सुसंस्कृति परिहार
एक तरफ संसद में 33%आरक्षण का बिल सन् 1998से गोता लगा रहा है।कोई सरकार नहीं चाहती कि यह बिल पास हो।एक दो वाम दलों को छोड़कर साफ मंशा किसी राजनैतिक दल की नहीं दिखाई देती। प्रियंका गांधी ने महिलाओं को ताकतवर बनाने उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव में परीक्षण के तौर पर 33फीसदी टिकिट महिलाओं को दिए थे पर उनका क्या हश्र हुआ सभी जानते हैं?
आश्चर्यजनक तो यह है कि विधानसभा और लोकसभा में महिलाओं से परहेज़ है जबकि जिला सरकार और नगरीय सरकार में महिलाओं को आरक्षण दिया गया है। यह 50फीसदी है। इसकी अभिव्यक्ति भारतीय संसद में 110वें व 112वें संविधान संषोधन विधेयक, 2009 के रूप मं हुई, जिनका संबंध क्रमषः पंचायतीराज और शहरी निकायों के सभी स्तरों में महिलाओं के लिए निर्धारित 33 प्रतिषत सीटों को बढ़ाकर 50 प्रतिषत करने से था लेकिन इस बार मध्यप्रदेश में खुड़ैल खुर्द पंचायत के लोगों ने तो ग्राम पंचायत में शत-प्रतिशत पद महिलाओं को सौंपकर उनकी ही सरकार बना डाली, वह भी बिना चुनाव के।इस आरक्षण के अलावा अन्य वर्गों से भी महिलाएं जीत कर आई है। भोपाल जिला पंचायत में महिलाओं का प्रतिशत 60तक पहुंचा है।मतलब यह कि महिलाओं की तूती जिला और नगरीय सरकार में बोलेगी।
यह देख सुनकर प्रगतिशील लोगों की बांछे खिल खिल जाती हैं। भारतीय राजनीति में गांवों से सीधे इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं का सत्ता में आना तसल्लीबख्श है।सारी दुनियां में भारत देश की महिलाओं की राजनीति में सक्रिय भागीदारी की चर्चाएं होती हैं। जबकि वस्तुत: इनमें से 60 से 65फीसदी महिलाओं को जबरिया आरक्षण के नाम पर लाया जाता है। खासतौर पर अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग से आने वाली बहुसंख्यक महिलाओं को क्षेत्र के दबंग अपने फायदे के लिए जिताते है वे राजनीति का क ख ग भी नहीं जानती उनके तमाम काम उनके पति दबंग राजनैतिज्ञ के मार्ग दर्शन में करते हैं।जिन समाज में पति थोड़े राजनीति से जुड़े होते वे काम करते हैं। मध्यप्रदेश में तो इसलिए सरपंच पति नाम से ही महिला सरपंच का काम चलता है। महिला भले ही आठवीं या बारहवीं पास हो उसे तो चौंका चूल्हा ही देखना है।उसे उसका समाज ये इज़ाजत नहीं देता। इसलिए मध्यप्रदेश में ऐसी घटनाएं होती हैं कि महिला सरपंच की जगह उसका पति शपथ ले लेता है और अधिकारी देखते रहते हैं। लोग कहते हैं ठीक तो है जिसे काम करना है उसे ही शपथ लेनी चाहिए। हद तो तब और हो जाती है जब मीडिया निर्वाचित महिला के नाम की जगह पति का ही नाम देकर उसकी जीत बताता है। उसके इंटरव्यू को छापता है कि वे क्या काम करेंगे वगैरह-वगैरह।
अब पत्रकार भी क्या करें उसकी पहुंच विजयी महिला तक नहीं हो पाती तब पति का इंटरव्यू ही फर्ज बन जाता है। ऐसी तमाम घटनाएं इस बात की ताकीद करती हैं कि यह सब महिला आरक्षण के नाम पर एक भद्दा मज़ाक है। अशिक्षित भारत के गांवों में जहां आज भी पत्नि का मालिक सिर्फ पति है वह उसकी इच्छा के अधीन स्त्री है वहां 50%आरक्षण से क्या हासिल होने वाला है।ये छद्म है,धोखा है और बड़े बड़ों का गोरखधंधा है।
हालांकि इन सबके बीच समाज सेवा से जुड़ी कई जागरुक महिलाएं भी सामने आई हैं। जिन्होंने संजीदगी से अपने कर्त्तव्य को निभाया है। इसलिए आरक्षण के लाभ महिलाओं को मिले इसके लिए महिलाओं को पहले सामाजिक कार्यों में लगना होगा ।देश की राजनीति समझनी होगी और अपने विवेक से निर्णय लेने का माद्दा रखना होगा। दूसरे के सहारे चुनाव जीतना और नासमझ बनकर बैठना आरक्षण का मतलब नहीं होता। इसके लिए अपने अपने समाज को भी जागरुक करना होगा ताकि वे सब भी अपने अधिकारों के प्रति सजग हों। महिलाओं के बिना जागे यह महत्त्वपूर्ण पद और अधिकार निरर्थक है।
राजनैतिक तो यही चाहते हैं और सरकार भी यही चाहती है।कि महिला आरक्षण देने में उनका नाम हो और वे जैसा चाहें उनका उपयोग कर सकें। सोचिए ऐसा आरक्षण सिर्फ मजाक है। महिलाओं को जागना होगा और विधानसभा और संसद में भी आरक्षण की मांग बुलंद करनी होगी।शर्त वहीं होगी वह मुखर हो अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति , स्वविवेक से काम लें और पुरुषवादी सोच सेक्षघर और बाहर टक्कर ले सके ।आज का राजनैतिक माहौल बहुत गन्दा महिला सांसद और कांग्रेस पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष पूर्व प्रधानमंत्री की पत्नि सोनिया गांधी को देश के प्रधानमंत्री तक अपशब्द कह देते हैं तो कार्यकर्ता क्यों ना कहेंगे।सदन में बैठी सम्बंधित पार्टी की महिलाएं भी आपत्ति दर्ज नहीं कर सकती ऐसे में कैसे हम सोच सकते हैं महिलाओं की राजनीति में दिलचस्पी बढ़ेगी। जन आंदोलन लोकतंत्र को मज़बूत करते हैं उनमें भारत देश की बेटी प्रियंका गांधी के साथ भारतीय पुलिस कैसा व्यवहार कर रही है वैसा अंग्रेजी या मुस्लिम शासनकाल में भी कभी नहीं हुआ।ऐसी स्थिति देखकर महिलाएं राजनीति में कैसे आयेंगी? किंतु महिलाओं को आगे आना होगा देश के संविधान को बचाने, महिलाओं के अधिकार और अस्मिता बचाने। वैसे ही जैसे बापू के साथ आज़ादी के संग्राम में हज़ारों हज़ार महिलाओं ने प्रत्यक्ष और अपरोक्ष रुप से भाग लिया।तय करें वे अपना हक हासिल करके रहेंगे। उन्हें हर जगह बराबरी की दरकार है किंतु आरक्षण के उठते सवालों के बारे में सोचना होगा।

