आभा शुक्ला
औरत कुदरत की बनाई हुई सबसे खूबसूरत रचना……. और पुरुष द्वारा जर, जोरू, जमीन से जर और जमीन के समतुल्य रखी वस्तु…. जिसे पाना या जिस पर अपना अधिकार स्थापित करने के लिए पुरुष युद्ध करने और रक्त बहाने से भी कभी पीछे नही हटा…
अगर औरत की तारीफ भी की गई तो उसकी हिरनी जैसी आंखें, नागिन जैसे बाल, मोरनी जैसी चाल आदि आदि बताकर…. औरत की हर चीज की तुलना जानवर से कर दी… इंसान रखा ही नही उसको… क्या क्या उपमाएं देते चले गए… नरक का द्वार कह दिया… अपवित्र कह दिया… गंदगी कह दिया.. जितना बुरा से बुरा कह सकते थे कह से दिया आपने… देवी भी कहा तो पत्थर के शिलाखंड से तौल दिया औरत को…
हर सुबह एक सवाल जेहन मे उठता है कि यदि कोई स्त्री काट दे अपने स्तनों को, सिल दे अपनी योनि को, क्या फिर भी दुनिया मे कोई ऐसा पुरुष है जो उससे प्रेम करेगा……उसके साथ वफादारी से जीवन व्यतीत करेगा…….
नही…. कोई नही….. यदि कोई विरला हो तो मैं उससे अवश्य मिलना चाहूँगी…….. औरत, उसका दुबला पतला शरीर और उसको भोगने की आकांक्षा को ठीक से समझा है पूंजीवाद ने और जमकर हाइलाइट किया है औरत को अपने प्रोडक्ट की मार्केटिंग के लिए…
टूथपेस्ट करके साँस छोड़ी, लड़की खींची चली आई…. परफ्यूम लगाया, 2-4 लड़कियाँ आकर लिपट गई…. सेविंग की, देखकर लड़की मर मिटी….. नई लांच बाइक लेकर निकले तो लड़की खुद से पीछे आकर बैठ गयी…..
मतलब पुरषों से सम्बन्धित चीजों के विज्ञापन का सार यही है कि मंजन करो, लड़की पटाओ…. परफ्यूम लगाओ, लड़की पटाओ….. क्रीम लगाओ लड़की पटाओ…… जैसे लड़की भावनाएं, प्रेम कुछ नही देखती बस मंजन, परफ्यूम और बाइक देखती हैं….
वो असल में समाज का मनोविज्ञान जानते हैं….. पर आपको कभी ये बेज्जती नही लगती क्या…… क्या एक विवाहित और पत्नी के लिए समर्पित पुरुष परफ्यूम इसीलिए लगाता है…. मंजन इसीलिए करता है कि लड़की पटा सके….. नही…. कतई नही….. यही है स्त्री का बाजारीकरण.. पूंजीवाद कभी नैतिकता नही देखता… वो सिर्फ मुनाफ़ा देखता है…..
मेरा आपसे सवाल है कि क्या स्त्री को परफ्यूम, मंजन, क्रीम लगाकर बिस्तर तक ले जाया जा सकता है…. ?? क्या पूंजीवाद मे इतना सस्ता हो गया है किसी स्त्री का वजूद…. ??
ये आत्ममंथन का समय है.. नारीवाद का झंडा उठाए औरतें और पुरुष आत्ममंथन करें.. और देखें कि पूंजीवाद आपकी बहन बेटी के सम्मान को कहां लेकर आ गया है…..
आभा शुक्ला

