलब्ध रहने वाली हेल्पलाइन हो,
साइबर क्राइम से निपटने के लिए पोर्टल हो, ऐसे अनेक प्रयास महिलाओं की सुरक्षा का कवच बन रहा है। एक दौर था जब
देश ने ‘निर्भया कांड’ जैसी तस्वीर और असुरक्षा का माहौल देखा था, लेकिन अब मौजूदा केंद्र सरकार महिलाओं के खिलाफ
अपराध पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति से काम कर रही है। ट्रिपल तलाक के कानून ने तीन तलाक जैसी सदियों की कुप्रथाओं
से न्याय दिलाकर संरक्षण और लड़ने की शक्ति दी है। इस कानून की महत्ता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि इस
कानून के लागू होने के बाद सिर्फ दो साल में ही तीन तलाक के मामलों में 80 से 82 फीसदी की कमी आई है, जो मुस्लिम
महिलाओं को आत्मसम्मान और सुरक्षा का भाव प्रदान करने वाली है। लड़कियां हों या युवतियां, महिलाएं हों या बुजुर्ग
माताएं, अगर आज लड़ने का साहसिक कदम उठा पा रही हैं तो उसकी वजह है- बीते कुछ वर्षों में सामाजिक वर्जनाओं को
तोड़कर की गई कानूनी पहल, ताकि हर नारी अपने अधिकारों के प्रति सजग होकर मुकाबला कर सके। महिलाओं के खिलाफ
होने वाली हिंसा के मामले में कानूनी प्रावधानों को इतना सख्त और तीव्र बनाया गया है कि बलात्कार जैसे मामलों में वर्षों
की बजाए चंद दिनों में न्याय मिलने लगा है। कुरीतियों पर कुठाराघात के साथ महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा के
खिलाफ केंद्र सरकार के सख्त कदमों ने भी नारी शक्ति को सुरक्षित माहौल दिया है जो राष्ट्र की प्रगति का आधार बन रही हैं।
सिर्फ कानूनी संरक्षण ही नहीं, महिलाओं के आत्मसम्मान के लिए केंद्र सरकार ने तो अभियान चला रखा है। केंद्र सरकार की
अधिकांश योजनाओं के जरिए परिवार की महिलाओं को ही केंद्र में रखकर दस्तावेज दिए जाते हैं। इतना ही नहीं, पहले
जम्मू-कश्मीर में गैर कश्मीरी से विवाह करने पर महिलाओं और उसके बच्चों को पैतृक संपत्ति के हक से वंचित कर दिया
जाता था। लेकिन अनुच्छेद 370 और 35 ए को निरस्त किए जाने के बाद इस क्षेत्र की महिलाओं को उसका हक मिला है।
प्रवासी भारतीयों द्वारा शादी करने और फिर छोड़ देने जैसे मामलों में भी कानून को सख्त बनाया गया है।
भारत की महिलाएं आज स्वतंत्र है, आर्थिक रूप से सशक्त है, दृढ़ संकल्प से लैस है, सुरक्षा का भाव है और सिर्फ सपने देख
नहीं रहीं, बल्कि उसे साकार भी कर रही हैं तो उसकी बड़ी वजह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली दृढ़ निश्चय वाली
सरकार के प्रयास हैं। जिसकी वजह से दशकों से चली आ रही लड़की या महिला को कमतर मानने की सोच में क्रांतिकारी
बदलाव आया है। अब लड़की के पैदा होने पर मायूसी के साथ ‘लड़की हुई है’ कहने वाले उत्साह के साथ कहने लगे हैं ‘अरे
वाह, घर में लक्ष्मी आई है।’ लोगों ने अब महसूस कर लिया है कि बेमिसाल होती है बेटियां। असीम प्यार पाने की हकदार
होती हैं बेटियां।
महिला सशक्तीकरण की दिशा में ‘भारत की लक्ष्मी’ अब किस तरह परिवार, समाज के साथ-साथ राष्ट्र का गौरव बन रही हैं,
इस नई सोच के बदलाव को आप इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आगे के पन्नों में उद्धृत महिला शक्ति के कुछ उदाहरणों
से महसूस कर सकते हैं…। n

अाम बजट में नारी शक्ति के लिए नई पहल

देशभर में 8,000 से ज्यादा जन औषधि केंद्रों के माध्यम से मात्र 1 रुपये में सैनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

मातृत्व अवकाश को बढ़ाकर 26 हफ्ते किया गया। साथ ही, क्रेच काे अनिवार्य किया गया। ताकि कामकाजी महिलाओं को न
हो कोई परेशानी।

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